भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1392

जाग्रत्-अवस्थामें प्रसन्न इन्द्रियोंके द्वारा मनुष्य अपने मनमें जो-जो संकल्प करता है, स्वप्रावस्था आनेपर भी उसका वह मन हर्षपूर्वक उसी-उसी संकल्पको पूर्ण होता देखा करता है ।। १२ ।।

व्यापकं सर्वभूतेषु वर्ततेऽप्रतिघं मनः ।
आत्मप्रभावात् तं विद्यात् सर्वा ह्यात्मनि देवताः ॥ १३ ॥
मनकी सर्वत्र अबाध गति है। वह अपने अधिष्ठान-भूत आत्माके ही प्रभावसे सम्पूर्ण भूतोंमें व्याप्त है; अतः आत्माको अवश्य जानना चाहिये; क्योंकि सभी देवता आत्मामें ही स्थित हैं ।। १३ ।।

मनस्यन्तर्हितं द्वारं देहमास्थाय मानुषम् ।
यद् यत् सदसदव्यक्तं स्वपित्यस्मिन्निदर्शनम् ।
सर्वभूतात्मभूतस्थं तमध्यात्मगुणं विदुः ॥ १४ ॥
स्वप्न-दर्शनका द्वारभूत जो स्थूल मानव देह है, वह सुषुप्ति-अवस्थामें मनमें लीन हो जाता है। उसी देहका आश्रय ले मन अव्यक्त सदसत्स्वरूप एवं साक्षीभूत आत्माको प्राप्त होता है। वह आत्मा सम्पूर्ण भूतोंके आत्मभूत है। ज्ञानी पुरुष उसे अध्यात्मगुणसे युक्त मानते हैं ।। १४ ।।

लिप्सैत मनसा यश्च संकल्पादैश्वरं गुणम् ।
आत्मप्रसादं तं विद्यात् सर्वा ह्यात्मनि देवताः ॥ १५ ॥
जो योगी मनके द्वारा संकल्पसे ही ईश्वरीय गुणको पाना चाहता है, वह उस आत्मप्रसादको प्राप्त कर लेता है; क्योंकि सम्पूर्ण देवता आत्मामें ही स्थित हैं ।। १५ ।।

एवं हि तपसा युक्तमर्कवत् तमः परम् ।
त्रैलोक्यप्रकृतिर्देही तमसोऽन्ते महेश्वरः ॥ १६ ॥
इस प्रकार तपस्यासे युक्त हुआ मन अज्ञानान्धकारसे ऊपर उठकर सूर्यके समान ज्ञानमय प्रकाशसे प्रकाशित होने लगता है। जीवात्मा तीनों लोकोंका कारणभूत ब्रह्म ही है। वह अज्ञान निवृत्तिके पश्चात् महेश्वर (विशुद्ध परमात्मा) रूपसे प्रतिष्ठित होता है ।। १६ ।।

तपो ह्यधिष्ठितं देवैस्तपोध्नममसुरैस्तमः ।
एतद् देवासुरैर्गुप्तं तदाहुर्ज्ञानलक्षणम् ॥ १७ ॥
देवताओेंने तपका आश्रय लिया है और असुरोंने तपस्यामें विघ्न डालनेवाले दम्भ, दर्प आदि तमको अपनाया है; परंतु ब्रह्मतत्त्व देवताओं और असुरोंसे छिपा हुआ है; तत्त्वज्ञ पुरुष इसे ज्ञानस्वरूप बताते हैं ।। १७ ।।

सत्त्वं रजस्तमश्चेति देवासुरगुणान् विदुः ।
सत्त्वं देवगुणं विद्यादितरावासुरौ गुणौ ॥ १८ ॥
सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण—इन्हें देवताओं और असुरोंका गुण माना गया है। इनमें सत्त्व तो देवताओंका गुण और शेष दोनों असुरोंके गुण हैं ।। १८ ।।