भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1414, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1414

विषयोंका ज्ञान होता है) ॥ १२ ॥ तेषु कर्मविसर्गश्च सर्वतत्त्वार्थनिश्चयः । तमाहुः परमं शुक्लं बुद्धिरित्यव्ययं महत् ॥ १३ ॥ श्रोत्र आदि इन्द्रियोंमें उनके विषयोंका विसर्जन (त्याग) करनेसे सम्पूर्ण तत्त्वोंके यथार्थ निश्चयरूप मोक्षकी प्राप्ति होती है। उस तत्त्वनिश्चयको अत्यन्त निर्मल उत्तम ज्ञान और अविनाशी महान् ब्रह्मपद कहते हैं ॥ १३ ॥ इमं गुणसमाहारमात्मभावेन पश्यतः । असम्यग्दर्शनैर्दुःखमनन्तं नोपशाम्यति ॥ १४ ॥ जो लोग गुणोंके संघातस्वरूप इस शरीरको ही आत्मा समझ लेते हैं, उन्हें मिथ्या ज्ञानके कारण अनन्त दुःखोंकी प्राप्ति होती है और उनकी परम्परा कभी शान्त नहीं होती ॥ १४ ॥ अनात्मेति च यद् दृष्टं तेनाहं न ममेत्यपि । वर्तते किमधिष्ठानात् प्रसक्ता दुःखसंसृतिः ॥ १५ ॥ इसके विपरीत जिनकी दृष्टिमें यह दृश्य प्रपंच अनात्मा सिद्ध हो चुका है, उनकी इसके प्रति न ममता होती है न अहंता, फिर उन्हें दुःखपरम्परा कैसे प्राप्त हो; उन दुःखोंके लिये आधार ही क्या रह जाता है? ॥ १५ ॥ अत्र सम्यग्वधो नाम त्यागशास्त्रमनुत्तमम् । शृणु यत् तव मोक्षाय भाष्यमाणं भविष्यति ॥ १६ ॥ अब मैं उस परम उत्तम सांख्यशास्त्रका वर्णन करता हूँ, जिसका नाम है सम्यग्वध (सम्यग्रूपेण दुःखोंका नाश करनेवाला)। उसमें त्यागकी प्रधानता है। तुम ध्यान देकर सुनो। उसका उपदेश तुम्हारे लिये मोक्षदायक होगा ॥ १६ ॥ त्याग एव हि सर्वेषां युक्तानामपि कर्मणाम् । नित्यं मिथ्याविनीतानां क्लेशो दुःखवहो मतः ॥ १७ ॥ जो लोग मुक्तिके लिये प्रयत्नशील हों, उन सबको चाहिये कि सम्पूर्ण कर्मोंमें अहंता, ममता, आसक्ति और कामनाका त्याग करे। जो इनका त्याग किये बिना ही विनीत (शम, दम आदि साधनोंमें तत्पर) होनेका झूठा दावा करते हैं, उन्हें अविद्या आदि दुःखदायी क्लेश प्राप्त होते हैं ॥ १७ ॥ द्रव्यत्यागे तु कर्माणि भोगत्यागे व्रतान्यपि । सुखत्यागे तपो योगं सर्वत्यागे समापना ॥ १८ ॥ शास्त्रोंमें द्रव्यका त्याग करनेके लिये यज्ञ आदि कर्म, भोगका त्याग करनेके लिये व्रत, दैहिक सुखोंके त्यागके लिये तप और सब कुछ (अहंता, ममता, आसक्ति, कामना आदि) त्याग देनेके लिये योगके अनुष्ठानकी आज्ञा दी गयी है। यही त्यागकी चरम सीमा है ॥ १८ ॥ तस्य मार्गोऽयमद्वैधः सर्वत्यागस्य दर्शितः ।