महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1415, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंविप्रहाणाय दुःखस्य दुर्गतिस्त्वन्यथा भवेत् ॥ १९ ॥ सर्वस्व-त्यागका यह एकमात्र मार्ग ही दुःखोंसे छुटकारा पानेके लिये उत्तम बताया गया है, इसके विपरीत आचरण करनेवालोंको दुर्गति भोगनी पड़ती है ॥ १९ ॥ पञ्चज्ञानेन्द्रियाण्युक्त्वा मनःषष्ठानि चेतसि । बलषष्ठानि वक्ष्यामि पञ्चकर्मेन्द्रियाणि तु ॥ २० ॥ बुद्धिमें स्थित मनसहित पाँच ज्ञानेन्द्रियोंका वर्णन करके अब पाँच कर्मेन्द्रियोंका वर्णन करूँगा। जिनके साथ प्राणशक्ति छठी बतायी गयी है ॥ २० ॥ हस्तौ कर्मेन्द्रियं ज्ञेयमथ पादौ गतीन्द्रियम् । प्रजनानन्दयोः शेफो निसर्ग पायुरिन्द्रियम् ॥ २१ ॥ दोनों हाथोंको काम करनेवाली इन्द्रिय जानना चाहिये, दोनों पैर चलने-फिरनेका काम करनेवाली इन्द्रिय हैं। लिंग संतानोत्पादन एवं मैथुनजनित आनन्दकी प्राप्ति करनेके लिये है। गुदनामक इन्द्रियका कार्य मल-त्याग करना है ॥ २१ ॥ वाक् च शब्दविशेषार्थमिति पञ्चान्वितं विदुः । एवमेकादशैतानि बुद्ध्याऽऽशु विसृजेन्मनः ॥ २२ ॥ वाक्-इन्द्रिय शब्दविशेषका उच्चारण करनेके लिये है। इस प्रकार पाँच कर्मेन्द्रियोंको पाँच विषयोंसे युक्त माना गया है। मनसहित एकादश इन्द्रियोंके विषयोंका बुद्धिके द्वारा शीघ्र त्याग कर देना चाहिये ॥ २२ ॥ कर्णौ शब्दश्च चित्तं च त्रयः श्रवणसंग्रहे । तथा स्पर्शे तथा रूपे तथैव रसगन्धयोः ॥ २३ ॥ श्रवण-कालमें श्रोत्ररूपी इन्द्रिय, शब्दरूपी विषय और चित्तरूपी कर्ता—इन तीनोंका संयोग होता है, इसी प्रकार स्पर्श, रूप, रस तथा गन्धके अनुभव-कालमें भी इन्द्रिय, विषय एवं मनका संयोग अपेक्षित है ॥ २३ ॥ एवं पञ्चत्रिका ह्येते गुणास्तदुपलब्धये । येनायं त्रिविधो भावः पर्यायात् समुपस्थितः ॥ २४ ॥ इस प्रकार ये तीन-तीनके पाँच समुदाय हैं, ये सब गुण कहे गये हैं। इनसे शब्दादि विषयोंका ग्रहण होता है, जिससे ये कर्ता, कर्म और करणरूपी त्रिविध भाव बारी-बारीसे उपस्थित होते हैं ॥ २४ ॥ सात्त्विको राजसश्चापि तामसश्चापि ते त्रयः । त्रिविधा वेदना येषु प्रसूताः सर्वसाधनाः ॥ २५ ॥ इनमेंसे एक-एकके सात्त्विक, राजस और तामस तीन-तीन भेद होते हैं। उनसे प्राप्त होनेवाले अनुभव भी तीन प्रकारके ही हैं। जो हर्ष, प्रीति आदि सभी भावोंके साधक हैं ॥ २५ ॥ प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः सुखं संशान्तचित्तता ।