महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1416, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअकुतश्चित् कुतश्चिद् वा चिन्तितः सात्त्विको गुणः ॥ २६ ॥ हर्ष, प्रीति, आनन्द, सुख और चित्तकी शान्ति-ये सब भाव बिना किसी कारणके स्वतः हों या कारणवश (भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सत्संग आदिके कारण) हों, सात्त्विक गुण माने गये हैं ॥ २६ ॥
अतुष्टिः परितापश्च शोको लोभस्तथाऽक्षमा । लिङ्गानि रजसस्तानि दृश्यन्ते हेत्वहेतुतः ॥ २७ ॥ असंतोष, संताप, शोक, लोभ और असहनशीलता—ये किसी कारणसे हों या अकारण—रजोगुणके चिह्न हैं ॥
अविवेकस्तथा मोहः प्रमादः स्वप्नतन्द्रिता । कथंचिदपि वर्तन्ते विविधास्तामसा गुणाः ॥ २८ ॥ अविवेक, मोह, प्रमाद, स्वप्न और आलस्य—ये किसी तरह भी क्यों न हों, तमोगुणके ही विविध रूप हैं ॥
अत्र यत् प्रीतिसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् । वर्तते सात्त्विको भाव इत्यपेक्षेत तत् तथा ॥ २९ ॥ इनमें जो शरीर या मनमें प्रीतिके संयोगसे उदित हो, वह सात्त्विक भाव है और उसको सत्त्वगुणकी वृद्धि जाननी चाहिये ॥ २९ ॥
यत् त्वसंतोषसंयुक्तमप्रीतिकरमात्मनः । प्रवृत्तं रज इत्येवं ततस्तदपि चिन्तयेत् ॥ ३० ॥ जो अपने लिये असंतोषजनक एवं अप्रीतिकर हो, उसको रजोगुणकी प्रवृत्ति एवं अभिवृद्धि समझनी चाहिये ॥ ३० ॥
अथ यन्मोहसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥ ३१ ॥ शरीर या मनमें जो अतर्क्य, अज्ञेय एवं मोह-संयुक्त भाव प्रादुर्भूत हो, उसको तमोगुणजनित जानना चाहिये ॥ ३१ ॥
श्रोत्रं व्योमाश्रितं भूतं शब्दः श्रोत्रं समाश्रितः । नोभयं शब्दविज्ञाने विज्ञानस्येतरस्य वा ॥ ३२ ॥ शब्दका आधार श्रोत्रेन्द्रिय है और श्रोत्रेन्द्रियका आधार आकाश है; अतः वह आकाशरूप ही है। ऐसी स्थितिमें शब्दका अनुभव करते समय आकाश और श्रोत्र—ये दोनों ही ज्ञान अथवा अज्ञानके विषय नहीं होते हैं* ॥ ३२ ॥
एवं त्वक्चक्षुषी जिह्वा नासिका चेति पञ्चमी । स्पर्शे रूपे रसे गन्धे तानि चेतो मनश्च तत् ॥ ३३ ॥ इसी प्रकार त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका भी क्रमशः स्पर्श, रूप, रस और गन्धके आश्रय तथा अपने आधारभूत महाभूतोंके स्वरूप हैं। इन सबका कारण मन है, इसलिये ये