महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1417, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसब-के-सब मनःस्वरूप हैं ।। ३३ ।। स्वकर्मयुगपद्भावो दशस्वेतेषु तिष्ठति । चित्तमेकादशं विद्धि बुद्धिर्द्वादशमी भवेत् ।। ३४ ।। इन दसों इन्द्रियोंमें अपने-अपने विषयोंको एक साथ भी ग्रहण करनेकी शक्ति होती है। ग्यारहवाँ मन और बारहवीं बुद्धि—इनको इन्द्रियोंका सहायक समझना चाहिये ।। ३४ ।। तेषामयुगपद्भाव उच्छेदो नास्ति तामसे । आस्थितो युगपद्भावो व्यवहारः स लौकिकः ।। ३५ ।। तमोगुणजनित सुषुप्तिकालमें अपने कारणमें विलीन हो जानेसे इन्द्रियाँ विषयोंका ग्रहण नहीं कर सकतीं, किंतु उनका नाश नहीं होता है। उनमें जो अपने विषयोंको एक साथ ग्रहण करनेकी शक्ति है, वह लौकिक व्यवहारमें ही दिखायी देती है (सुषुप्तिकालमें नहीं) ।। ३५ ।। इन्द्रियाण्यपि सूक्ष्माणि दृष्ट्वा पूर्वश्रुतागमात् । चिन्तयन्नानुपर्येति त्रिभिरेवान्वितो गुणैः ।। ३६ ।। पहले जाग्रत्-अवस्थाके देखने-सुनने आदिके द्वारा पूर्ववासनावश शब्द आदि विषयोंकी प्राप्ति होनेसे स्वप्नदर्शी पुरुष सूक्ष्म ग्यारह इन्द्रियोंको देखकर विषयसंगकी भावना करता हुआ सत्त्व आदि तीनों गुणोंसे युक्त हो शरीरके भीतर ही इच्छानुसार घूमता रहता है ।। ३६ ।। यत् तमोपहतं चित्तमाशु संहारमध्रुवम् । करोत्युपरमं काये तदाहुस्तामसं बुधाः ।। ३७ ।। सुषुप्तिकालमें जब चित्त तमोगुणसे अभिभूत होकर अपने प्रवृत्ति और प्रकाश-स्वभावका शीघ्र ही संहार करके थोड़ी देरके लिये इन्द्रियोंके व्यापारको बंद कर देता है, उस समय शरीरमें जो सुखकी प्रतीति होती है, उसे विद्वान् पुरुष तामस सुख कहते हैं ।। ३७ ।। यद् यदागमसंयुक्तं न कृच्छ्रमनुपश्यति । अथ तत्राप्युपादत्ते तमोऽव्यक्तमिवानृतम् ।। ३८ ।। सुषुप्तिकालमें स्वप्नदर्शी पुरुष उपस्थित दुःखको प्रत्यक्षकी भाँति अनुभव नहीं करता है। इसलिये वह सुषुप्तिकालमें भी तमोगुणयुक्त मिथ्या सुखका अनुभव करता है ।। ३८ ।। एवमेष प्रसंख्यातः स्वकर्मप्रत्ययो गुणः । कथञ्चिद् वर्तते सम्यक् केषांचिद् वा निवर्तते ।। ३९ ।। इस प्रकार अपने कर्मके अनुसार गुणकी प्राप्तिके विषयमें कहा गया है। अज्ञानियोंके ये गुण सम्यक्रूपेण प्रवृत्त होते हैं और ज्ञानियोंके निवृत्त हो जाते हैं ।। ३९ ।। एतदाहुः समाहारं क्षेत्रमध्यात्मचिन्तकाः । स्थितो मनसि यो भावः स वै क्षेत्रज्ञ उच्यते ।। ४० ।।