भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1457

कितने ही प्राणियोंको बिना किसी प्रयत्नके ही हमलोग अनिष्टकी प्राप्ति और इष्टका निवारण होते देखते हैं। यह बात स्वभावसे ही होती है ॥ २० ॥
प्रतिरूपतराः केचिद् दृश्यन्ते बुद्धिमत्तराः ।
विरूपेभ्योऽल्पबुद्धिभ्यो लिप्समाना धनागमम् ॥ २१ ॥
कितने ही सुन्दर और अत्यन्त बुद्धिमान् पुरुष भी कुरूप और अल्पबुद्धि मनुष्योंसे धन पानेकी आशा करते देखे जाते हैं ॥ २१ ॥
स्वभावप्रेरिताः सर्वे निविशन्ते गुणा यदा ।
शुभाशुभास्तदा तत्र कस्य किं मानकारणम् ॥ २२ ॥
जब शुभ और अशुभ सभी प्रकारके गुण स्वभावकी ही प्रेरणासे प्राप्त होते हैं, तब किसीको भी उनपर अभिमान करनेका क्या कारण है? ॥ २२ ॥
स्वभावादेव तत्सर्वमिति मे निश्चिता मतिः ।
आत्मप्रतिष्ठा प्रज्ञा वा मम नास्ति ततोऽन्यथा ॥ २३ ॥
मेरी तो यह निश्चित धारणा है कि स्वभावसे ही सब कुछ प्राप्त होता है। मेरी आत्मनिष्ठ बुद्धि भी इसके विपरीत विचार नहीं रखती ॥ २३ ॥
कर्मजं त्विह मन्यन्ते फलयोगं शुभाशुभम् ।
कर्मणां विषयं कृत्स्नमहं वक्ष्यामि तच्छृणु ॥ २४ ॥
यहाँपर जो शुभ और अशुभ फलकी प्राप्ति होती है, उसमें लोग कर्मको ही कारण मानते हैं; अतः मैं तुमसे कर्मके विषयका ही पूर्णतया वर्णन करता हूँ, सुनो ॥
यथा वेदयते कश्चिदोदनं वायसो ह्यदन् ।
एवं सर्वाणि कर्माणि स्वभावस्यैव लक्षणम् ॥ २५ ॥
जैसे कोई कौआ कहीं गिरे हुए भातको खाते समय काँव-काँव करके अन्य काकोंको यह जता देता है कि यहाँ अन्न है, उसी प्रकार समस्त कर्म अपने स्वभावको ही सूचित करनेवाले हैं ॥ २५ ॥
विकारानेव यो वेद न वेद प्रकृतिं पराम् ।
तस्य स्तम्भो भवेद् बाल्यान्नास्ति स्तम्भोऽनुपश्यतः ॥ २६ ॥
जो विकारों (कार्यों) को ही जानता है, उनकी परम प्रकृति (स्वभाव) को नहीं जानता, उसीको अविवेकके कारण मोह या अभिमान होता है। जो इस बातको ठीक-ठीक समझता है, उसे मोह नहीं होता ॥ २६ ॥
स्वभावभाविनो भावान् सर्वानिवेह निश्चयात् ।
बुद्ध्यमानस्य दर्पो वा मानो वा किं करिष्यति ॥ २७ ॥
सभी भाव स्वभावसे ही उत्पन्न होते हैं। इस बातको जो निश्चितरूपसे जान लेता है, उसका दर्प या अभिमान क्या बिगाड़ सकता है? ॥ २७ ॥
वेद धर्मविधिं कृत्स्नं भूतानां चाप्यनित्यताम् ।