भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1566

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सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

सृष्टिके समस्त कार्योंमें बुद्धिकी प्रधानता और प्राणियोंकी श्रेष्ठताके तारतम्यका वर्णन

व्यास उवाच

अथ ज्ञानप्लवं धीरो गृहीत्वा शान्तिमात्मनः ।
उन्मज्जंश्च निमज्जंश्च ज्ञानमेवाभिसंश्रयेत् ॥ १ ॥
व्यासजी कहते हैं— वत्स! धीर पुरुषको चाहिये कि वह विवेकरूप नौकाका अवलम्बन लेकर भव-सागरमें डूबता-उतराता हुआ अर्थात् प्रत्येक परिस्थितिमें अपनी परम शान्तिके लिये वास्तविक ज्ञानके आश्रित हो जाय ॥ १ ॥

शुक उवाच

किं तज्ज्ञानमथो विद्या यथा निस्तरते द्वयम् ।
प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो निवृत्तिरिति वा वद ॥ २ ॥
शुकदेवजीने पूछा— पिताजी! जिसके द्वारा मनुष्य जन्म और मृत्यु दोनोंके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है, वह ज्ञान अथवा विद्या क्या है? वह प्रवृत्तिरूप धर्म है या निवृत्तिरूप? यह मुझे बताइये ॥ २ ॥

व्यास उवाच

यस्तु पश्यन् स्वभावेन विनाभावमचेतनः ।
पुष्यते च पुनः सर्वान् प्रज्ञया मुक्तहेतुकान् ॥ ३ ॥
व्यासजीने कहा— जो यह समझता है कि यह जगत् स्वभावसे ही उत्पन्न है, इसका कोई चेतन मूल कारण नहीं है, वह अज्ञानी मनुष्य व्यर्थ तर्कयुक्त बुद्धिद्वारा हेतुरहित वचनोंका बारंबार पोषण करता रहता है ॥ ३ ॥

येषां चैकान्तभावेन स्वभावात् कारणं मतम् ।
पूत्वा तृणमिषीकां वा ते लभन्ते न किंचन ॥ ४ ॥
जिनकी यह मान्यता है कि निश्चित रूपसे वस्तुगत स्वभाव ही जगत्‌का कारण है—स्वभावसे भिन्न अन्य कोई कारण नहीं है, (किंतु इन्द्रियोंद्वारा उपलब्ध न होनेमात्र हेतुसे उनका यह मानना कि ईश्वर-जैसा कोई जगत्‌का कारण है ही नहीं, युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि) मूँजके भीतर स्थित दिखायी न देनेवाली सींक क्या मूँजको चीर डालनेपर उन्हें उपलब्ध नहीं होती? अपितु अवश्य होती है (उसी प्रकार समस्त जगत्‌में व्याप्त परमात्मा