भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1655

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सप्तपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

महादेवजीकी प्रार्थनासे ब्रह्माजीके द्वारा अपनी रोषाग्निका उपसंहार तथा मृत्युकी उत्पत्ति

स्थाणुरुवाच

प्रजासर्गनिमित्तं मे कार्यवत्तामिमां प्रभो ।
विद्धि सृष्टास्त्वया हीमा मा कुप्यासां पितामह ॥ १ ॥
**महादेवजीने कहा—**प्रभो! पितामह! मेरा मनोरथ या प्रयोजन आपसे प्रजासर्गकी रक्षाके लिये प्रार्थना करना है। आप इस बातको जान लें। आपहीने इन प्रजाओंकी सृष्टि की है; अतः आप इनपर क्रोध न कीजिये ॥ १ ॥

तव तेजोऽग्निना देव प्रजा दह्यन्ति सर्वशः ।
ता दृष्ट्वा मम कारुण्यं मा कुप्यासां जगत्प्रभो ॥ २ ॥
देव! जगदीश्वर! आज आपकी क्रोधाग्निसे सारी प्रजाएँ दग्ध हो रही हैं। उन्हें उस अवस्थामें देखकर मुझे दया आती है, आप उनपर क्रोध न करें ॥ २ ॥

प्रजापतिरुवाच

न कुप्ये न च मे कामो न भवेयुः प्रजा इति ।
लाघवार्थं धरण्यास्तु ततः संहार इष्यते ॥ ३ ॥
**प्रजापति ब्रह्माजी बोले—**शिव! मैं प्रजापर कुपित नहीं हूँ और न मेरी यही इच्छा है कि प्रजाओंका विनाश हो जाय। पृथ्वीका भार हल्का करनेके लिये ही प्रजाके संहारकी आवश्यकता प्रतीत हुई है ॥ ३ ॥

इयं हि मां सदा देवी भारार्ता समचोदयत् ।
संहारार्थं महादेव भारेणाप्सु निमज्जति ॥ ४ ॥
महादेव! यह पृथ्वीदेवी भारी भारसे पीड़ित हो सदा मुझे प्रजाके संहारके लिये प्रेरित करती रही है; क्योंकि यह जगत्के भारसे समुद्रमें डुबी जा रही है ॥

यदाहं नाधिगच्छामि बुद्ध्या बहु विचारयन् ।
संहारमासां वृद्धानां ततो मां क्रोध आविशत् ॥ ५ ॥
जब बहुत विचार करनेपर भी मुझे इन बढ़ी हुई प्रजाओंके संहारका कोई उपाय न सूझा, तब मुझे क्रोध आ गया ॥ ५ ॥

स्थाणुरुवाच

संहारार्थं प्रसीदस्व मा क्रुधो विबुधेश्वर ।
मा प्रजाः स्थावरं चैव जङ्गमं च व्यनीनशत् ॥ ६ ॥