भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2078, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2078

पञ्चानामिन्द्रियाणां तु दोषानाक्षिप्य पञ्चधा ।

शब्दं रूपं तथा स्पर्शं रसं गन्धं तथैव च ॥ १३ ॥

प्रतिभामपवर्गं च प्रतिसंहृत्य मैथिल ।

इन्द्रियग्राममखिलं मनस्यभिनिवेश्य ह ॥ १४ ॥

मनस्तथैवाहंकारे प्रतिष्ठाप्य नराधिप ।

अहंकारं तथा बुद्धौ बुद्धिं च प्रकृतावपि ॥ १५ ॥

एवं हि परिसंख्याय ततो ध्यायन्ति केवलम् ।

विरजस्कमलं नित्यमनन्तं शुद्धमव्रणम् ॥ १६ ॥

तस्थुषं पुरुषं नित्यमभेद्यमजरामरम् ।

शाश्वतं चाव्ययं चैव ईशानं ब्रह्म चाव्ययम् ॥ १७ ॥

मिथिलानरेश! शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये इन्द्रियोंके पाँच दोष हैं। इन

दोषोंको दूर करे। फिर लय और विक्षेपको शान्त करके सम्पूर्ण इन्द्रियोंको मनमें स्थिर करे।

नरेश्वर! तत्पश्चात् मनको अहंकारमें, अहंकारको बुद्धिमें और बुद्धिको प्रकृतिमें स्थापित

करे। इस प्रकार सबका लय करके योगी पुरुष केवल उस परमात्माका ध्यान करते हैं, जो

रजोगुणसे रहित, निर्मल, नित्य, अनन्त, शुद्ध, छिद्ररहित, कूटस्थ, अन्तर्यामी, अभेद्य,

अजर, अमर, अविकारी, सबका शासन करनेवाला और सनातन ब्रह्म है ॥

युक्तस्य तु महाराज लक्षणान्युपधारय ।

लक्षणं तु प्रसादस्य यथा तृप्तः सुखं स्वपेत् ॥ १८ ॥

महाराज! अब समाधिमें स्थित हुए योगीके लक्षण सुनो। जैसे तृप्त हुआ मनुष्य सुखसे

सोता है, उसी प्रकार योगयुक्त पुरुषके चित्तमें सदा प्रसन्नता बनी रहती है—वह समाधिसे

विरत होना नहीं चाहता। यही उसकी प्रसन्नताकी पहचान है ॥ १८ ॥

निर्वाते तु यथा दीपो ज्वलेत् स्नेहसमन्वितः ।

निश्चलोर्ध्वशिखस्तद्वद् युक्तमाहुर्मनीषिणः ॥ १९ ॥

जैसे तेलसे भरा हुआ दीपक वायुशून्य स्थानमें एकतार जलता रहता है। उसकी शिखा

स्थिरभावसे ऊपरकी ओर उठी रहती है, उसी तरह समाधिनिष्ठ योगीको भी मनीषी पुरुष

स्थिर बताते हैं ॥ १९ ॥

पाषाण इव मेघोत्थैर्यथा बिन्दुभिराहतः ।

नालं चालयितुं शक्यस्तथा युक्तस्य लक्षणम् ॥ २० ॥

जैसे बादलकी बरसायी हुई बूँदोंके आघातसे पर्वत चंचल नहीं होता, उसी तरह अनेक

प्रकारके विक्षेप आकर योगीको विचलित नहीं कर सकते। यही योगयुक्त पुरुषकी पहचान

है ॥ २० ॥

शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्विविधैर्गीतवादितैः ।

क्रियमाणैर्न कम्पेत युक्तस्यैतन्निदर्शनम् ॥ २१ ॥