भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2102

महत्तत्त्वकी उपासना करनेवाले महत्तत्त्वको और अहंकारके उपासक अहंकारको प्राप्त होते हैं; परंतु महत्तत्त्व और अहंकारसे भी श्रेष्ठ जो स्थान हैं, उन्हें प्राप्त करना चाहिये ॥ १०७ ॥

ये त्वव्यक्तात् परं नित्यं जानते शास्त्रतत्पराः ।
जन्ममृत्युविमुक्तं च विमुक्तं सदसच्च यत् ॥ १०८ ॥
जो शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर होते हैं, वे ही प्रकृतिसे पर, नित्य, जन्म-मृत्युसे रहित, मुक्त एवं सदसत्स्वरूप परमात्माका ज्ञान प्राप्त करते हैं ॥ १०८ ॥

एतन्मयाऽऽप्तं जनकात् पुरस्तात्
तेनापि चाप्तं नृप याज्ञवल्क्यात् ।
ज्ञानं विशिष्टं न तथा हि यज्ञा
ज्ञानेन दुर्गं तरते न यज्ञैः ॥ १०९ ॥
युधिष्ठिर! यह ज्ञान मुझे पूर्वकालमें राजा जनकसे मिला था और जनकको याज्ञवल्क्यजीसे प्राप्त हुआ था। ज्ञान सबसे उत्तम साधन है। यज्ञ इसकी समानता नहीं कर सकते। ज्ञानसे ही मनुष्य इस दुर्गम संसार-सागरसे पार हो सकता है; यज्ञोंद्वारा नहीं ॥ १०९ ॥

दुर्गं जन्म निधनं चापि राजन्
न भौतिकं ज्ञानविदो वदन्ति ।
यज्ञैस्तपोभिर्नियमैर्व्रतैश्च
दिवं समासाद्य पतन्ति भूमौ ॥ ११० ॥
राजन्! ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि भौतिक जन्म और मृत्युको पार करना अत्यन्त कठिन है। यज्ञ आदिके द्वारा भी मनुष्य उस दुर्गम संकटसे पार नहीं हो सकता। यज्ञ, तप, नियम और व्रतोंद्वारा तो लोग स्वर्गलोकमें जाते और पुण्य क्षीण होनेपर फिर इस पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं ॥ ११० ॥

तस्मादुपासस्व परं महच्छुचि
शिवं विमोक्षं विमलं पवित्रम् ।
क्षेत्रं ज्ञात्वा पार्थिव ज्ञानयज्ञ-
मुपास्य वै तत्त्वमृषिर्भविष्यसि ॥ १११ ॥
इसलिये तुम प्रकृतिसे पर, महत्, पवित्र, कल्याणमय, निर्मल, शुद्ध तथा मोक्षस्वरूप ब्रह्मकी उपासना करो। पृथ्वीनाथ! क्षेत्रको जानकर और ज्ञानयज्ञका आश्रय लेकर तुम निश्चय ही तत्त्वज्ञानी ऋषि बन जाओगे ॥ १११ ॥

यदुपनिषदमुपाकरोत् तथासौ
जनकनृपस्य पुरा हि याज्ञवल्क्यः ।
यदुपगणितशाश्वताव्ययं त-