भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2101

करके वे धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप, सत्य-असत्य तथा जन्म और मृत्युको व्यक्त (बुद्धि आदि) और अव्यक्त (प्रकृति) का कार्य मानकर सबको प्राकृत (प्रकृतिजन्य एवं मिथ्या) समझते हुए प्रकृतिसंसर्गसे रहित अपने शुद्ध एवं नित्य स्वरूपका ही चिन्तन करने लगे ।। ९८—१०० ।।

पश्यन्ति योगाः सांख्याश्च स्वशास्त्रकृतलक्षणाः ।
इष्टानिष्टविमुक्तं हि तस्थौ ब्रह्म परात्परम् ।। १०१ ।।
युधिष्ठिर! सांख्य और योगके विद्वान् अपने-अपने शास्त्रोंमें वर्णित लक्षणोंके अनुसार ऐसा देखते और समझते हैं कि वह ब्रह्म इष्ट और अनिष्टसे मुक्त, अचल-भावसे स्थित एवं परात्पर है ।। १०१ ।।

नित्यं तदाहुर्विद्वांसः शुचि तस्माच्छुचिर्भव ।
दीयते यच्च लभते दत्तं यच्चानुमन्यते ।। १०२ ।।
ददाति च नरश्रेष्ठ प्रतिगृह्णाति यच्च ह ।
ददात्यव्यक्त इत्येतत् प्रतिगृह्णाति तच्च वै ।। १०३ ।।
विद्वान् पुरुष उस ब्रह्मको नित्य एवं पवित्र बताते हैं; अतः तुम भी उसे जानकर पवित्र हो जाओ। नरश्रेष्ठ! जो कुछ दिया जाता है, जो दी हुई वस्तु किसीको प्राप्त होती है, जो दानका अनुमोदन करता है, जो देता है तथा जो उस दानको ग्रहण करता है, वह सब अव्यक्त परमात्मा ही है। परमात्मा ही यह सब कुछ देता और लेता है ।। १०२-१०३ ।।

आत्मा ह्येवात्मनो ह्येकः कोऽन्यस्तस्मात्परो भवेत् ।
एवं मन्यस्व सततमन्यथा मा विचिन्तय ।। १०४ ।।
युधिष्ठिर! एकमात्र परमात्मा ही अपना है। उससे बढ़कर आत्मीय दूसरा कौन हो सकता है। तुम सदा ऐसा ही मानो और इसके विपरीत दूसरी किसी बातका चिन्तन न करो ।। १०४ ।।

यस्याव्यक्तं न विदितं सगुणं निर्गुणं पुनः ।
तेन तीर्थानि यज्ञाश्च सेवितव्या विपश्चिता ।। १०५ ।।
जिसे अव्यक्त प्रकृतिका ज्ञान न हुआ हो, सगुण-निर्गुण परमात्माकी पहचान न हुई हो, उस विद्वान्‌को तीर्थोंका सेवन और यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये ।। १०५ ।।

न स्वाध्यायैस्तपोभिर्वा यज्ञैर्वा कुरुनन्दन ।
लभतेऽव्यक्तिकं स्थानं ज्ञात्वा व्यक्तं महीयते ।। १०६ ।।
कुरुनन्दन! स्वाध्याय, तप अथवा यज्ञोंद्वारा मोक्ष या परमात्मपदकी प्राप्ति नहीं होती (ये तो उनके तत्त्वको जाननेमें सहायक होते हैं)। इनके द्वारा परमात्माका स्पष्ट (अपरोक्ष) ज्ञान प्राप्त करके ही मनुष्य महिमान्वित होता है ।। १०६ ।।

तथैव महतः स्थानमाहङ्कारिकमेव च ।
अहङ्कारात् परं चापि स्थानानि समवाप्नुयात् ।। १०७ ।।