महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2100, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयत् ते पृष्टं तन्मया चोपदिष्टं याथातथ्यं तद्विशोको भवस्व। राजन् गच्छस्वैतदर्थस्य पारं सम्यक् प्रोक्तं स्वस्ति ते त्वस्तु नित्यम्॥ ९३॥ राजन्! तुमने जो पूछा था उसके उत्तरमें मैंने तुम्हें यथार्थ ज्ञानका उपदेश किया है; अतः अब तुम शोकरहित हो जाओ और इस तत्त्वज्ञानमें पारंगत बनो। मैंने तुम्हें ज्ञानका भलीभाँति उपदेश कर दिया है। जाओ, तुम्हारा सदा कल्याण हो॥ ९३॥
भीष्म उवाच
स एवमनुशास्तस्तु याज्ञवल्क्येन धीमता। प्रीतिमानभवद् राजा मिथिलाधिपतिस्तदा॥ ९४॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! बुद्धिमान् याज्ञ-वल्क्यजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर मिथिलापति राजा जनक उस समय बहुत प्रसन्न हुए॥ ९४॥ गते मुनिवरे तस्मिन् कृते चापि प्रदक्षिणम्। दैवरातिर्नरपतिरासीनस्तत्र मोक्षवित्॥ ९५॥ गोकोटिं स्पर्शयामास हिरण्यं तु तथैव च। रत्नाञ्जलिमथैकं च ब्राह्मणेभ्यो ददौ तदा॥ ९६॥ उन्होंने सत्कारपूर्वक मुनिकी प्रदक्षिणा करके उन्हें विदा किया। जब वे मुनिवर याज्ञवल्क्य चले गये, तब मोक्षके ज्ञाता देवरातनन्दन राजा जनकने वहीं बैठे-बैठे एक करोड़ गौएँ छूकर ब्राह्मणोंको दान कर दीं तथा प्रत्येक ब्राह्मणको एक-एक अंजलि रत्न और सुवर्ण प्रदान किये॥ ९५-९६॥ विदेहराज्यं च तदा प्रतिष्ठाप्य सुतस्य वै। यतिधर्ममुपासंश्राप्यवसन्मिथिलाधिपः॥ ९७॥ इसके बाद मिथिलानरेशने विदेहदेशका राज्य अपने पुत्रको सौंप दिया और स्वयं वे यति-धर्मका पालन करते हुए वहाँ रहने लगे॥ ९७॥ सांख्यज्ञानमधीयानो योगशास्त्रं च कृत्स्नशः। धर्माधर्मं च राजेन्द्र प्राकृतं परिगर्हयन्॥ ९८॥ अनन्त इति कृत्वा स नित्यं केवलमेव च। धर्माधर्मौ पुण्यपापे सत्यासत्ये तथैव च॥ ९९॥ जन्ममृत्यू च राजेन्द्र प्राकृतं तदचिन्तयत्। व्यक्ताव्यक्तस्य कर्मेदमिति नित्यं नराधिप॥ १००॥ राजेन्द्र! नरेश्वर! उन्होंने सम्पूर्ण सांख्य, ज्ञान और योगशास्त्रका स्वाध्याय करके प्राकृत धर्म और अधर्मको त्याज्य मानते हुए यह निश्चय किया कि 'मैं अनन्त हूँ।' ऐसा निश्चय