भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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एकत्रिंशोऽध्यायः

सुवर्णष्ठीवीके जन्म, मृत्यु और पुनर्जीवनका वृत्तान्त

वैशम्पायन उवाच

ततो राजा पाण्डुसुतो नारदं प्रत्यभाषत ।
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि सुवर्णष्ठीविसम्भवम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरने नारदजीसे कहा—'भगवन्! मैं सुवर्णष्ठीवीके जन्मका वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ' ॥ १ ॥

एवमुक्तस्तु स मुनिर्धर्मराजेन नारदः ।
आचचक्षे यथावृत्तं सुवर्णष्ठीविनं प्रति ॥ २ ॥
धर्मराजके ऐसा कहनेपर नारदमुनिने सुवर्णष्ठीवीके जन्मका यथावत् वृत्तान्त कहना आरम्भ किया ॥ २ ॥

नारद उवाच

एवमेतन्महाबाहो यथायं केशवोऽब्रवीत् ।
कार्यस्यास्य तु यच्छेषं तत् ते वक्ष्यामि पृच्छतः ॥ ३ ॥
**नारदजी बोले—**महाबाहो! भगवान् श्रीकृष्णने इस विषयमें जैसा कहा है, वह सब सत्य है। इस प्रसङ्गमें जो कुछ शेष है, वह तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैं बता रहा हूँ ॥ ३ ॥

अहं च पर्वतश्चैव स्वस्रीयो मे महामुनिः ।
वस्तुकामावभिगतौ सृञ्जयं जयतां वरम् ॥ ४ ॥
मैं और मेरे भानजे महामुनि पर्वत दोनों विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ राजा सृंजयके यहाँ निवास करनेके लिये गये ॥

तत्रावां पूजितौ तेन विधिदृष्टेन कर्मणा ।
सर्वकामैः सुविहितौ निवसावोऽस्य वेश्मनि ॥ ५ ॥
वहाँ राजाने हम दोनोंका शास्त्रीय विधिके अनुसार पूजन किया और हमारे लिये सभी मनोवाञ्छित वस्तुओंके प्राप्त होनेकी सुव्यवस्था कर दी। हम दोनों उनके महलमें रहने लगे ॥ ५ ॥

व्यतिक्रान्तासु वर्षासु समये गमनस्य च ।
पर्वतो मामुवाचेदं काले वचनमर्थवत् ॥ ६ ॥
जब वर्षाके चार महीने बीत गये और हमलोगोंके वहाँसे चलनेका समय आया, तब पर्वतने मुझसे समयोचित एवं सार्थक वचन कहा— ॥ ६ ॥

आवामस्य नरेन्द्रस्य गृहे परमपूजितौ ।