महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 216)
एकत्रिंशोऽध्यायः
सुवर्णष्ठीवीके जन्म, मृत्यु और पुनर्जीवनका वृत्तान्त
वैशम्पायन उवाच
ततो राजा पाण्डुसुतो नारदं प्रत्यभाषत ।
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि सुवर्णष्ठीविसम्भवम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरने नारदजीसे कहा—'भगवन्! मैं सुवर्णष्ठीवीके जन्मका वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ' ॥ १ ॥
एवमुक्तस्तु स मुनिर्धर्मराजेन नारदः ।
आचचक्षे यथावृत्तं सुवर्णष्ठीविनं प्रति ॥ २ ॥
धर्मराजके ऐसा कहनेपर नारदमुनिने सुवर्णष्ठीवीके जन्मका यथावत् वृत्तान्त कहना आरम्भ किया ॥ २ ॥
नारद उवाच
एवमेतन्महाबाहो यथायं केशवोऽब्रवीत् ।
कार्यस्यास्य तु यच्छेषं तत् ते वक्ष्यामि पृच्छतः ॥ ३ ॥
**नारदजी बोले—**महाबाहो! भगवान् श्रीकृष्णने इस विषयमें जैसा कहा है, वह सब सत्य है। इस प्रसङ्गमें जो कुछ शेष है, वह तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैं बता रहा हूँ ॥ ३ ॥
अहं च पर्वतश्चैव स्वस्रीयो मे महामुनिः ।
वस्तुकामावभिगतौ सृञ्जयं जयतां वरम् ॥ ४ ॥
मैं और मेरे भानजे महामुनि पर्वत दोनों विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ राजा सृंजयके यहाँ निवास करनेके लिये गये ॥
तत्रावां पूजितौ तेन विधिदृष्टेन कर्मणा ।
सर्वकामैः सुविहितौ निवसावोऽस्य वेश्मनि ॥ ५ ॥
वहाँ राजाने हम दोनोंका शास्त्रीय विधिके अनुसार पूजन किया और हमारे लिये सभी मनोवाञ्छित वस्तुओंके प्राप्त होनेकी सुव्यवस्था कर दी। हम दोनों उनके महलमें रहने लगे ॥ ५ ॥
व्यतिक्रान्तासु वर्षासु समये गमनस्य च ।
पर्वतो मामुवाचेदं काले वचनमर्थवत् ॥ ६ ॥
जब वर्षाके चार महीने बीत गये और हमलोगोंके वहाँसे चलनेका समय आया, तब पर्वतने मुझसे समयोचित एवं सार्थक वचन कहा— ॥ ६ ॥
आवामस्य नरेन्द्रस्य गृहे परमपूजितौ ।
उषितौ समये ब्रह्मंस्तद् विचिन्तय साम्प्रतम् ॥ ७ ॥ 'मामा! हमलोग राजा सृंजयके घरमें बड़े आदर-सत्कारके साथ रहे हैं, अतः ब्रह्मन्! इस समय इनका कुछ उपकार करनेकी बात सोचिये' ॥ ७ ॥
ततोऽहमब्रुवं राजन् पर्वतं शुभदर्शनम् । सर्वमेतत् त्वयि विभो भागिनेयोपपद्यते ॥ ८ ॥ राजन्! तब मैंने शुभदर्शी पर्वत मुनिसे कहा—'भगिनीपुत्र! यह सब तुम्हें ही शोभा देता है ॥ ८ ॥
वरेण च्छन्द्यतां राजा लभतां यद् यदिच्छति । आवयोस्तपसा सिद्धिं प्राप्नोतु यदि मन्यसे ॥ ९ ॥ 'राजाको मनोवाञ्छित वर देकर संतुष्ट करो। वे जो-जो चाहते हैं, वह सब उन्हें मिले। तुम्हारी राय हो तो हम दोनोंकी तपस्यासे उनके मनोरथकी सिद्धि हो' ॥
तत आहूय राजानं संजयं जयतां वरम् । पर्वतोऽनुमतो वाक्यमुवाच कुरुपुङ्गव ॥ १० ॥ कुरुश्रेष्ठ! तब मेरी अनुमति ले पर्वतने विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ राजा सृंजयको बुलाकर कहा— ॥ १० ॥
प्रीतौ स्वो नृप सत्कारैर्भवदार्जवसम्भृतैः । आवाभ्यामभ्यनुज्ञातो वरं नृवर चिन्तय ॥ ११ ॥ 'नरेश्वर! हम दोनों तुम्हारे द्वारा सरलतापूर्वक किये गये सत्कारसे बहुत प्रसन्न हैं। हम तुम्हें आज्ञा देते हैं कि तुम इच्छानुसार कोई वर सोचकर माँग लो ॥ ११ ॥
देवानांमविहिंसायां न भवेन्मानुषक्षयम् । तद् गृहाण महाराज पूजार्हो नौ मतो भवान् ॥ १२ ॥ महाराज! कोई ऐसा वर माँग लो, जिससे न तो देवताओंकी हिंसा हो और न मनुष्योंका संहार ही हो सके। तुम हमारी दृष्टिमें आदरके योग्य हो' ॥ १२ ॥
संजय उवाच
प्रीतौ भवन्तौ यदि मे कृतमेतावता मम । एष एव परो लाभो निर्वृत्तौ मे महाफलः ॥ १३ ॥ **संजयने कहा—**ब्रह्मन्! यदि आप दोनों प्रसन्न हैं तो मैं इतनेसे ही कृतकृत्य हो गया। यही हमारे लिये महान् फलदायक परम लाभ सिद्ध हो गया ॥ १३ ॥
तमेवंवादिनं भूयः पर्वतः प्रत्यभाषत । वृणीष्व राजन् संकल्पं यत् ते हृदि चिरं स्थितम् ॥ १४ ॥ राजन्! ऐसी बात कहनेवाले राजा सृंजयसे पर्वतमुनिने फिर कहा—'राजन्! तुम्हारे हृदयमें जो चिरकालसे संकल्प हो, वही माँग लो' ॥ १४ ॥
संजय उवाच
अभीप्सामि सुतं वीरं वीरवन्तं दृढव्रतम् । आयुष्मन्तं महाभागं देवराजसमद्युतिम् ॥ १५ ॥ संजय बोले— भगवन्! मैं एक ऐसा पुत्र पाना चाहता हूँ, जो वीर, बलवान्, दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाला, आयुष्मान्, परम सौभाग्यशाली और देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी हो ॥ १५ ॥
पर्वत उवाच
भविष्यत्येष ते कामो न त्वायुष्मान् भविष्यति । देवराजाभिभूत्यर्थं संकल्पो ह्येष ते हृदि ॥ १६ ॥ पर्वतने कहा— राजन्! तुम्हारा यह मनोरथ पूर्ण होगा, परंतु वह पुत्र दीर्घायु नहीं हो सकेगा; क्योंकि देवराज इन्द्रको पराजित करनेके लिये तुम्हारे हृदयमें यह संकल्प उठा है ॥ १६ ॥
ख्यातः सुवर्णष्ठीवीति पुत्रस्तव भविष्यति । रक्ष्यश्च देवराजात् स देवराजसमद्युतिः ॥ १७ ॥ तुम्हारा वह पुत्र सुवर्णष्ठीवीके नामसे विख्यात तथा देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी होगा। तुम्हें देवराजसे सदा उसकी रक्षा करनी चाहिये ॥ १७ ॥
तच्छ्रुत्वा संजयो वाक्यं पर्वतस्य महात्मनः । प्रसादयामास तदा नैतदेवं भवेदिति ॥ १८ ॥ आयुष्मान् मे भवेत् पुत्रो भवतस्तपसा मुने । न च तं पर्वतः किंचिदुवाचेन्द्रव्यपेक्षया ॥ १९ ॥ महात्मा पर्वतका यह वचन सुनकर संजयने उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा करते हुए कहा—‘ऐसा न हो। मुने! आपकी तपस्यासे मेरा पुत्र दीर्घजीवी होना चाहिये।’ परंतु इन्द्रका ख्याल करके पर्वत मुनि कुछ नहीं बोले ॥ १८-१९ ॥
तमहं नृपतिं दीनमब्रुवं पुनरेव च । स्मर्त्तव्योऽस्मि महाराज दर्शयिष्यामि ते सुतम् ॥ २० ॥ अहं ते दयितं पुत्रं प्रेतराजवशं गतम् । पुनर्दास्यामि तद्रूपं मा शुचः पृथिवीपते ॥ २१ ॥ तब मैंने दीन हुए उस नरेशसे कहा—‘महाराज! संकटके समय मुझे याद करना। मैं तुम्हारे पुत्रको तुमसे मिला दूँगा। पृथ्वीनाथ! चिन्ता न करो। यमराजके वशमें पड़े हुए तुम्हारे उस प्रिय पुत्रको मैं पुनः उस रूपमें लाकर तुम्हें दे दूँगा’ ॥ २०-२१ ॥
एवमुक्त्वा तु नृपतिं प्रयातौ स्वो यथेप्सितम् । संजयश्च यथाकामं प्रविवेश स्वमन्दिरम् ॥ २२ ॥
राजासे ऐसा कहकर हम दोनों अपने अभीष्ट स्थानको चल दिये और राजा सृंजयने अपने इच्छानुसार महलमें प्रवेश किया ॥ २२ ॥ संजयस्याथ राजर्षेः कस्मिंश्चित् कालपर्यये । जज्ञे पुत्रो महावीर्यस्तेजसा प्रज्वलन्निव ॥ २३ ॥ तदनन्तर किसी समय राजर्षि सृंजयके एक पुत्र हुआ, जो अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था। वह महान् बलशाली था ॥ २३ ॥ ववृधे स यथाकालं सरसीव महोत्पलम् । बभूव काञ्चनष्ठीवी यथार्थं नाम तस्य तत् ॥ २४ ॥ जैसे सरोवरमें कमल बढ़ता है, उसी प्रकार वह राजकुमार यथासमय बढ़ने लगा। वह मुखसे स्वर्ण उगलनेके कारण सुवर्णष्ठीवी नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसका वह नाम सार्थक था ॥ २४ ॥ तदद्भुततमं लोके पप्रथे कुरुसत्तम । बुबुधे तच्च देवेन्द्रो वरदानं महर्षितः ॥ २५ ॥ कुरुश्रेष्ठ! उसका वह अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त सारे जगत्में फैल गया। देवराज इन्द्रको भी यह मालूम हो गया कि वह बालक महर्षि पर्वतके वरदानका फल है ॥ ततः स्वाभिभवाद् भीतो बृहस्पतिमते स्थितः । कुमारस्यान्तरप्रेक्षी बभूव बलवृत्रहा ॥ २६ ॥ तदनन्तर अपनी पराजयसे डरकर बृहस्पतिकी सम्मतिके अनुसार चलते हुए बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्र उस राजकुमारके वधका अवसर देखने लगे ॥ २६ ॥ चोदयामास तद् वज्रं दिव्यास्त्रं मूर्तिमत् स्थितम् । व्याघ्रो भूत्वा जहीमं त्वं राजपुत्रमिति प्रभो ॥ २७ ॥ प्रवृद्धः किल वीर्येण मामेषोऽभिभविष्यति । संजयस्य सुतो वज्र यथैनं पर्वतोऽब्रवीत् ॥ २८ ॥ प्रभो! इन्द्रने मूर्तिमान् होकर सामने खड़े हुए अपने दिव्य अस्त्र वज्रसे कहा—'वज्र! तुम बाघ बनकर इस राजकुमारको मार डालो। जैसा कि इसके विषयमें पर्वतने बताया है, बड़ा होनेपर सृंजयका यह पुत्र अपने पराक्रमसे मुझे परास्त कर देगा' ॥ २७-२८ ॥ एवमुक्तस्तु शक्रेण वज्रः परपुरञ्जयः । कुमारमन्तरप्रेक्षी नित्यमेवान्वपद्यत ॥ २९ ॥ इन्द्रके ऐसा कहनेपर शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाला वज्र मौका देखता हुआ सदा उस राजकुमारके आस-पास ही रहने लगा ॥ २९ ॥ संजयोऽपि सुतं प्राप्य देवराजसमद्युतिम् । हृष्टः सान्तःपुरो राजा वननित्यो बभूव ह ॥ ३० ॥
सृंजय भी देवराजके समान पराक्रमी पुत्र पाकर रानी-सहित बड़े प्रसन्न हुए और निरन्तर वनमें ही रहने लगे।
ततो भागीरथीतीरे कदाचिन्निर्जने वने ।
धात्रीद्वितीयो बालः स क्रीडार्थं पर्यधावत ॥ ३१ ॥
तदनन्तर एक दिन निर्जन वनमें गङ्गाजीके तटपर वह बालक धायको साथ लेकर खेलनेके लिये गया और इधर-उधर दौड़ने लगा ॥ ३१ ॥
पञ्चवर्षकदेशीयो बालो नागेन्द्रविक्रमः ।
सहसोत्पतितं व्याघ्रमाससाद महाबलम् ॥ ३२ ॥
उस बालककी अवस्था अभी पाँच वर्षकी थी तो भी वह गजराजके समान पराक्रमी था। वह सहसा उछलकर आये हुए एक महाबली बाघके पास जा पहुँचा ॥ ३२ ॥
स बालस्तेन निष्पिष्टो वेपमानो नृपात्मजः ।
व्यसुः पपात मेदिन्यां ततो धात्री विचुक्रुशे ॥ ३३ ॥
उस बाघने वहाँ काँपते हुए राजकुमारको गिराकर पीस डाला। वह प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। यह देखकर धाय चिल्ला उठी ॥ ३३ ॥
हत्वा तु राजपुत्रं स तत्रैवान्तरधीयत ।
शार्दूलो देवराजस्य माययान्तर्हितस्तदा ॥ ३४ ॥
राजकुमारकी हत्या करके देवराज इन्द्रका भेजा हुआ वह वज्ररूपी बाघ मायासे वहीं अदृश्य हो गया ॥
धात्र्यास्तु निनदं श्रुत्वा रुदत्याः परमार्तवत् ।
अभ्यधावत तं देशं स्वयमेव महीपतिः ॥ ३५ ॥
रोती हुई धायका वह आर्तनाद सुनकर राजा सृंजय स्वयं ही उस स्थानपर दौड़े हुए आये ॥ ३५ ॥
स ददर्श शयानं तं गतासुं पीतशोणितम् ।
कुमारं विगतानन्दं निशाकरमिव च्युतम् ॥ ३६ ॥
उन्होंने देखा, राजकुमार प्राणशून्य होकर आकाशसे गिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति पड़ा है। उसका सारा रक्त बाघके द्वारा पी लिया गया है और वह आनन्दहीन हो गया है ॥ ३६ ॥
स तमुत्सङ्गमारोप्य परिपीडितमानसः ।
पुत्रं रुधिरसंसिक्तं पर्यदेवयदातुरः ॥ ३७ ॥
खूनसे लथपथ हुए उस बालकको गोदमें लेकर व्यथितचित्त हुए राजा सृंजय व्याकुल होकर विलाप करने लगे ॥
ततस्ता मातरस्तस्य रुदत्यः शोककर्शिताः ।
अभ्यधावन्त तं देशं यत्र राजा स सृंजयः ॥ ३८ ॥
तदनन्तर शोकसे पड़ित हो उसकी माताएँ रोती हुई उस स्थानकी ओर दौड़ीं, जहाँ राजा सृंजय विलाप करते थे ।। ततः स राजा सस्मार मामेव गतमानसः । तदाहं चिन्तनं ज्ञात्वा गतवांस्तस्य दर्शनम् ।। ३९ ।। उस समय अचेत-से होकर राजाने मेरा ही स्मरण किया। तब मैंने उनका चिन्तन जानकर उन्हें दर्शन दिया ।।
मयैतानि च वाक्यानि श्रावितः शोकलालसः । यानि ते यदुवीरेण कथितानि महीपते ।। ४० ।। पृथ्वीनाथ! यदुवीर श्रीकृष्णने जो बातें तुम्हारे सामने कही हैं, उन्हींको मैंने उस शोकाकुल राजाको सुनाया ।। संजीवितश्चापि पुनर्वासवानुमते तदा । भवितव्यं तथा तच्च न तच्छक्यमतोऽन्यथा ।। ४१ ।।
फिर इन्द्रकी अनुमतिसे उस बालकको जीवित भी कर दिया। उसकी वैसी ही होनहार थी। उसे कोई पलट नहीं सकता था ॥ ४१ ॥
तत ऊर्ध्वं कुमारस्तु सुवर्णष्ठीवी महायशाः ।
चित्तं प्रसादयामास पितुर्मातुश्च वीर्यवान् ॥ ४२ ॥
तदनन्तर महायशस्वी और शक्तिशाली कुमार सुवर्णष्ठीवीने जीवित होकर पिता और माताके चित्तको प्रसन्न किया ॥ ४२ ॥
कारयामास राज्यं च पितरि स्वर्गते नृप ।
वर्षाणां शतमेकं च सहस्रं भीमविक्रमः ॥ ४३ ॥
नरेश्वर! उस भयानक पराक्रमी कुमारने पिताके स्वर्ग-वासी हो जानेपर ग्यारह सौ वर्षोंतक राज्य किया ॥ ४३ ॥
तत ईजे महायज्ञैर्बहुभिर्भूरिदक्षिणैः ।
तर्पयामास देवांश्च पितूंश्चैव महाद्युतिः ॥ ४४ ॥
तदनन्तर उस महातेजस्वी राजकुमारने बहुत-सी दक्षिणावाले अनेक महायज्ञोंका अनुष्ठान किया और उनके द्वारा देवताओं तथा पितरोंकी तृप्ति की ॥ ४४ ॥
उत्पाद्य च बहून् पुत्रान् कुलसंतानकारिणः ।
कालेन महता राजन् कालधर्ममुपेयिवान् ॥ ४५ ॥
राजन्! इसके बाद उसने बहुत-से वंशप्रवर्तक पुत्र उत्पन्न किये और दीर्घकालके पश्चात् वह काल-धर्मको प्राप्त हुआ ॥ ४५ ॥
स त्वं राजेन्द्र संजातं शोकमेनं निवर्तय ।
यथा त्वां केशवः प्राह व्यासश्च सुमहातपाः ॥ ४६ ॥
पितृपैतामहं राज्यमास्थाय धुरमुद्वह ।
इष्ट्वा पुण्यैर्महायज्ञैरिष्टं लोकमवाप्स्यसि ॥ ४७ ॥
राजेन्द्र! तुम भी अपने हृदयमें उत्पन्न हुए इस शोकको दूर करो तथा भगवान् श्रीकृष्ण और महातपस्वी व्यासजी जैसा कह रहे हैं, उसके अनुसार अपने बाप-दादोंके राज्यपर आरूढ़ हो इसका भार वहन करो; फिर पुण्यदायक महायज्ञोंका अनुष्ठान करके तुम अभीष्ट लोकमें चले जाओगे ॥ ४६-४७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सुवर्णष्ठीविसम्भवोपाख्याने एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सुवर्णष्ठीवीके जन्मका उपाख्यानविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
तपस्वी धर्मतत्त्वज्ञः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ १ ॥
द्वात्रिंशोऽध्यायः
व्यासजीका अनेक युक्तियोंसे राजा युधिष्ठिरको समझाना
वैशम्पायन उवाच
तूष्णींभूतं तु राजानं शोचमानं युधिष्ठिरम् ।
तपस्वी धर्मतत्त्वज्ञः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा युधिष्ठिरको चुपचाप शोकमें डूबा हुआ देख धर्मके तत्त्वको जाननेवाले तपोधन श्रीकृष्णद्वैपायनने कहा ॥ १ ॥
व्यास उवाच
प्रजानां पालनं धर्मो राज्ञां राजीवलोचन ।
धर्मः प्रमाणं लोकस्य नित्यं धर्मानुवर्तिनः ॥ २ ॥
व्यासजी बोले— कमलनयन युधिष्ठिर! राजाओंका धर्म प्रजाजनोंका पालन करना ही है। धर्मका अनुसरण करनेवाले लोगोंके लिये सदा धर्म ही प्रमाण है ॥ २ ॥
अनुतिष्ठस्व तद् राजन् पितृपैतामहं पदम् ।
ब्राह्मणेषु तपो धर्मः स नित्यो वेदनिश्चितः ॥ ३ ॥
अतः राजन्! तुम अपने बाप-दादोंके राज्यको ग्रहण करके उसका धर्मानुसार पालन करो। तपस्या तो ब्राह्मणोंका नित्य धर्म है। यही वेदका निश्चय है ॥ ३ ॥
तत् प्रमाणं ब्राह्मणानां शाश्वतं भरतर्षभ ।
तस्य धर्मस्य कृत्स्नस्य क्षत्रियः परिरक्षिता ॥ ४ ॥
भरतश्रेष्ठ! वह सनातन तप ब्राह्मणोंके लिये प्रमाणभूत धर्म है। क्षत्रिय तो उस सम्पूर्ण ब्राह्मण-धर्मकी रक्षा करनेवाला ही है ॥ ४ ॥
यः स्वयं प्रतिहन्ति स्म शासनं विषये रतः ।
स बाहुभ्यां विनिग्राह्यो लोकयात्राविघातकः ॥ ५ ॥
जो मनुष्य विषयासक्त होकर स्वयं शासन-धर्मका उल्लंघन करता है, वह लोकमर्यादाका नाश करनेवाला है। क्षत्रियको चाहिये कि अपनी दोनों भुजाओंके बलसे उस धर्मद्रोहीका दमन करे ॥ ५ ॥
प्रमाणमप्रमाणं यः कुर्यान्मोहवशं गतः ।
भृत्यो वा यदि वा पुत्रस्तपस्वी वाथ कश्चन ॥ ६ ॥
पापान् सर्वैरुपायैस्तान् नियच्छेच्छात्तयीत वा ।
जो मोहके वशीभूत हो प्रमाणभूत धर्म और उसका प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रको अमान्य कर दें, वह सेवक हो या पुत्र, तपस्वी हो या और कोई; सभी उपायोंसे उन पापियोंका दमन करे अथवा उन्हें नष्ट कर डाले ।। ६ १/२ ।।
अतोऽन्यथा वर्तमानो राजा प्राप्नोति किल्बिषम् ।। ७ ।।
धर्मं विनश्यमानं हि यो न रक्षेत् स धर्महा ।
इसके विपरीत आचरण करनेवाला राजा पापका भागी होता है, जो नष्ट होते हुए धर्मकी रक्षा नहीं करता, वह राजा धर्मका घात करनेवाला है ।। ७ १/२ ।।
ते त्वया धर्महन्तारो निहताः सपदानुगाः ।। ८ ।।
स्वधर्मे वर्तमानस्त्वं किं नु शोचसि पाण्डव ।
राजा हि हन्याद् दद्याच्च प्रजा रक्षेच्च धर्मतः ।। ९ ।।
पाण्डुनन्दन! तुमने तो उन्हीं लोगोंका सेवकोंसहित वध किया है, जो धर्मका नाश करनेवाले थे। अपने धर्ममें स्थित रहते हुए भी तुम शोक क्यों कर रहे हो? क्योंकि राजाका यह कर्तव्य ही है कि वह धर्मद्रोहियोंका वध करे, सुपात्रोंको दान दे और धर्मके अनुसार प्रजाकी रक्षा करे ।।
युधिष्ठिर उवाच
न तेऽभिशंके वचनं यद् ब्रवीषि तपोधन ।
अपरोक्षो हि ते धर्मः सर्वधर्मविदां वर ।। १० ।।
युधिष्ठिर बोले— सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ तपोधन! आपको धर्मके स्वरूपका प्रत्यक्ष ज्ञान है। आप जो बात कह रहे हैं, उसपर मुझे तनिक भी संदेह नहीं है ।। १० ।।
मया त्ववध्या बहवो घातिता राज्यकारणात् ।
तानि कर्माणि मे ब्रह्मन् दहन्ति च पचन्ति च ।। ११ ।।
परंतु ब्रह्मन्! मैंने तो इस राज्यके लिये अनेक अवध्य पुरुषोंका भी वध करा डाला है। मेरे वे ही कर्म मुझे जलाते और पकाते हैं ।। ११ ।।
व्यास उवाच
ईश्वरो वा भवेत् कर्ता पुरुषो वापि भारत ।
हठो वा वर्तते लोके कर्मजं वा फलं स्मृतम् ।। १२ ।।
व्यासजीने कहा— भरतनन्दन! जो लोग मारे गये हैं, उनके वधका उत्तरदायित्व किसपर है? इस प्रश्नको लेकर चार विकल्प हो सकते हैं। (१) सबका प्रेरक ईश्वर कर्ता है? या (२) वध करनेवाला पुरुष कर्ता है? अथवा (३) मारे जानेवाले पुरुषका हठ (बिना विचारे किसी कामको कर डालनेका दुराग्रही स्वभाव) कर्ता है? अथवा (४) उसके प्रारब्ध कर्मका फल इस रूपमें प्राप्त होनेके कारण प्रारब्ध ही कर्ता है? ।। १२ ।।
ईश्वरेण नियुक्तो हि साध्वसाधु च भारत ।
कुरुते पुरुषः कर्म फलमीश्वरगामि तत् ॥ १३ ॥
(१) भारत! यदि प्रेरक ईश्वरको कर्ता माना जाय तब तो यही कहना पड़ेगा कि ईश्वरसे प्रेरित होकर ही मनुष्य शुभ या अशुभ कर्म करता है; अतः उसका फल भी ईश्वरको ही मिलना चाहिये ॥ १३ ॥
यथा हि पुरुषश्छिन्द्याद् वृक्षं परशुना वने ।
छेत्तुरेव भवेत् पापं परशोर्न कथञ्चन ॥ १४ ॥
जैसे कोई पुरुष वनमें कुल्हाड़ीद्वारा जब किसी वृक्षको काटता है, तब उसका पाप कुल्हाड़ी चलानेवाले पुरुषको ही लगता है। कुल्हाड़ीको किसी प्रकार नहीं लगता ॥ १४ ॥
अथवा तदुपादानात् प्राप्नुयात् कर्मणः फलम् ।
दण्डशस्त्रकृतं पापं पुरुषे तन्न विद्यते ॥ १५ ॥
अथवा यदि कहें कि 'उस कुल्हाड़ीको ग्रहण करनेके कारण चेतन पुरुषको ही उस हिंसाकर्मका फल प्राप्त होगा (जड होनेके कारण कुल्हाड़ीको नहीं)', तब तो जिसने उस शस्त्रको बनाया और जिसने उसमें डंडा लगाया, वह पुरुष ही प्रधान प्रयोजक होनेके कारण उसीको उस कर्मका फल मिलना चाहिये। चलानेवाले पुरुषपर उसका कोई उत्तरदायित्व नहीं है ॥ १५ ॥
न चैतदिष्टं कौन्तेय यदन्येन कृतं फलम् ।
प्राप्नुयादिति यस्माच्च ईश्वरे तन्निवेशय ॥ १६ ॥
परंतु कुन्तीनन्दन! यह अभीष्ट नहीं है कि दूसरेके द्वारा किये हुए कर्मका फल दूसरेको मिले (काटनेवालेका अपराध हथियार बनानेवालेपर थोपा जाय); इसलिये सर्वप्रेरक ईश्वरको ही सारे शुभाशुभ कर्मोंका कर्तृत्व और फल सौंप दो ॥ १६ ॥
अथापि पुरुषः कर्ता कर्मणोः शुभपापयोः ।
न परो विद्यते तस्मादेवमेतच्छुभं कृतम् ॥ १७ ॥
(२) यदि कहो पुण्य और पापकर्मोंका कर्ता उसे करनेवाला पुरुष ही है, दूसरा कोई (ईश्वर) नहीं तो ऐसा माननेपर भी तुमने यह शुभ कर्म ही किया है; क्योंकि तुम्हारे द्वारा पापियों और उनके समर्थकोंका ही वध हुआ है, इसके सिवा, उनके प्रारब्धका फल ही उन्हें इस रूपमें मिला है तुम तो निमित्तमात्र हो ॥ १७ ॥
न हि कश्चित् क्वचिद् राजन् दिष्टं प्रतिनिवर्तते ।
दण्डशस्त्रकृतं पापं पुरुषे तन्न विद्यते ॥ १८ ॥
राजन्! कोई कहीं भी दैवके विधानका उल्लंघन नहीं कर सकता। अतः दण्ड अथवा शस्त्रद्वारा किया हुआ पाप किसी पुरुषको लागू नहीं हो सकता (क्योंकि वे दैवाधीन होकर ही दण्ड या शस्त्रद्वारा मारे गये हैं) ॥
यदि वा मन्यसे राजन् हतमेकं प्रतिष्ठितम् ।
एवमप्यशुभं कर्म न भूतं न भविष्यति ॥ १९ ॥
(३) नरेश्वर! यदि ऐसा मानते हो कि युद्ध करनेवाले दो व्यक्तियोंमेंसे एकका मरना निश्चित ही है, अर्थात् वह स्वभाववश हठात् मारा गया है, तब तो स्वभाववादीके अनुसार भूत या भविष्य कालमें किसी अशुभ कर्मसे न तो तुम्हारा सम्पर्क था और न होगा ही ।।
अथाभिपत्तिर्लोकस्य कर्तव्या पुण्यपापयोः । अभिपन्नमिदं लोके राज्ञामुद्यतदण्डनम् ॥ २० ॥
(४) यदि कहो, लोगोंको जो पुण्यफल (सुख) और पापफल (दुःख) प्राप्त होते हैं, उनकी संगति लगानी चाहिये; क्योंकि बिना कारणके तो कोई कार्य हो नहीं सकता; अतः प्रारब्ध ही कर्ता है तो उस कारणभूत प्रारब्धको धर्माधर्म रूप ही मानना होगा, धर्माधर्मका निर्णय शास्त्रसे ही होता है और शास्त्रके अनुसार जगत्में उद्दण्ड मनुष्योंको दण्ड देना राजाओंके लिये सर्वथा युक्तिसंगत है; अतः किसी भी दृष्टिसे तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ।। २० ।।
तथापि लोके कर्माणि समावर्तन्ति भारत । शुभाशुभफलं चैते प्राप्नुवन्तीति मे मतिः ॥ २१ ॥ एवमप्यशुभं कर्म कर्मणस्तत्फलात्मकम् । त्यज त्वं राजशार्दूल मैवं शोके मनः कृथाः ॥ २२ ॥
भारत! नृपश्रेष्ठ! यदि कहो कि यह सब माननेपर भी लोकमें कर्मोंकी आवृत्ति होती ही है—लोग कर्म करते और उनके शुभाशुभ फलोंको पाते ही हैं—ऐसा मेरा मत है; तो इसके उत्तरमें निवेदन है कि इस दशामें भी जिस कर्मके कारण उसके फलरूपसे अशुभकी प्राप्ति होती है, उस पापमूलक कर्मको ही तुम त्याग दो। अपने मनको शोकमें न डुबाओ ।। २१-२२ ।।
स्वधर्मे वर्तमानस्य सापवादेऽपि भारत । एवमात्मपरित्यागस्तव राजन् न शोभनः ॥ २३ ॥
राजन्! भरतनन्दन! अपना धर्म दोषयुक्त हो तो भी उसमें स्थित रहनेवाले तुम-जैसे धर्मात्मा नरेशके लिये अपने शरीरका परित्याग करना शोभाकी बात नहीं है ।।
विहितानि हि कौन्तेय प्रायश्चित्तानि कर्मणाम् । शरीरवांस्तानि कुर्यादशरीरः पराभवेत् ॥ २४ ॥
कुन्तीनन्दन! यदि युद्ध आदिमें राग-द्वेषके कारण निन्द्यकर्म बन गये हों तो शास्त्रोंमें उन कर्मोंके लिये प्रायश्चित्तका भी विधान है। जो अपने शरीरको सुरक्षित रखता है, वह तो पापनिवारणके लिये प्रायश्चित्त कर सकता है; परंतु जिसका शरीर ही नहीं रहेगा, उसे तो प्रायश्चित्त न कर सकनेके कारण उन पापकर्मोंके फलस्वरूप पराभव (दुःख) ही प्राप्त होगा ।। २४ ।।
तद् राजन् जीवमानस्त्वं प्रायश्चित्तं करिष्यसि । प्रायश्चित्तमकृत्वा तु प्रेत्य तप्तासि भारत ॥ २५ ॥
भरतवंशी नरेश! यदि जीवित रहोगे तो उन कर्मोंका प्रायश्चित्त कर लोगे और यदि प्रायश्चित्तके बिना ही मर गये तो परलोकमें तुम्हें संतप्त होना पड़ेगा ।। २५ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि प्रायश्चित्तविधौ द्वात्रिंशोऽध्यायः ।। ३२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें प्रायश्चित्तविधिविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३२ ।।
व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना
युधिष्ठिर उवाच
हताः पुत्राश्च पौत्राश्च भ्रातरः पितरस्तथा ।
श्वशुरा गुरवश्चैव मातुलाश्च पितामहाः ॥ १ ॥
क्षत्रियाश्च महात्मानः सम्बन्धि सुहृदस्तथा ।
वयस्या भागिनेयाश्च ज्ञातयश्च पितामह ॥ २ ॥
बहवश्च मनुष्येन्द्रा नानादेशसमागताः ।
घातिता राज्यलुब्धेन मयैकेन पितामह ॥ ३ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**पितामह! अकेले मैंने ही राज्यके लोभमें आकर पुत्र, पौत्र, भाई, चाचा, ताऊ, श्वशुर, गुरु, मामा, बाबा, भानजे, सगे-सम्बन्धी, सुहृद्, मित्र तथा भाई-बन्धु आदि नाना देशोंसे आये हुए बहुसंख्यक क्षत्रियनरेशोंको मरवा डाला ॥ १—३ ॥
तांस्तादृशानहं हत्वा धर्मनित्यान् महीक्षितः ।
असकृत् सोमपान् वीरान् किं प्राप्स्यामि तपोधन ॥ ४ ॥
तपोधन! जो अनेक बार सोमरसका पान कर चुके थे और सदा धर्ममें ही तत्पर रहते थे, वैसे वीर भूपालोंका वध करके मैं कौन-सा फल पाऊँगा? ॥ ४ ॥
दह्याम्यनिशमद्यापि चिन्तयानः पुनः पुनः ।
हीनां पार्थिवसिंहैस्तैः श्रीमद्भिः पृथिवीमिमाम् ॥ ५ ॥
दृष्ट्वा ज्ञातिवधं घोरं हतांश्च शतशः परान् ।
कोटिशश्च नरानन्यान् परितप्ये पितामह ॥ ६ ॥
पितामह! बारंबार इसी चिन्तासे मैं आज भी निरन्तर जल रहा हूँ। उन श्रीसम्पन्न राजसिंहोंसे हीन हुई इस पृथ्वीको, भाई-बन्धुओंके भयंकर वधको तथा सैकड़ों अन्य लोगोंके विनाशको एवं करोड़ों अन्य मानवोंके संहारको देखकर मैं सर्वथा संतप्त हो रहा हूँ ॥
का नु तासां वरस्त्रीणामवस्थाद्य भविष्यति ।
विहीनानां तु तनयैः पतिभिर्भ्रातृभिस्तथा ॥ ७ ॥
जो अपने पुत्रों, पतियों तथा भाइयोंसे सदाके लिये बिछुड़ गयी हैं, उन सुन्दरी स्त्रियोंकी आज क्या दशा होगी? ।। ७ ।।
अस्मानन्तकरान् घोरान् पाण्डवान् वृष्णिसंहतान् ।
आक्रोशन्त्यः कृशा दीनाः प्रपतिष्यन्ति भूतले ।। ८ ।।
हम घोर विनाशकारी पाण्डवों और वृष्णिवंशियोंको कोसती हुई वे दीन-दुर्बल अबलाएँ पृथ्वीपर पछाड़ खा-खाकर गिरेंगी ।। ८ ।।
अपश्यन्त्यः पितॄन् भ्रातॄन् पतीन् पुत्रांश्च योषितः ।
त्यक्त्वा प्राणान् स्त्रियः सर्वा गमिष्यन्ति यमक्षयम् ।। ९ ।।
अपने पिता, भाई, पति और पुत्रोंको न देखकर वे सारी युवती स्त्रियाँ प्राण त्याग देंगी और यमलोकमें चली जायँगी ।। ९ ।।
वत्सलत्वाद् द्विजश्रेष्ठ तत्र मे नास्ति संशयः ।
व्यक्तं सौक्ष्म्याच्च धर्मस्य प्राप्स्यामः स्त्रीवधं वयम् ।। १० ।।
द्विजश्रेष्ठ! वे अपने सगे-सम्बन्धियोंके प्रति वात्सल्य रखनेके कारण अवश्य ऐसा ही करेंगी, इसमें मुझे संशय नहीं है। धर्मकी गति सूक्ष्म होनेके कारण निश्चय ही हमें नारीहत्याके पापका भागी होना पड़ेगा ।। १० ।।
यद् वयं सुहृदो हत्वा कृत्वा पापमनन्तकम् ।
नरके निपतिष्यामो ह्यधःशिरस एव ह ।। ११ ।।
हमने सुहृदोंका वध करके ऐसा पाप कर लिया है, जिसका प्रायश्चित्तसे अन्त नहीं हो सकता; अतः हमें नीचे सिर करके निस्संदेह नरकमें ही गिरना पड़ेगा ।। ११ ।।
शरीराणि विमोक्ष्यामस्तपसोग्रेण सत्तम ।
आश्रमाणां विशेषं त्वमथाचक्ष्व पितामह ।। १२ ।।
संतोंमें श्रेष्ठ पितामह! हम घोर तपस्या करके अपने शरीरका परित्याग कर देंगे। आप इसके लिये कोई विशेष आश्रम हो तो बताइये ।। १२ ।।
वैशम्पायन उवाच
युधिष्ठिरस्य तद् वाक्यं श्रुत्वा द्वैपायनस्तदा ।
निरीक्ष्य निपुणं बुद्ध्या ऋषिः प्रोवाच पाण्डवम् ।। १३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस समय युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर श्रीकृष्णद्वैपायन महर्षि व्यासने इस विषयमें अपनी बुद्धिद्वारा अच्छी तरह विचार करनेके पश्चात् उन पाण्डुकुमारसे कहा ।। १३ ।।
व्यास उवाच
मा विषादं कृथा राजन् क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ।
स्वधर्मेण हता ह्येते क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ।। १४ ।।
व्यासजी बोले— राजन्! क्षत्रियशिरोमणे! तुम क्षत्रियधर्मका बारंबार स्मरण करते हुए विषाद न करो; क्योंकि ये सभी क्षत्रिय अपने धर्मके अनुसार मारे गये हैं॥ १४॥
कांक्षमाणाः श्रियं कृत्स्नां पृथिव्यां च महद् यशः।
कृतान्तविधिसंयुक्ताः कालेन निधनं गताः॥ १५॥
वे सम्पूर्ण राजलक्ष्मी और भूमण्डलव्यापी महान् यशको प्राप्त करना चाहते थे; परंतु यमराजके विधानसे प्रेरित हो कालके गालमें चले गये हैं॥ १५॥
न त्वं हन्ता न भीमोऽयं नार्जुनो न यमावपि।
कालः पर्यायधर्मेण प्राणानादत्त देहिनाम्॥ १६॥
न तुम, न भीमसेन, न अर्जुन और न नकुल-सहदेव ही उनका वध करनेवाले हैं। कालने बारी-बारीसे आकर अपने नियमके अनुसार उन सभी देहधारियोंके प्राण लिये हैं॥ १६॥
न तस्य मातापितरौ नानुग्राह्यो हि कश्चन।
कर्मसाक्षी प्रजानां यस्तेन कालेन संहृताः॥ १७॥
कालके माता-पिता नहीं हैं। उसका किसीपर भी अनुग्रह नहीं होता। जो प्रजावर्गके कर्मका साक्षी है, उसी कालने तुम्हारे शत्रुओंका संहार किया है॥ १७॥
हेतुमात्रमिदं तस्य विहितं भरतर्षभ।
यद्घ्नन्ति भूतैर्भूतानि तदस्मै रूपमैश्वरम्॥ १८॥
भरतश्रेष्ठ! कालने इस युद्धको निमित्तमात्र बनाया है। वह जो प्राणियोंद्वारा ही प्राणियोंका वध करता है, वही उसका ईश्वरीय रूप है॥ १८॥
कर्मसूत्रात्मकं विद्धि साक्षिणं शुभपापयोः।
सुखदुःखगुणोदर्कं कालं कालफलप्रदम्॥ १९॥
राजन्! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि काल जीवके पाप और पुण्यकर्मोंका साक्षी है। वह कर्मकी डोरीका सहारा ले भविष्यमें होनेवाले सुख और दुःखका उत्पादक होता है। वही समयानुसार कर्मोंका फल देता है॥ १९॥
तेषामपि महाबाहो कर्माणि परिचिन्तय।
विनाशहेतुकानि त्वं यैस्ते कालवशं गताः॥ २०॥
महाबाहो! तुम युद्धमें मारे गये उन क्षत्रियोंके भी ऐसे कर्मोंका चिन्तन करो जो उनके विनाशके कारण थे और जिनके होनेसे ही उन्हें कालके अधीन होना पड़ा॥ २०॥
आत्मनश्च विजानीहि नियतव्रतशासनम्।
यदा त्वमीदृशं कर्म विधिनाऽऽक्रम्य कारितः॥ २१॥
तुम अपने आचार-व्यवहारपर भी ध्यान दो कि 'तुम सदा ही नियमपूर्वक उत्तम व्रतके पालनमें लगे रहते थे तो भी विधाताने बलपूर्वक तुम्हें अपने अधीन करके तुम्हारे द्वारा ऐसा निष्ठुर कर्म करवा लिया'॥ २१॥
त्वष्ट्रेव विहितं यन्त्रं यथा चेष्टयितुर्वशे।
कर्मणा कालयुक्तेन तथे switch चेष्टते जगत् ॥ २२ ॥
जैसे लोहार या बढ़ईका बनाया हुआ यन्त्र सदा उसके चालकके अधीन रहता है, उसी प्रकार यह सारा जगत् कालयुक्त कर्मकी प्रेरणासे ही सचेष्ट हो रहा है ॥
पुरुषस्य हि दृष्ट्वेवामुत्पत्तिमनिमित्ततः ।
यदृच्छया विनाशं च शोकहर्षावनर्थकौ ॥ २३ ॥
प्राणी किसी व्यक्त कारणके बिना ही दैवात् उत्पन्न होता है और दैवेच्छासे ही अकस्मात् उसका विनाश हो जाता है। यह सब देखकर शोक और हर्ष करना व्यर्थ है ॥ २३ ॥
व्यलीकमपि यत् तव चित्तवैतंसिकं तव ।
तदर्थमिष्यते राजन् प्रायश्चित्तं तदाचर ॥ २४ ॥
राजन्! तथापि तुम्हारे चित्तमें जो यहाँ उन सबको मरवानेके कारण झूठे ही चिन्ता और पीड़ा हो रही है, इसकी निवृत्तिके लिये प्रायश्चित्त कर देना उचित है, अतः तुम अवश्य प्रायश्चित्त करो ॥ २४ ॥
इदं तु श्रूयते पार्थ युद्धे देवासुरे पुरा ।
असुरा भ्रातरो ज्येष्ठा देवाश्चापि यवीयसः ॥ २५ ॥
तेषामपि श्रीनिमित्तं महानासीत् समुच्चयः ।
युद्धं वर्षसहस्राणि द्वात्रिंशदभवत् किल ॥ २६ ॥
पार्थ! यह बात सुनी जाती है कि पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर बड़े भाई असुर और छोटे भाई देवता आपसमें लड़ गये थे। उनमें भी राजलक्ष्मीके लिये ही बत्तीस हजार वर्षोंतक बड़ा भारी संग्राम हुआ था ॥
एकार्णवां महीं कृत्वा रुधिरेण परिप्लुताम् ।
जघ्नुर्दैत्यांस्तथा देवास्त्रिदिवं चाभिलेभिरे ॥ २७ ॥
देवताओंने खूनसे भीगी हुई इस पृथ्वीको एकार्णवमें निमग्न करके दैत्योंका संहार कर डाला और स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया ॥ २७ ॥
तथैव पृथिवीं लब्ध्वा ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
संश्रिता दानवानां वै साह्यार्थं दर्पमोहिताः ॥ २८ ॥
शालावृका इति ख्यातास्त्रिषु लोकेषु भारत ।
अष्टाशीतिसहस्राणि ते चापि विबुधैर्हताः ॥ २९ ॥
भारत! इसी प्रकार पृथ्वीको भी अपने अधीन करके देवताओंने तीनों लोकोंमें शालावृक नामसे विख्यात उन अट्ठासी हजार ब्राह्मणोंका भी वध कर डाला, जो वेदोंके पारङ्गत विद्वान् थे और अभिमानसे मोहित होकर दानवोंकी सहायताके लिये उनके पक्षमें जा मिले थे ॥ २८-२९ ॥
धर्मव्युच्छित्तिमिच्छन्तो येऽधर्मस्य प्रवर्तकाः ।
हन्तव्यास्ते दुरात्मानो देवैर्दैत्या इवोल्बणाः ॥ ३० ॥
जो धर्मका विनाश चाहते हुए अधर्मके प्रवर्तक हो रहे हों, उन दुरात्माओंका वध करना
ही उचित है। जैसे देवताओंने उद्दण्ड दैत्योंका विनाश कर डाला था ॥
एकं हत्वा यदि कुले शिष्टानां स्यादनामयम् ।
कुलं हत्वा च राष्ट्रं च न तद् वृत्तोपघातकम् ॥ ३१ ॥
यदि एक पुरुषको मार देनेसे कुटुम्बके शेष व्यक्तियोंका कष्ट दूर हो जाय और एक
कुटुम्बका नाश कर देनेसे सारे राष्ट्रमें सुख और शान्ति छा जाय तो वैसा करना सदाचार या
धर्मका नाशक नहीं है ॥ ३१ ॥
अधर्मरूपो धर्मो हि कश्चिदस्ति नराधिप ।
धर्मश्चाधर्मरूपोऽस्ति तच्च ज्ञेयं विपश्चिता ॥ ३२ ॥
नरेश्वर! किसी समय धर्म ही अधर्मरूप हो जाता है और कहीं अधर्मरूप दीखनेवाला
कर्म ही धर्म बन जाता है; इसलिये विद्वान् पुरुषको धर्म और अधर्मका रहस्य अच्छी तरह
समझ लेना चाहिये ॥ ३२ ॥
तस्मात् संस्तम्भयात्मानं श्रुतवानसि पाण्डव ।
देवैः पूर्वगतं मार्गमनुयातोऽसि भारत ॥ ३३ ॥
पाण्डुनन्दन! तुम वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता हो, तुमने श्रेष्ठ पुरुषोंके उपदेश सुने हैं; इसलिये
अपने हृदयको स्थिर करो, शोकसे विचलित न होने दो। भारत! तुमने तो उसी मार्गका
अनुसरण किया है, जिसपर देवतालोग पहलेसे चल चुके हैं ॥ ३३ ॥
न हीदृशा गमिष्यन्ति नरकं पाण्डवर्षभ ।
भ्रातॄनाश्वासयैतांस्त्वं सुहृदश्च परंतप ॥ ३४ ॥
पाण्डवशिरोमणे! तुम्हारे-जैसे लोग नरकमें नहीं गिरेंगे। शत्रुसंतापी नरेश! तुम इन
भाइयों और सुहृदोंको आश्वासन दो ॥ ३४ ॥
यो हि पापसमारम्भे कार्ये तद्भावभावितः ।
कुर्वन्नपि तथैव स्यात् कृत्वा च निरपत्रपः ॥ ३५ ॥
तस्मिंस्तत् कलुषं सर्वं समाप्तमिति शब्दितम् ।
प्रायश्चित्तं न तस्यास्ति ह्रासो वा पापकर्मणः ॥ ३६ ॥
जो पुरुष हृदयमें पापकी भावना रखकर किसी पापकर्ममें प्रवृत्त होता है, उसे करते
हुए भी उसी भावनासे भावित रहता है तथा पापकर्म करनेके पश्चात् भी लज्जित नहीं
होता, उसमें वह सारा पाप पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित हो जाता है, ऐसा शास्त्रका कथन है।
उसकेलिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है तथा प्रायश्चित्तसे भी उसके पापकर्मका नाश नहीं होता
है ॥ ३५-३६ ॥
त्वं तु शुक्लाभिजातीयः परदोषेण कारितः ।
अनिच्छमानः कर्मेदं कृत्वा च परितप्स्यसे ॥ ३७ ॥
तुम तो जन्मसे ही शुद्ध स्वभावके हो। तुम्हारे मनमें युद्धकी इच्छा बिल्कुल नहीं थी। शत्रुओंके अपराधसे ही तुम्हें इस कार्यमें प्रवृत्त होना पड़ा। तुम यह युद्धकर्म करके भी निरन्तर पश्चात्ताप ही कर रहे हो ॥ ३७ ॥
अश्वमेधो महायज्ञः प्रायश्चित्तमुदाहृतम् ।
तमाहर महाराज विपाप्मैवं भविष्यसि ॥ ३८ ॥
इसके लिये महान् यज्ञ अश्वमेध ही प्रायश्चित्त बताया गया है। महाराज! तुम इस यज्ञका अनुष्ठान करो। ऐसा करनेसे तुम पापरहित हो जाओगे ॥ ३८ ॥
मरुद्भिः सह जित्वारीन् भगवान् पाकशासनः ।
एकैकं क्रतुमाहृत्य शतकृत्वः शतक्रतुः ॥ ३९ ॥
मरुद्गणोंसहित भगवान् पाकशासन इन्द्रने शत्रुओंको जीतकर एक-एक करके सौ बार अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया। इससे वे 'शतक्रतु' नामसे विख्यात हो गये ॥ ३९ ॥
धूतपाप्माजितस्वर्गो लोकान् प्राप्य सुखोदयान् ।
मरुद्गणैर्वृतः शक्रः शुशुभे भासयन् दिशः ॥ ४० ॥
उनके सारे पाप धुल गये। उन्होंने स्वर्गपर विजय पायी और सुखदायक लोकोंमें पहुँचकर वे इन्द्र सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए मरुद्गणोंके साथ शोभा पाने लगे ॥ ४० ॥
स्वर्गे लोके महीयन्तमप्सरोभिः शचीपतिम् ।
ऋषयः पर्युपासन्ते देवाश्च विबुधेश्वरम् ॥ ४१ ॥
स्वर्गलोकमें अप्सराओंद्वारा पूजित होनेवाले शचीपति देवराज इन्द्रकी सम्पूर्ण देवता और महर्षि भी उपासना करते हैं ॥ ४१ ॥
सेयं त्वामनुसम्प्राप्ता विक्रमेण वसुन्धरा ।
निर्जिताश्च महीपाला विक्रमेण त्वयानघ ॥ ४२ ॥
अनघ! तुमने भी इस वसुन्धराको अपने पराक्रमसे प्राप्त किया है और भुजाओंके बलसे समस्त राजाओंको परास्त किया है ॥ ४२ ॥
तेषां पुराणि राष्ट्राणि गत्वा राजन् सुहृद्वृतः ।
भ्रातॄन् पुत्रांश्च पौत्रांश्च स्वे स्वे राज्येऽभिषेचय ॥ ४३ ॥
राजन्! अब तुम अपने सुहृदोंके साथ उनके देश और नगरोंमें जाकर उनके भाइयों, पुत्रों अथवा पौत्रोंको अपने-अपने राज्यपर अभिषिक्त करो ॥ ४३ ॥
बालानपि च गर्भस्थान् सान्त्वेन समुदाचरन् ।
रञ्जयन् प्रकृतीः सर्वाः परिपाहि वसुन्धराम् ॥ ४४ ॥
जिनके उत्तराधिकारी अभी बालक हों या गर्भमें हों, उनकी प्रजाको समझा-बुझाकर सान्त्वनाद्वारा शान्त करो और सारी प्रजाका मनोरंजन करते हुए इस पृथ्वीका पालन करो ॥ ४४ ॥
कुमारो नास्ति येषां च कन्यास्तत्राभिषेचय ।
कामाशयो हि स्त्रीवर्गः शोकमेवं प्रहास्यसि ॥ ४५ ॥
जिन राजाओंके कोई पुत्र नहीं हो, उनकी कन्याओंको ही राज्यपर अभिषिक्त कर दो। ऐसा करनेसे उनकी स्त्रियोंकी मनःकामना पूर्ण होगी और वे शोक त्याग देंगी ॥ ४५ ॥
एवमाश्वासनं कृत्वा सर्वराष्ट्रेषु भारत ।
यजस्व वाजिमेधेन यथेन्द्रो विजयी पुरा ॥ ४६ ॥
भारत! इस प्रकार सारे राज्यमें शान्ति स्थापित करके तुम उसी प्रकार अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करो, जैसे पूर्वकालमें विजयी इन्द्रने किया था ॥ ४६ ॥
अशोच्यास्ते महात्मानः क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ।
स्वकर्मभिर्गता नाशं कृतान्तबलमोहिताः ॥ ४७ ॥
क्षत्रियशिरोमणे! वे महामनस्वी क्षत्रिय, जो युद्धमें मारे गये हैं, शोक करनेके योग्य नहीं हैं; क्योंकि वे कालकी शक्तिसे मोहित होकर अपने ही कर्मोंसे नष्ट हुए हैं ॥ ४७ ॥
अवाप्तः क्षत्रधर्मस्ते राज्यं प्राप्तमकण्टकम् ।
रक्षस्व धर्मं कौन्तेय श्रेयान् यः प्रेत्य भारत ॥ ४८ ॥
कुन्तीकुमार! भरतनन्दन! तुमने क्षत्रियधर्मका पालन किया है और इस समय तुम्हें यह निष्कण्टक राज्य मिला है; अतः अब तुम उस धर्मकी ही रक्षा करो, जो मृत्युके पश्चात् सबका कल्याण करनेवाला है ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि प्रायश्चित्तोपाख्याने त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें प्रायश्चित्तोपाख्यान-विषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 235)
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
जिन कर्मोंके करने और न करनेसे कर्ता प्रायश्चित्तका भागी होता और नहीं होता—उनका विवेचन
युधिष्ठिर उवाच
कानि कृत्वेह कर्माणि प्रायश्चित्तीयते नरः ।
किं कृत्वा मुच्यते तत्र तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! किन-किन कर्मोंको करनेसे मनुष्य प्रायश्चित्तका अधिकारी होता है और उनके लिये कौन-सा प्रायश्चित्त करके वह पापसे मुक्त होता है? इस विषयमें यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥
व्यास उवाच
अकुर्वन् विहितं कर्म प्रतिषिद्धानि चाचरन् ।
प्रायश्चित्तीयते ह्येवं नरो मिथ्यानुवर्तयन् ॥ २ ॥
व्यासजी बोले— राजन्! जो मनुष्य शास्त्रविहित कर्मोंका आचरण न करके निषिद्ध कर्म कर बैठता है, वह उस विपरीत आचरणके कारण प्रायश्चित्तका भागी होता है ॥ २ ॥
सूर्येणाभ्युदितो यश्च ब्रह्मचारी भवत्युत ।
तथा सूर्याभिनिर्मुक्तः कुनखी श्यावदन्नपि ॥ ३ ॥
जो ब्रह्मचारी सूर्योदय अथवा सूर्यास्तके समयतक सोता रहे तथा जिसके नख और दाँत काले हों,* उन सबको प्रायश्चित्त करना चाहिये ॥ ३ ॥
परिवित्तिः परिवेत्ता ब्रह्मघ्नो यश्च कुत्सकः ।
दिधिषूपपतिर्यः स्यादग्रेदिधिषुरेव च ॥ ४ ॥
अवकीर्णी भवेद् यश्च द्विजातिवधकस्तथा ।
अतीर्थे ब्राह्मणस्त्यागी तीर्थे चाप्रतिपादकः ॥ ५ ॥
ग्रामघाती च कौन्तेय मांसस्य परिविक्रयी ।
यश्चाग्नीनपविध्येत तथैव ब्रह्मविक्रयी ॥ ६ ॥
स्त्रीशूद्रवधको यश्च पूर्वः पूर्वस्तु गर्हितः ।
यथा पशुसमालम्भी गृहदाहस्य कारकः ॥ ७ ॥
अनृतेनोपवर्ती च प्रतिरोद्धा गुरोस्तथा ।
एतान्येनांसि सर्वाणि व्युत्क्रान्तसमयश्च यः ॥ ८ ॥
कुन्तीनन्दन! इसके सिवा परिवेत्ता (बड़े भाईके अविवाहित रहते हुए विवाह करनेवाला छोटा भाई), परिवित्ति (परिवेत्ताका बड़ा भाई), ब्रह्महत्यारा और जो दूसरोंकी