भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

संजय उवाच

अभीप्सामि सुतं वीरं वीरवन्तं दृढव्रतम् । आयुष्मन्तं महाभागं देवराजसमद्युतिम् ॥ १५ ॥ संजय बोले— भगवन्! मैं एक ऐसा पुत्र पाना चाहता हूँ, जो वीर, बलवान्, दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाला, आयुष्मान्, परम सौभाग्यशाली और देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी हो ॥ १५ ॥

पर्वत उवाच

भविष्यत्येष ते कामो न त्वायुष्मान् भविष्यति । देवराजाभिभूत्यर्थं संकल्पो ह्येष ते हृदि ॥ १६ ॥ पर्वतने कहा— राजन्! तुम्हारा यह मनोरथ पूर्ण होगा, परंतु वह पुत्र दीर्घायु नहीं हो सकेगा; क्योंकि देवराज इन्द्रको पराजित करनेके लिये तुम्हारे हृदयमें यह संकल्प उठा है ॥ १६ ॥

ख्यातः सुवर्णष्ठीवीति पुत्रस्तव भविष्यति । रक्ष्यश्च देवराजात् स देवराजसमद्युतिः ॥ १७ ॥ तुम्हारा वह पुत्र सुवर्णष्ठीवीके नामसे विख्यात तथा देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी होगा। तुम्हें देवराजसे सदा उसकी रक्षा करनी चाहिये ॥ १७ ॥

तच्छ्रुत्वा संजयो वाक्यं पर्वतस्य महात्मनः । प्रसादयामास तदा नैतदेवं भवेदिति ॥ १८ ॥ आयुष्मान् मे भवेत् पुत्रो भवतस्तपसा मुने । न च तं पर्वतः किंचिदुवाचेन्द्रव्यपेक्षया ॥ १९ ॥ महात्मा पर्वतका यह वचन सुनकर संजयने उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा करते हुए कहा—‘ऐसा न हो। मुने! आपकी तपस्यासे मेरा पुत्र दीर्घजीवी होना चाहिये।’ परंतु इन्द्रका ख्याल करके पर्वत मुनि कुछ नहीं बोले ॥ १८-१९ ॥

तमहं नृपतिं दीनमब्रुवं पुनरेव च । स्मर्त्तव्योऽस्मि महाराज दर्शयिष्यामि ते सुतम् ॥ २० ॥ अहं ते दयितं पुत्रं प्रेतराजवशं गतम् । पुनर्दास्यामि तद्रूपं मा शुचः पृथिवीपते ॥ २१ ॥ तब मैंने दीन हुए उस नरेशसे कहा—‘महाराज! संकटके समय मुझे याद करना। मैं तुम्हारे पुत्रको तुमसे मिला दूँगा। पृथ्वीनाथ! चिन्ता न करो। यमराजके वशमें पड़े हुए तुम्हारे उस प्रिय पुत्रको मैं पुनः उस रूपमें लाकर तुम्हें दे दूँगा’ ॥ २०-२१ ॥

एवमुक्त्वा तु नृपतिं प्रयातौ स्वो यथेप्सितम् । संजयश्च यथाकामं प्रविवेश स्वमन्दिरम् ॥ २२ ॥