भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 219

राजासे ऐसा कहकर हम दोनों अपने अभीष्ट स्थानको चल दिये और राजा सृंजयने अपने इच्छानुसार महलमें प्रवेश किया ॥ २२ ॥ संजयस्याथ राजर्षेः कस्मिंश्चित् कालपर्यये । जज्ञे पुत्रो महावीर्यस्तेजसा प्रज्वलन्निव ॥ २३ ॥ तदनन्तर किसी समय राजर्षि सृंजयके एक पुत्र हुआ, जो अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था। वह महान् बलशाली था ॥ २३ ॥ ववृधे स यथाकालं सरसीव महोत्पलम् । बभूव काञ्चनष्ठीवी यथार्थं नाम तस्य तत् ॥ २४ ॥ जैसे सरोवरमें कमल बढ़ता है, उसी प्रकार वह राजकुमार यथासमय बढ़ने लगा। वह मुखसे स्वर्ण उगलनेके कारण सुवर्णष्ठीवी नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसका वह नाम सार्थक था ॥ २४ ॥ तदद्भुततमं लोके पप्रथे कुरुसत्तम । बुबुधे तच्च देवेन्द्रो वरदानं महर्षितः ॥ २५ ॥ कुरुश्रेष्ठ! उसका वह अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त सारे जगत्में फैल गया। देवराज इन्द्रको भी यह मालूम हो गया कि वह बालक महर्षि पर्वतके वरदानका फल है ॥ ततः स्वाभिभवाद् भीतो बृहस्पतिमते स्थितः । कुमारस्यान्तरप्रेक्षी बभूव बलवृत्रहा ॥ २६ ॥ तदनन्तर अपनी पराजयसे डरकर बृहस्पतिकी सम्मतिके अनुसार चलते हुए बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्र उस राजकुमारके वधका अवसर देखने लगे ॥ २६ ॥ चोदयामास तद् वज्रं दिव्यास्त्रं मूर्तिमत् स्थितम् । व्याघ्रो भूत्वा जहीमं त्वं राजपुत्रमिति प्रभो ॥ २७ ॥ प्रवृद्धः किल वीर्येण मामेषोऽभिभविष्यति । संजयस्य सुतो वज्र यथैनं पर्वतोऽब्रवीत् ॥ २८ ॥ प्रभो! इन्द्रने मूर्तिमान् होकर सामने खड़े हुए अपने दिव्य अस्त्र वज्रसे कहा—'वज्र! तुम बाघ बनकर इस राजकुमारको मार डालो। जैसा कि इसके विषयमें पर्वतने बताया है, बड़ा होनेपर सृंजयका यह पुत्र अपने पराक्रमसे मुझे परास्त कर देगा' ॥ २७-२८ ॥ एवमुक्तस्तु शक्रेण वज्रः परपुरञ्जयः । कुमारमन्तरप्रेक्षी नित्यमेवान्वपद्यत ॥ २९ ॥ इन्द्रके ऐसा कहनेपर शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाला वज्र मौका देखता हुआ सदा उस राजकुमारके आस-पास ही रहने लगा ॥ २९ ॥ संजयोऽपि सुतं प्राप्य देवराजसमद्युतिम् । हृष्टः सान्तःपुरो राजा वननित्यो बभूव ह ॥ ३० ॥

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