महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 228, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना
युधिष्ठिर उवाच
हताः पुत्राश्च पौत्राश्च भ्रातरः पितरस्तथा ।
श्वशुरा गुरवश्चैव मातुलाश्च पितामहाः ॥ १ ॥
क्षत्रियाश्च महात्मानः सम्बन्धि सुहृदस्तथा ।
वयस्या भागिनेयाश्च ज्ञातयश्च पितामह ॥ २ ॥
बहवश्च मनुष्येन्द्रा नानादेशसमागताः ।
घातिता राज्यलुब्धेन मयैकेन पितामह ॥ ३ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**पितामह! अकेले मैंने ही राज्यके लोभमें आकर पुत्र, पौत्र, भाई, चाचा, ताऊ, श्वशुर, गुरु, मामा, बाबा, भानजे, सगे-सम्बन्धी, सुहृद्, मित्र तथा भाई-बन्धु आदि नाना देशोंसे आये हुए बहुसंख्यक क्षत्रियनरेशोंको मरवा डाला ॥ १—३ ॥
तांस्तादृशानहं हत्वा धर्मनित्यान् महीक्षितः ।
असकृत् सोमपान् वीरान् किं प्राप्स्यामि तपोधन ॥ ४ ॥
तपोधन! जो अनेक बार सोमरसका पान कर चुके थे और सदा धर्ममें ही तत्पर रहते थे, वैसे वीर भूपालोंका वध करके मैं कौन-सा फल पाऊँगा? ॥ ४ ॥
दह्याम्यनिशमद्यापि चिन्तयानः पुनः पुनः ।
हीनां पार्थिवसिंहैस्तैः श्रीमद्भिः पृथिवीमिमाम् ॥ ५ ॥
दृष्ट्वा ज्ञातिवधं घोरं हतांश्च शतशः परान् ।
कोटिशश्च नरानन्यान् परितप्ये पितामह ॥ ६ ॥
पितामह! बारंबार इसी चिन्तासे मैं आज भी निरन्तर जल रहा हूँ। उन श्रीसम्पन्न राजसिंहोंसे हीन हुई इस पृथ्वीको, भाई-बन्धुओंके भयंकर वधको तथा सैकड़ों अन्य लोगोंके विनाशको एवं करोड़ों अन्य मानवोंके संहारको देखकर मैं सर्वथा संतप्त हो रहा हूँ ॥
का नु तासां वरस्त्रीणामवस्थाद्य भविष्यति ।
विहीनानां तु तनयैः पतिभिर्भ्रातृभिस्तथा ॥ ७ ॥