महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 229, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो अपने पुत्रों, पतियों तथा भाइयोंसे सदाके लिये बिछुड़ गयी हैं, उन सुन्दरी स्त्रियोंकी आज क्या दशा होगी? ।। ७ ।।
अस्मानन्तकरान् घोरान् पाण्डवान् वृष्णिसंहतान् ।
आक्रोशन्त्यः कृशा दीनाः प्रपतिष्यन्ति भूतले ।। ८ ।।
हम घोर विनाशकारी पाण्डवों और वृष्णिवंशियोंको कोसती हुई वे दीन-दुर्बल अबलाएँ पृथ्वीपर पछाड़ खा-खाकर गिरेंगी ।। ८ ।।
अपश्यन्त्यः पितॄन् भ्रातॄन् पतीन् पुत्रांश्च योषितः ।
त्यक्त्वा प्राणान् स्त्रियः सर्वा गमिष्यन्ति यमक्षयम् ।। ९ ।।
अपने पिता, भाई, पति और पुत्रोंको न देखकर वे सारी युवती स्त्रियाँ प्राण त्याग देंगी और यमलोकमें चली जायँगी ।। ९ ।।
वत्सलत्वाद् द्विजश्रेष्ठ तत्र मे नास्ति संशयः ।
व्यक्तं सौक्ष्म्याच्च धर्मस्य प्राप्स्यामः स्त्रीवधं वयम् ।। १० ।।
द्विजश्रेष्ठ! वे अपने सगे-सम्बन्धियोंके प्रति वात्सल्य रखनेके कारण अवश्य ऐसा ही करेंगी, इसमें मुझे संशय नहीं है। धर्मकी गति सूक्ष्म होनेके कारण निश्चय ही हमें नारीहत्याके पापका भागी होना पड़ेगा ।। १० ।।
यद् वयं सुहृदो हत्वा कृत्वा पापमनन्तकम् ।
नरके निपतिष्यामो ह्यधःशिरस एव ह ।। ११ ।।
हमने सुहृदोंका वध करके ऐसा पाप कर लिया है, जिसका प्रायश्चित्तसे अन्त नहीं हो सकता; अतः हमें नीचे सिर करके निस्संदेह नरकमें ही गिरना पड़ेगा ।। ११ ।।
शरीराणि विमोक्ष्यामस्तपसोग्रेण सत्तम ।
आश्रमाणां विशेषं त्वमथाचक्ष्व पितामह ।। १२ ।।
संतोंमें श्रेष्ठ पितामह! हम घोर तपस्या करके अपने शरीरका परित्याग कर देंगे। आप इसके लिये कोई विशेष आश्रम हो तो बताइये ।। १२ ।।
वैशम्पायन उवाच
युधिष्ठिरस्य तद् वाक्यं श्रुत्वा द्वैपायनस्तदा ।
निरीक्ष्य निपुणं बुद्ध्या ऋषिः प्रोवाच पाण्डवम् ।। १३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस समय युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर श्रीकृष्णद्वैपायन महर्षि व्यासने इस विषयमें अपनी बुद्धिद्वारा अच्छी तरह विचार करनेके पश्चात् उन पाण्डुकुमारसे कहा ।। १३ ।।
व्यास उवाच
मा विषादं कृथा राजन् क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ।
स्वधर्मेण हता ह्येते क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ।। १४ ।।