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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता

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त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाते हुए कालकी प्रबलता बताकर देवासुरसंग्रामके उदाहरणसे धर्मद्रोहियोंके दमनका औचित्य सिद्ध करना और प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता बताना

युधिष्ठिर उवाच

हताः पुत्राश्च पौत्राश्च भ्रातरः पितरस्तथा ।
श्वशुरा गुरवश्चैव मातुलाश्च पितामहाः ॥ १ ॥
क्षत्रियाश्च महात्मानः सम्बन्धि सुहृदस्तथा ।
वयस्या भागिनेयाश्च ज्ञातयश्च पितामह ॥ २ ॥
बहवश्च मनुष्येन्द्रा नानादेशसमागताः ।
घातिता राज्यलुब्धेन मयैकेन पितामह ॥ ३ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**पितामह! अकेले मैंने ही राज्यके लोभमें आकर पुत्र, पौत्र, भाई, चाचा, ताऊ, श्वशुर, गुरु, मामा, बाबा, भानजे, सगे-सम्बन्धी, सुहृद्, मित्र तथा भाई-बन्धु आदि नाना देशोंसे आये हुए बहुसंख्यक क्षत्रियनरेशोंको मरवा डाला ॥ १—३ ॥

तांस्तादृशानहं हत्वा धर्मनित्यान् महीक्षितः ।
असकृत् सोमपान् वीरान् किं प्राप्स्यामि तपोधन ॥ ४ ॥
तपोधन! जो अनेक बार सोमरसका पान कर चुके थे और सदा धर्ममें ही तत्पर रहते थे, वैसे वीर भूपालोंका वध करके मैं कौन-सा फल पाऊँगा? ॥ ४ ॥

दह्याम्यनिशमद्यापि चिन्तयानः पुनः पुनः ।
हीनां पार्थिवसिंहैस्तैः श्रीमद्भिः पृथिवीमिमाम् ॥ ५ ॥
दृष्ट्वा ज्ञातिवधं घोरं हतांश्च शतशः परान् ।
कोटिशश्च नरानन्यान् परितप्ये पितामह ॥ ६ ॥
पितामह! बारंबार इसी चिन्तासे मैं आज भी निरन्तर जल रहा हूँ। उन श्रीसम्पन्न राजसिंहोंसे हीन हुई इस पृथ्वीको, भाई-बन्धुओंके भयंकर वधको तथा सैकड़ों अन्य लोगोंके विनाशको एवं करोड़ों अन्य मानवोंके संहारको देखकर मैं सर्वथा संतप्त हो रहा हूँ ॥

का नु तासां वरस्त्रीणामवस्थाद्य भविष्यति ।
विहीनानां तु तनयैः पतिभिर्भ्रातृभिस्तथा ॥ ७ ॥

जो अपने पुत्रों, पतियों तथा भाइयोंसे सदाके लिये बिछुड़ गयी हैं, उन सुन्दरी स्त्रियोंकी आज क्या दशा होगी? ।। ७ ।।

अस्मानन्तकरान् घोरान् पाण्डवान् वृष्णिसंहतान् ।
आक्रोशन्त्यः कृशा दीनाः प्रपतिष्यन्ति भूतले ।। ८ ।।
हम घोर विनाशकारी पाण्डवों और वृष्णिवंशियोंको कोसती हुई वे दीन-दुर्बल अबलाएँ पृथ्वीपर पछाड़ खा-खाकर गिरेंगी ।। ८ ।।

अपश्यन्त्यः पितॄन् भ्रातॄन् पतीन् पुत्रांश्च योषितः ।
त्यक्त्वा प्राणान् स्त्रियः सर्वा गमिष्यन्ति यमक्षयम् ।। ९ ।।
अपने पिता, भाई, पति और पुत्रोंको न देखकर वे सारी युवती स्त्रियाँ प्राण त्याग देंगी और यमलोकमें चली जायँगी ।। ९ ।।

वत्सलत्वाद् द्विजश्रेष्ठ तत्र मे नास्ति संशयः ।
व्यक्तं सौक्ष्म्याच्च धर्मस्य प्राप्स्यामः स्त्रीवधं वयम् ।। १० ।।
द्विजश्रेष्ठ! वे अपने सगे-सम्बन्धियोंके प्रति वात्सल्य रखनेके कारण अवश्य ऐसा ही करेंगी, इसमें मुझे संशय नहीं है। धर्मकी गति सूक्ष्म होनेके कारण निश्चय ही हमें नारीहत्याके पापका भागी होना पड़ेगा ।। १० ।।

यद् वयं सुहृदो हत्वा कृत्वा पापमनन्तकम् ।
नरके निपतिष्यामो ह्यधःशिरस एव ह ।। ११ ।।
हमने सुहृदोंका वध करके ऐसा पाप कर लिया है, जिसका प्रायश्चित्तसे अन्त नहीं हो सकता; अतः हमें नीचे सिर करके निस्संदेह नरकमें ही गिरना पड़ेगा ।। ११ ।।

शरीराणि विमोक्ष्यामस्तपसोग्रेण सत्तम ।
आश्रमाणां विशेषं त्वमथाचक्ष्व पितामह ।। १२ ।।
संतोंमें श्रेष्ठ पितामह! हम घोर तपस्या करके अपने शरीरका परित्याग कर देंगे। आप इसके लिये कोई विशेष आश्रम हो तो बताइये ।। १२ ।।

वैशम्पायन उवाच

युधिष्ठिरस्य तद् वाक्यं श्रुत्वा द्वैपायनस्तदा ।
निरीक्ष्य निपुणं बुद्ध्या ऋषिः प्रोवाच पाण्डवम् ।। १३ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस समय युधिष्ठिरका यह वचन सुनकर श्रीकृष्णद्वैपायन महर्षि व्यासने इस विषयमें अपनी बुद्धिद्वारा अच्छी तरह विचार करनेके पश्चात् उन पाण्डुकुमारसे कहा ।। १३ ।।

व्यास उवाच

मा विषादं कृथा राजन् क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ।
स्वधर्मेण हता ह्येते क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ।। १४ ।।

व्यासजी बोले— राजन्! क्षत्रियशिरोमणे! तुम क्षत्रियधर्मका बारंबार स्मरण करते हुए विषाद न करो; क्योंकि ये सभी क्षत्रिय अपने धर्मके अनुसार मारे गये हैं॥ १४॥
कांक्षमाणाः श्रियं कृत्स्नां पृथिव्यां च महद् यशः।
कृतान्तविधिसंयुक्ताः कालेन निधनं गताः॥ १५॥
वे सम्पूर्ण राजलक्ष्मी और भूमण्डलव्यापी महान् यशको प्राप्त करना चाहते थे; परंतु यमराजके विधानसे प्रेरित हो कालके गालमें चले गये हैं॥ १५॥
न त्वं हन्ता न भीमोऽयं नार्जुनो न यमावपि।
कालः पर्यायधर्मेण प्राणानादत्त देहिनाम्॥ १६॥
न तुम, न भीमसेन, न अर्जुन और न नकुल-सहदेव ही उनका वध करनेवाले हैं। कालने बारी-बारीसे आकर अपने नियमके अनुसार उन सभी देहधारियोंके प्राण लिये हैं॥ १६॥
न तस्य मातापितरौ नानुग्राह्यो हि कश्चन।
कर्मसाक्षी प्रजानां यस्तेन कालेन संहृताः॥ १७॥
कालके माता-पिता नहीं हैं। उसका किसीपर भी अनुग्रह नहीं होता। जो प्रजावर्गके कर्मका साक्षी है, उसी कालने तुम्हारे शत्रुओंका संहार किया है॥ १७॥
हेतुमात्रमिदं तस्य विहितं भरतर्षभ।
यद्घ्नन्ति भूतैर्भूतानि तदस्मै रूपमैश्वरम्॥ १८॥
भरतश्रेष्ठ! कालने इस युद्धको निमित्तमात्र बनाया है। वह जो प्राणियोंद्वारा ही प्राणियोंका वध करता है, वही उसका ईश्वरीय रूप है॥ १८॥
कर्मसूत्रात्मकं विद्धि साक्षिणं शुभपापयोः।
सुखदुःखगुणोदर्कं कालं कालफलप्रदम्॥ १९॥
राजन्! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि काल जीवके पाप और पुण्यकर्मोंका साक्षी है। वह कर्मकी डोरीका सहारा ले भविष्यमें होनेवाले सुख और दुःखका उत्पादक होता है। वही समयानुसार कर्मोंका फल देता है॥ १९॥
तेषामपि महाबाहो कर्माणि परिचिन्तय।
विनाशहेतुकानि त्वं यैस्ते कालवशं गताः॥ २०॥
महाबाहो! तुम युद्धमें मारे गये उन क्षत्रियोंके भी ऐसे कर्मोंका चिन्तन करो जो उनके विनाशके कारण थे और जिनके होनेसे ही उन्हें कालके अधीन होना पड़ा॥ २०॥
आत्मनश्च विजानीहि नियतव्रतशासनम्।
यदा त्वमीदृशं कर्म विधिनाऽऽक्रम्य कारितः॥ २१॥
तुम अपने आचार-व्यवहारपर भी ध्यान दो कि 'तुम सदा ही नियमपूर्वक उत्तम व्रतके पालनमें लगे रहते थे तो भी विधाताने बलपूर्वक तुम्हें अपने अधीन करके तुम्हारे द्वारा ऐसा निष्ठुर कर्म करवा लिया'॥ २१॥
त्वष्ट्रेव विहितं यन्त्रं यथा चेष्टयितुर्वशे।

कर्मणा कालयुक्तेन तथे switch चेष्टते जगत् ॥ २२ ॥
जैसे लोहार या बढ़ईका बनाया हुआ यन्त्र सदा उसके चालकके अधीन रहता है, उसी प्रकार यह सारा जगत् कालयुक्त कर्मकी प्रेरणासे ही सचेष्ट हो रहा है ॥

पुरुषस्य हि दृष्ट्वेवामुत्पत्तिमनिमित्ततः ।
यदृच्छया विनाशं च शोकहर्षावनर्थकौ ॥ २३ ॥

प्राणी किसी व्यक्त कारणके बिना ही दैवात् उत्पन्न होता है और दैवेच्छासे ही अकस्मात् उसका विनाश हो जाता है। यह सब देखकर शोक और हर्ष करना व्यर्थ है ॥ २३ ॥

व्यलीकमपि यत् तव चित्तवैतंसिकं तव ।
तदर्थमिष्यते राजन् प्रायश्चित्तं तदाचर ॥ २४ ॥

राजन्! तथापि तुम्हारे चित्तमें जो यहाँ उन सबको मरवानेके कारण झूठे ही चिन्ता और पीड़ा हो रही है, इसकी निवृत्तिके लिये प्रायश्चित्त कर देना उचित है, अतः तुम अवश्य प्रायश्चित्त करो ॥ २४ ॥

इदं तु श्रूयते पार्थ युद्धे देवासुरे पुरा ।
असुरा भ्रातरो ज्येष्ठा देवाश्चापि यवीयसः ॥ २५ ॥
तेषामपि श्रीनिमित्तं महानासीत् समुच्चयः ।
युद्धं वर्षसहस्राणि द्वात्रिंशदभवत् किल ॥ २६ ॥

पार्थ! यह बात सुनी जाती है कि पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर बड़े भाई असुर और छोटे भाई देवता आपसमें लड़ गये थे। उनमें भी राजलक्ष्मीके लिये ही बत्तीस हजार वर्षोंतक बड़ा भारी संग्राम हुआ था ॥

एकार्णवां महीं कृत्वा रुधिरेण परिप्लुताम् ।
जघ्नुर्दैत्यांस्तथा देवास्त्रिदिवं चाभिलेभिरे ॥ २७ ॥

देवताओंने खूनसे भीगी हुई इस पृथ्वीको एकार्णवमें निमग्न करके दैत्योंका संहार कर डाला और स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया ॥ २७ ॥

तथैव पृथिवीं लब्ध्वा ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
संश्रिता दानवानां वै साह्यार्थं दर्पमोहिताः ॥ २८ ॥
शालावृका इति ख्यातास्त्रिषु लोकेषु भारत ।
अष्टाशीतिसहस्राणि ते चापि विबुधैर्हताः ॥ २९ ॥

भारत! इसी प्रकार पृथ्वीको भी अपने अधीन करके देवताओंने तीनों लोकोंमें शालावृक नामसे विख्यात उन अट्ठासी हजार ब्राह्मणोंका भी वध कर डाला, जो वेदोंके पारङ्गत विद्वान् थे और अभिमानसे मोहित होकर दानवोंकी सहायताके लिये उनके पक्षमें जा मिले थे ॥ २८-२९ ॥

धर्मव्युच्छित्तिमिच्छन्तो येऽधर्मस्य प्रवर्तकाः ।

हन्तव्यास्ते दुरात्मानो देवैर्दैत्या इवोल्बणाः ॥ ३० ॥

जो धर्मका विनाश चाहते हुए अधर्मके प्रवर्तक हो रहे हों, उन दुरात्माओंका वध करना

ही उचित है। जैसे देवताओंने उद्दण्ड दैत्योंका विनाश कर डाला था ॥

एकं हत्वा यदि कुले शिष्टानां स्यादनामयम् ।

कुलं हत्वा च राष्ट्रं च न तद् वृत्तोपघातकम् ॥ ३१ ॥

यदि एक पुरुषको मार देनेसे कुटुम्बके शेष व्यक्तियोंका कष्ट दूर हो जाय और एक

कुटुम्बका नाश कर देनेसे सारे राष्ट्रमें सुख और शान्ति छा जाय तो वैसा करना सदाचार या

धर्मका नाशक नहीं है ॥ ३१ ॥

अधर्मरूपो धर्मो हि कश्चिदस्ति नराधिप ।

धर्मश्चाधर्मरूपोऽस्ति तच्च ज्ञेयं विपश्चिता ॥ ३२ ॥

नरेश्वर! किसी समय धर्म ही अधर्मरूप हो जाता है और कहीं अधर्मरूप दीखनेवाला

कर्म ही धर्म बन जाता है; इसलिये विद्वान् पुरुषको धर्म और अधर्मका रहस्य अच्छी तरह

समझ लेना चाहिये ॥ ३२ ॥

तस्मात् संस्तम्भयात्मानं श्रुतवानसि पाण्डव ।

देवैः पूर्वगतं मार्गमनुयातोऽसि भारत ॥ ३३ ॥

पाण्डुनन्दन! तुम वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता हो, तुमने श्रेष्ठ पुरुषोंके उपदेश सुने हैं; इसलिये

अपने हृदयको स्थिर करो, शोकसे विचलित न होने दो। भारत! तुमने तो उसी मार्गका

अनुसरण किया है, जिसपर देवतालोग पहलेसे चल चुके हैं ॥ ३३ ॥

न हीदृशा गमिष्यन्ति नरकं पाण्डवर्षभ ।

भ्रातॄनाश्वासयैतांस्त्वं सुहृदश्च परंतप ॥ ३४ ॥

पाण्डवशिरोमणे! तुम्हारे-जैसे लोग नरकमें नहीं गिरेंगे। शत्रुसंतापी नरेश! तुम इन

भाइयों और सुहृदोंको आश्वासन दो ॥ ३४ ॥

यो हि पापसमारम्भे कार्ये तद्भावभावितः ।

कुर्वन्नपि तथैव स्यात् कृत्वा च निरपत्रपः ॥ ३५ ॥

तस्मिंस्तत् कलुषं सर्वं समाप्तमिति शब्दितम् ।

प्रायश्चित्तं न तस्यास्ति ह्रासो वा पापकर्मणः ॥ ३६ ॥

जो पुरुष हृदयमें पापकी भावना रखकर किसी पापकर्ममें प्रवृत्त होता है, उसे करते

हुए भी उसी भावनासे भावित रहता है तथा पापकर्म करनेके पश्चात् भी लज्जित नहीं

होता, उसमें वह सारा पाप पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित हो जाता है, ऐसा शास्त्रका कथन है।

उसकेलिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है तथा प्रायश्चित्तसे भी उसके पापकर्मका नाश नहीं होता

है ॥ ३५-३६ ॥

त्वं तु शुक्लाभिजातीयः परदोषेण कारितः ।

अनिच्छमानः कर्मेदं कृत्वा च परितप्स्यसे ॥ ३७ ॥

तुम तो जन्मसे ही शुद्ध स्वभावके हो। तुम्हारे मनमें युद्धकी इच्छा बिल्कुल नहीं थी। शत्रुओंके अपराधसे ही तुम्हें इस कार्यमें प्रवृत्त होना पड़ा। तुम यह युद्धकर्म करके भी निरन्तर पश्चात्ताप ही कर रहे हो ॥ ३७ ॥

अश्वमेधो महायज्ञः प्रायश्चित्तमुदाहृतम् ।
तमाहर महाराज विपाप्मैवं भविष्यसि ॥ ३८ ॥
इसके लिये महान् यज्ञ अश्वमेध ही प्रायश्चित्त बताया गया है। महाराज! तुम इस यज्ञका अनुष्ठान करो। ऐसा करनेसे तुम पापरहित हो जाओगे ॥ ३८ ॥

मरुद्भिः सह जित्वारीन् भगवान् पाकशासनः ।
एकैकं क्रतुमाहृत्य शतकृत्वः शतक्रतुः ॥ ३९ ॥
मरुद्गणोंसहित भगवान् पाकशासन इन्द्रने शत्रुओंको जीतकर एक-एक करके सौ बार अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया। इससे वे 'शतक्रतु' नामसे विख्यात हो गये ॥ ३९ ॥

धूतपाप्माजितस्वर्गो लोकान् प्राप्य सुखोदयान् ।
मरुद्गणैर्वृतः शक्रः शुशुभे भासयन् दिशः ॥ ४० ॥
उनके सारे पाप धुल गये। उन्होंने स्वर्गपर विजय पायी और सुखदायक लोकोंमें पहुँचकर वे इन्द्र सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए मरुद्गणोंके साथ शोभा पाने लगे ॥ ४० ॥

स्वर्गे लोके महीयन्तमप्सरोभिः शचीपतिम् ।
ऋषयः पर्युपासन्ते देवाश्च विबुधेश्वरम् ॥ ४१ ॥
स्वर्गलोकमें अप्सराओं‌द्वारा पूजित होनेवाले शचीपति देवराज इन्द्रकी सम्पूर्ण देवता और महर्षि भी उपासना करते हैं ॥ ४१ ॥

सेयं त्वामनुसम्प्राप्ता विक्रमेण वसुन्धरा ।
निर्जिताश्च महीपाला विक्रमेण त्वयानघ ॥ ४२ ॥
अनघ! तुमने भी इस वसुन्धराको अपने पराक्रमसे प्राप्त किया है और भुजाओंके बलसे समस्त राजाओंको परास्त किया है ॥ ४२ ॥

तेषां पुराणि राष्ट्राणि गत्वा राजन् सुहृद्वृतः ।
भ्रातॄन् पुत्रांश्च पौत्रांश्च स्वे स्वे राज्येऽभिषेचय ॥ ४३ ॥
राजन्! अब तुम अपने सुहृदोंके साथ उनके देश और नगरोंमें जाकर उनके भाइयों, पुत्रों अथवा पौत्रोंको अपने-अपने राज्यपर अभिषिक्त करो ॥ ४३ ॥

बालानपि च गर्भस्थान् सान्त्वेन समुदाचरन् ।
रञ्जयन् प्रकृतीः सर्वाः परिपाहि वसुन्धराम् ॥ ४४ ॥
जिनके उत्तराधिकारी अभी बालक हों या गर्भमें हों, उनकी प्रजाको समझा-बुझाकर सान्त्वनाद्वारा शान्त करो और सारी प्रजाका मनोरंजन करते हुए इस पृथ्वीका पालन करो ॥ ४४ ॥

कुमारो नास्ति येषां च कन्यास्तत्राभिषेचय ।
कामाशयो हि स्त्रीवर्गः शोकमेवं प्रहास्यसि ॥ ४५ ॥
जिन राजाओंके कोई पुत्र नहीं हो, उनकी कन्याओंको ही राज्यपर अभिषिक्त कर दो। ऐसा करनेसे उनकी स्त्रियोंकी मनःकामना पूर्ण होगी और वे शोक त्याग देंगी ॥ ४५ ॥

एवमाश्वासनं कृत्वा सर्वराष्ट्रेषु भारत ।
यजस्व वाजिमेधेन यथेन्द्रो विजयी पुरा ॥ ४६ ॥
भारत! इस प्रकार सारे राज्यमें शान्ति स्थापित करके तुम उसी प्रकार अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करो, जैसे पूर्वकालमें विजयी इन्द्रने किया था ॥ ४६ ॥

अशोच्यास्ते महात्मानः क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ।
स्वकर्मभिर्गता नाशं कृतान्तबलमोहिताः ॥ ४७ ॥
क्षत्रियशिरोमणे! वे महामनस्वी क्षत्रिय, जो युद्धमें मारे गये हैं, शोक करनेके योग्य नहीं हैं; क्योंकि वे कालकी शक्तिसे मोहित होकर अपने ही कर्मोंसे नष्ट हुए हैं ॥ ४७ ॥

अवाप्तः क्षत्रधर्मस्ते राज्यं प्राप्तमकण्टकम् ।
रक्षस्व धर्मं कौन्तेय श्रेयान् यः प्रेत्य भारत ॥ ४८ ॥
कुन्तीकुमार! भरतनन्दन! तुमने क्षत्रियधर्मका पालन किया है और इस समय तुम्हें यह निष्कण्टक राज्य मिला है; अतः अब तुम उस धर्मकी ही रक्षा करो, जो मृत्युके पश्चात् सबका कल्याण करनेवाला है ॥ ४८ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि प्रायश्चित्तोपाख्याने त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें प्रायश्चित्तोपाख्यान-विषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 235)

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चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

जिन कर्मोंके करने और न करनेसे कर्ता प्रायश्चित्तका भागी होता और नहीं होता—उनका विवेचन

युधिष्ठिर उवाच कानि कृत्वेह कर्माणि प्रायश्चित्तीयते नरः ।
किं कृत्वा मुच्यते तत्र तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! किन-किन कर्मोंको करनेसे मनुष्य प्रायश्चित्तका अधिकारी होता है और उनके लिये कौन-सा प्रायश्चित्त करके वह पापसे मुक्त होता है? इस विषयमें यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥

व्यास उवाच अकुर्वन् विहितं कर्म प्रतिषिद्धानि चाचरन् ।
प्रायश्चित्तीयते ह्येवं नरो मिथ्यानुवर्तयन् ॥ २ ॥
व्यासजी बोले— राजन्! जो मनुष्य शास्त्रविहित कर्मोंका आचरण न करके निषिद्ध कर्म कर बैठता है, वह उस विपरीत आचरणके कारण प्रायश्चित्तका भागी होता है ॥ २ ॥

सूर्येणाभ्युदितो यश्च ब्रह्मचारी भवत्युत ।
तथा सूर्याभिनिर्मुक्तः कुनखी श्यावदन्नपि ॥ ३ ॥
जो ब्रह्मचारी सूर्योदय अथवा सूर्यास्तके समयतक सोता रहे तथा जिसके नख और दाँत काले हों,* उन सबको प्रायश्चित्त करना चाहिये ॥ ३ ॥

परिवित्तिः परिवेत्ता ब्रह्मघ्नो यश्च कुत्सकः ।
दिधिषूपपतिर्यः स्यादग्रेदिधिषुरेव च ॥ ४ ॥
अवकीर्णी भवेद् यश्च द्विजातिवधकस्तथा ।
अतीर्थे ब्राह्मणस्त्यागी तीर्थे चाप्रतिपादकः ॥ ५ ॥
ग्रामघाती च कौन्तेय मांसस्य परिविक्रयी ।
यश्चाग्नीनपविध्येत तथैव ब्रह्मविक्रयी ॥ ६ ॥
स्त्रीशूद्रवधको यश्च पूर्वः पूर्वस्तु गर्हितः ।
यथा पशुसमालम्भी गृहदाहस्य कारकः ॥ ७ ॥
अनृतेनोपवर्ती च प्रतिरोद्धा गुरोस्तथा ।
एतान्येनांसि सर्वाणि व्युत्क्रान्तसमयश्च यः ॥ ८ ॥
कुन्तीनन्दन! इसके सिवा परिवेत्ता (बड़े भाईके अविवाहित रहते हुए विवाह करनेवाला छोटा भाई), परिवित्ति (परिवेत्ताका बड़ा भाई), ब्रह्महत्यारा और जो दूसरोंकी

निन्दा करनेवाला है वह तथा छोटी बहिनके विवाहके बाद उसकी बड़ी बहिनसे ब्याह करनेवाला, जेठी बहिनके अविवाहित रहते हुए ही उसकी छोटी बहिनसे विवाह करनेवाला, जिसका व्रत नष्ट हो गया हो वह ब्रह्मचारी, द्विजकी हत्या करनेवाला, अपात्रको दान देनेवाला, सुपात्र ब्राह्मणको दान न देनेवाला, ग्रामका नाश करनेवाला, मांस बेचनेवाला तथा जो आग लगानेवाला है, जो वेतन लेकर वेद पढ़ानेवाला एवं स्त्री और शूद्रका वध करनेवाला है, इनमें पीछेवालोंसे पहलेवाले अधिक पापी हैं तथा पशु-वध करनेवाला, दूसरोंके घरमें आग लगानेवाला, झूठ बोलकर पेट पालनेवाला, गुरुका अपमान और सदाचारकी मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला—ये सभी पापी माने गये हैं। इन्हें प्रायश्चित्त करना चाहिये ॥ ४—८ ॥

अकार्याणि तु वक्ष्यामि यानि तानि निबोध मे ।
लोकवेदविरुद्धानि तान्येकाग्रमनाः शृणु ॥ ९ ॥
इनके सिवा, जो लोक और वेदसे विरुद्ध न करनेयोग्य कर्म हैं, उन्हें भी बताता हूँ। तुम एकाग्रचित होकर सुनो और समझो ॥ ९ ॥

स्वधर्मस्य परित्यागः परधर्मस्य च क्रिया ।
अयाज्ययाजनं चैव तथाभक्ष्यस्य भक्षणम् ॥ १० ॥
शरणागतसंत्‍यागो भृत्यस्याभरणं तथा ।
रसानां विक्रयश्चापि तिर्यग्योनिवधस्तथा ॥ ११ ॥
आधानादीनि कर्माणि शक्तिमान्न करोति यः ।
अप्रयच्छंश्च सर्वाणि नित्यदेयानि भारत ॥ १२ ॥
दक्षिणानामदानं च ब्राह्मणस्वाभिमर्शनम् ।
सर्वाण्येतान्यकार्याणि प्राहुर्धर्मविदो जनाः ॥ १३ ॥
भारत! अपने धर्मको त्याग देना और दूसरेके धर्मका आचरण करना, यज्ञके अनधिकारीको यज्ञ कराना तथा अभक्ष्य भक्षण करना, शरणागतका त्याग करना और भरण करने योग्य व्यक्तियोंका भरण-पोषण न करना, एवं रसोंको बेचना, पशु-पक्षियोंको मारना और शक्ति रहते हुए भी अग्न्याधान आदि कर्मोंको न करना, नित्य देने योग्य गोग्रास आदि को न देना, ब्राह्मणोंको दक्षिणा न देना और उनका सर्वस्व छीन लेना, धर्मतत्त्वके जाननेवालोंने ये सभी कर्म न करने योग्य बताये हैं ॥

पित्रा विवदते पुत्रो यश्च स्याद् गुरुतल्पगः ।
अप्रजायन् नरव्याघ्र भवत्यधार्मिको नरः ॥ १४ ॥
राजन्! जो पुरुष पिताके साथ झगड़ा करता है, गुरुकी शय्यापर सोता है, ऋतुकालमें भी अपनी पत्नीके साथ समागम नहीं करता है, वह मनुष्य अधार्मिक होता है ॥ १४ ॥

उक्तान्येतानि कर्माणि विस्तरेणेतरेण च ।
यानि कुर्वन्नकुर्वंश्च प्रायश्चित्तीयते नरः ॥ १५ ॥

इस प्रकार संक्षेप और विस्तारसे जो ये कर्म बताये गये हैं, उनमेंसे कुछको करनेसे और कुछको न करनेसे मनुष्य प्रायश्चित्तका भागी होता है ।। १५ ।। एतान्येव तु कर्माणि क्रियमाणानि मानवाः । येषु येषु निमित्तेषु न लिप्यन्तेऽथ तान् शृणु ।। १६ ।। अब जिन-जिन कारणोंके होनेपर इन कर्मोंको करते रहनेपर भी मनुष्य पापसे लिप्त नहीं होते, उनका वर्णन सुनो ।। १६ ।। प्रगृह्य शस्त्रमायान्तमपि वेदान्तगं रणे । जिघांसन्तं जिघांसीयान्न तेन ब्रह्महा भवेत् ।। १७ ।। यदि युद्धस्थलमें वेदवेदान्तोंका पारगामी विद्वान् ब्राह्मण भी हाथमें हथियार लेकर मारनेके लिये आवे तो स्वयं भी उसको मार डालनेकी चेष्टा करे। इससे ब्रह्महत्याका पाप नहीं लगता है ।। १७ ।। इति चाप्यत्र कौन्तेय मन्त्रो वेदेषु पठ्यते । वेदप्रमाणविहितं धर्मं च प्रब्रवीमि ते ।। १८ ।। कुन्तीनन्दन! इस विषयमें वेदका एक मन्त्र भी पढ़ा जाता है। मैं तुमसे उसी धर्मकी बात कहता हूँ, जो वैदिक प्रमाणसे विहित है ।। १८ ।। अपेतं ब्राह्मणं वृत्ताद् यो हन्यादाततायिनम् । न तेन ब्रह्महा स स्यान्मन्युस्तन्मन्युमृच्छति ।। १९ ।। जो ब्राह्मणोचित आचारसे भ्रष्ट होकर आततायी बन गया हो—हाथमें हथियार लेकर मारने आ रहा हो, ऐसे ब्राह्मणको मारनेसे ब्रह्महत्याका पाप नहीं लगता। क्रोध ही उसके क्रोधका सामना करता है ।। १९ ।। प्राणात्यये तथाज्ञानादाचरन्मदिरामपि । आदेशितो धर्मपरैः पुनः संस्कारमर्हति ।। २० ।। अनजानमें अथवा प्राणसंकटके समय भी यदि मदिरापान कर ले तो बादमें धर्मात्मा पुरुषोंकी आज्ञाके अनुसार उसका पुनः संस्कार होना चाहिये ।। २० ।। एतत् ते सर्वमाख्यातं कौन्तेयाभक्ष्यभक्षणम् । प्रायश्चित्तविधानेन सर्वमेतेन शुद्ध्यति ।। २१ ।। कुन्तीनन्दन! यही बात अन्य सब अभक्ष्यभक्षणोंके विषयमें भी कही गयी है। प्रायश्चित्त कर लेनेसे सब शुद्ध हो जाता है ।। २१ ।। गुरुतल्पं हि गुर्वर्थं न दूषयति मानवम् । उद्दालकः श्वेतकेतुं जनयामास शिष्यतः ।। २२ ।। गुरुकी आज्ञासे उन्हींके प्रयोजनकी सिद्धिके लिये गुरुकी शय्यापर शयन करना मनुष्यको दूषित नहीं करता है। उद्दालकने अपने पुत्र श्वेतकेतुको शिष्यद्वारा उत्पन्न कराया था ।। २२ ।।

स्तेयं कुर्वंश्च गुर्वर्थमापत्सु न निषिध्यते । बहुशः कामकारेण न चेद् यः सम्प्रवर्तते ॥ २३ ॥ अन्यत्र ब्राह्मणस्वेभ्य आददानो न दुष्यति । स्वयमप्राशिता यश्च न स पापेन लिप्यते ॥ २४ ॥ (चोरी सर्वथा निषिद्ध है) किंतु आपत्तिकालमें कभी गुरुके लिये चोरी करनेवाला पुरुष दोषका भागी नहीं होता है। यदि मनमें कामना रखकर बारंबार उस चौर्य-कर्ममें वह प्रवृत्त न होता हो तो आपत्तिके समय ब्राह्मणके सिवा किसी दूसरेका धन लेनेवाला मनुष्य पापका भागी नहीं होता है। जो स्वयं उस चोरीका अन्न नहीं खाता, वह भी चौर्यदोषसे लिप्त नहीं होता है ॥

प्राणत्राणेऽनृतं वाच्यमात्मनो वा परस्य च । गुर्वर्थे स्त्रीषु चैव स्याद् विवाहकरणेषु च ॥ २५ ॥ अपने या दूसरेके प्राण बचानेके लिये, गुरुके लिये, एकान्तमें अपनी स्त्रीके पास विनोद करते समय अथवा विवाहके प्रसङ्गमें झूठ बोल दिया जाय तो पाप नहीं लगता है ॥ २५ ॥

नावर्तते व्रतं स्वप्ने शुक्रमोक्षे कथंचन । आज्यहोमः समिद्धेऽग्नौ प्रायश्चित्तं विधीयते ॥ २६ ॥ यदि किसी कारणसे स्वप्नमें वीर्य स्खलित हो जाय तो इससे ब्रह्मचारीके लिये दुबारा व्रत लेने—उपनयन-संस्कार करानेकी आवश्यकता नहीं है। इसके लिये प्रज्वलित अग्निमें घीका हवन करना प्रायश्चित्त बताया गया है ॥ २६ ॥

परिवित्त्यं तु पतिते नास्ति प्रव्रजिते तथा । भिक्षिते पारदार्यं च तद् धर्मस्य न दूषकम् ॥ २७ ॥ यदि बड़ा भाई पतित हो जाय या संन्यास ले ले तो उसके अविवाहित रहते हुए भी छोटे भाईका विवाह कर लेना दोषकी बात नहीं है। संतान-प्राप्तिके लिये स्त्रीद्वारा प्रार्थना करनेपर यदि कभी परस्त्रीसंगम किया जाय तो वह धर्मका लोप करनेवाला नहीं होता है ॥

वृथा पशुसमालम्भं नैव कुर्यान्न कारयेत् । अनुग्रहः पशूनां हि संस्कारो विधिनोदितः ॥ २८ ॥ मनुष्यको चाहिये कि वह व्यर्थ ही पशुओंका वध न तो करे और न करावे। विधिपूर्वक किया हुआ पशुओंका संस्कार उनपर अनुग्रह है ॥ २८ ॥

अनर्हे ब्राह्मणे दत्तमज्ञानात् तन्न दूषकम् । सत्काराणां तथा तीर्थे नित्यं वाप्रतिपादनम् ॥ २९ ॥ यदि अनजानमें किसी अयोग्य ब्राह्मणको दान दे दिया जाय अथवा योग्य ब्राह्मणको सत्कारपूर्वक दान न दिया जा सके तो वह दोषकारक नहीं होता ॥ २९ ॥

स्त्रियास्तथापचारिण्या निष्कृतिः स्याददूषिका । अपि सा पूयते तेन न तु भर्ता प्रदुष्यति ॥ ३० ॥

यदि व्यभिचारिणी स्त्रीका तिरस्कार किया जाय तो वह दोषकी बात नहीं है। उस तिरस्कारसे स्त्रीकी तो शुद्धि होती है और पति भी दोषका भागी नहीं होता ॥ ३० ॥

तत्त्वं ज्ञात्वा तु सोमस्य विक्रयः स्याददोषवान् ।
असमर्थस्य भृत्यस्य विसर्गः स्याददोषवान् ।
वनदाहो गवामर्थे क्रियमाणो न दूषकः ॥ ३१ ॥
सोमरसके तत्त्वको जानकर यदि उसका विक्रय किया जाय तो बेचनेवाला दोषका भागी नहीं होता। जो सेवक काम करनेमें असमर्थ हो जाय, उसे छोड़ देनेसे भी दोष नहीं लगता। गौओंकी सुविधाके लिये यदि जंगलमें आग लगायी जाय तो उससे पाप नहीं होता है ॥

उक्तान्येतानि कर्माणि यानि कुर्वन्न दुष्यति ।
प्रायश्चित्तानि वक्ष्यामि विस्तरेणैव भारत ॥ ३२ ॥
भरतनन्दन! ये सब तो मैंने वे कर्म बताये हैं, जिन्हें करनेवाला दोषका भागी नहीं होता है। अब मैं विस्तारपूर्वक प्रायश्चित्तोंका वर्णन करूँगा ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि प्रायश्चित्तीये
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें प्रायश्चित्तके प्रकरणमें चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥


* क्योंकि ‘स्वर्णहारी तु कुनखी सुरापः श्यामदन्तकः’ (कर्म-विपाक) इस स्मृतिके अनुसार वे पूर्व जन्ममें क्रमशः सुवर्णकी चोरी करनेवाले और शराबी होते हैं।

पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन

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पञ्चत्रिंशोऽध्यायः

पापकर्मके प्रायश्चित्तोंका वर्णन

व्यास उवाच

तपसा कर्मणा चैव प्रदानेन च भारत ।
पुनाति पापं पुरुषः पुनश्चेन्न प्रवर्तते ॥ १ ॥
व्यासजी बोले— भरतनन्दन! मनुष्य तपसे यज्ञ आदि सत्कर्मोंसे तथा दानके द्वारा पापको धो-बहाकर अपने-आपको पवित्र कर लेता है, परंतु यह तभी सम्भव होता है, जब वह फिर पापमें प्रवृत्त न हो ॥ १ ॥

एककालं तु भुञ्जीत चरन् भैक्ष्यं स्वकर्मकृत् ।
कपालपाणिः खट्वाङ्गी ब्रह्मचारी सदोत्थितः ॥ २ ॥
अनसूयुरधःशायी कर्म लोके प्रकाशयन् ।
पूर्णैर्द्वादशभिर्वर्षैर्ब्रह्महा विप्रमुच्यते ॥ ३ ॥
यदि किसीने ब्रह्महत्या की हो तो वह भिक्षा माँगकर एक समय भोजन करे, अपना सब काम स्वयं ही करे, हाथमें खप्पर और खाटका पाया लिये रहे, सदा ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करे, उद्यमशील बना रहे, किसीके दोष न देखे, जमीन पर सोये और लोकमें अपना पापकर्म प्रकट करता रहे। इस प्रकार बारह वर्षतक करनेसे ब्रह्महत्यारा पापमुक्त हो जाता है ॥ २-३ ॥

लक्ष्यः शस्त्रभृतां वा स्याद् विदुषामिच्छयाऽऽत्मनः ।
प्रास्येदात्मानमग्नौ वा समिद्धे त्रिरवाक्शिराः ॥ ४ ॥
जपन् वान्यतमं वेदं योजनानां शतं व्रजेत् ।
सर्वस्वं वा वेदविदे ब्राह्मणायोपपादयेत् ॥ ५ ॥
धनं वा जीवनायालं गृहं वा सपरिच्छदम् ।
मुच्यते ब्रह्महत्याया गोप्ता गोब्राह्मणस्य च ॥ ६ ॥
अथवा प्रायश्चित्त बतानेवाले विद्वानोंकी या अपनी इच्छासे शस्त्रधारी पुरुषोंके अस्त्र-शस्त्रोंका निशाना बन जाय अथवा अपनेको प्रज्वलित आगमें झोंक दे अथवा नीचे सिर किये किसी भी एक वेदका पाठ करते हुए तीन बार सौ-सौ योजनकी यात्रा करे अथवा किसी वेदवेत्ता ब्राह्मणको अपना सर्वस्व समर्पण कर दे या जीवन-निर्वाहके लिये पर्याप्त धन अथवा सब सामानोंसे भरा हुआ घर ब्राह्मणको दान कर दे—इस प्रकार गौओं और ब्राह्मणोंकी रक्षा करनेवाला पुरुष ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है ॥ ४—६ ॥

षड्भिर्वर्षैः कृच्छ्रभोजी ब्रह्महा पूयते नरः ।
मासे मासे समश्नंस्तु त्रिभिर्वर्षैः प्रमुच्यते ॥ ७ ॥

यदि ब्रह्महत्या करनेवाला पुरुष कृच्छ्रव्रतके अनुसार भोजन करे तो छः वर्षोंमें वह शुद्ध हो जाता है और एक-एक मासमें एक-एक कृच्छ्रव्रतका निर्वाह करते हुए भोजन करे तो वह तीन ही वर्षोंमें पापमुक्त हो जाता है ।। संवत्सरेण मासाशी पूयते नात्र संशयः । तथैवोपवसन् राजन् स्वल्पेनापि प्रपूयते ।। ८ ।। यदि एक-एक मासपर भोजनक्रम बदलते हुए अत्यन्त तीव्र कृच्छ्रव्रतके अनुसार अन्न ग्रहण करे तो एक वर्षमें ही ब्रह्महत्यासे छुटकारा मिल सकता है३. इसमें संशय नहीं है। राजन्! इसी प्रकार यदि केवल उपवास करनेवाला मनुष्य हो तो उसकी स्वल्प समयमें ही शुद्धि हो जाती है ।। ८ ।। ऋतुना चाश्वमेधेन पूयते नात्र संशयः । ये चाप्यवभृथस्नाताः केचिदेवंविधा नराः ।। ९ ।। ते सर्वे धूतपाप्मानो भवन्तीति परा श्रुतिः । अश्वमेध यज्ञ करनेसे भी ब्रह्महत्याका पाप शुद्ध हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। जो इस प्रकारके लोग महायज्ञोंमें अवभृथ-स्नान करते हैं, वे सभी पापमुक्त हो जाते हैं—ऐसा श्रुतिका३ कथन है ।। ९ १/२ ।। ब्राह्मणार्थे हतो युद्धे मुच्यते ब्रह्महत्यया ।। १० ।। गवां शतसहस्रं तु पात्रेभ्यः प्रतिपादयेत् । ब्रह्महा विप्रमुच्येत सर्वपापेभ्य एव च ।। ११ ।। जो पुरुष ब्राह्मणके लिये युद्धमें प्राण दे देता है, वह भी ब्रह्महत्यासे छूट जाता है। ब्रह्महत्यारा होनेपर भी जो सुपात्र ब्राह्मणोंको एक लाख गौओंका दान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है ।। १०-११ ।। कपिलानां सहस्राणि यो दद्यात् पञ्चविंशतिम् । दोग्ध्रीणां स च पापेभ्यः सर्वेभ्यो विप्रमुच्यते ।। १२ ।। जो दूध देनेवाली पचीस हजार कपिला गौओंका दान करता है, वह समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाता है ।। गोसहस्रं सवत्सानां दोग्ध्रीणां प्राणसंशये । साधुभ्यो वै दरिद्रेभ्यो दत्त्वा मुच्येत किल्बिषात् ।। १३ ।। जब मृत्युकाल निकट हो, उस समय सदाचारी दरिद्र ब्राह्मणोंको दूध देनेवाली एक हजार सवत्सा गौओंका दान करके भी मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो सकता है ।। १३ ।। शतं वै यस्तु काम्बोजान् ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति । नियतेभ्यो महीपाल स च पापात् प्रमुच्यते ।। १४ ।।

भूपाल! जो संयम-नियमसे रहनेवाले ब्राह्मणोंको सौ काबुली घोड़ोंका दान करता है, उसे भी पापसे छुटकारा मिल जाता है ॥ १४ ॥

मनोरथं तु यो दद्यादेकस्मा अपि भारत । न कीर्तयेत दत्त्वा यः स च पापात् प्रमुच्यते ॥ १५ ॥ भरतनन्दन! जो एक ब्राह्मणको भी उसकी मनोवांछित वस्तु दे देता है और देकर फिर उसकी कहीं चर्चा नहीं करता, वह भी पापसे मुक्त हो जाता है ॥ १५ ॥

सुरापानं सकृत् कृत्वा योऽग्निवर्णां सुरां पिबेत् । स पावयत्यात्मानमिह लोके परत्र च ॥ १६ ॥ जो एक बार मदिरा-पान करके फिर आगके समान गर्म की हुई मदिरा पी लेता है, वह इहलोक और परलोकमें भी अपनेको पवित्र कर लेता है ॥ १६ ॥

मरुप्रपातं प्रपतन् ज्वलनं वा समाविशन् । महाप्रस्थानमातिष्ठन् मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥ १७ ॥ जलहीन देशमें पर्वतसे गिरकर अथवा अग्निमें प्रवेश करके या महाप्रस्थानकी विधिसे हिमालयमें गलकर प्राण दे देनेसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ १७ ॥

बृहस्पतिसवेनेष्ट्वा सुरापो ब्राह्मणः पुनः । समितिं ब्राह्मणो गच्छेदिति वै ब्रह्मणः श्रुतिः ॥ १८ ॥ मदिरा पीनेवाला ब्राह्मण ‘बृहस्पति-सव’ नामक यज्ञ करके शुद्ध होनेपर ब्रह्माजीकी सभामें जा सकता है—ऐसा श्रुतिका कथन है ॥ १८ ॥

भूमिप्रदानं कुर्याद् यः सुरां पीत्वा विमत्सरः । पुनर्न च पिबेद् राजन् संस्कृतः स च शुद्ध्यति ॥ १९ ॥ राजन्! जो मदिरा पी लेनेपर ईर्ष्या-द्वेषसे रहित हो भूमिदान करे और फिर कभी उसे न पीये, वह संस्कार करनेके पश्चात् शुद्ध होता है ॥ १९ ॥

गुरुतल्पी शिलां तप्तामायसीमभिसंविशेत् । अवकृत्यात्मनः शेफं प्रव्रजेदूर्ध्वदर्शनः ॥ २० ॥ शरीरस्य विमोक्षेण मुच्यते कर्मणोऽशुभात् । गुरुपत्नीगमन करनेवाला मनुष्य तपायी हुई लोहेकी शिलापर सो जाय अथवा अपनी मूत्रेन्द्रिय काटकर ऊपरकी ओर देखता हुआ आगे बढ़ता चला जाय। इस प्रकार शरीर छूट जानेपर वह उस पापकर्मसे मुक्त हो जाता है ॥ २० १/२ ॥

कर्मभ्यो विप्रमुच्यन्ते यत्ताः संवत्सरं स्त्रियः ॥ २१ ॥ महाव्रतं चरेद् यस्तु दद्यात् सर्वस्वमेव तु । गुर्वर्थे वा हतो युद्धे स मुच्येत् कर्मणोऽशुभात् ॥ २२ ॥ स्त्रियाँ भी एक वर्षतक मिताहार एवं संयमपूर्वक रहनेपर उक्त पापकर्मोंसे मुक्त हो जाती हैं। जो महाव्रतका (एक महीनेतक जल न पीनेके नियमका) पालन करता है,

ब्राह्मणोंको अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है अथवा गुरुके लिये युद्धमें मारा जाता है, वह अशुभ कर्मके बन्धनसे मुक्त हो जाता है ।। २१-२२ ।।
अनृतेनोपवर्ती चेत् प्रतिरोध्दा गुरोस्तथा ।
उपाहृत्य प्रियं तस्मै तस्मात् पापात् प्रमुच्यते ।। २३ ।।
झूठ बोलकर जीविका चलानेवाला तथा गुरुका अपमान करनेवाला पुरुष गुरुजीको मनचाही वस्तु देकर प्रसन्न कर ले तो उस पापसे मुक्त हो जाता है ।। २३ ।।
अवकीर्णिनिमित्तं तु ब्रह्महत्याव्रतं चरेत् ।
गोचर्मवासाः षण्मासांस्तथा मुच्येत किल्बिषात् ।। २४ ।।
जिसका ब्रह्मचर्यव्रत खण्डित हो गया हो, वह ब्रह्मचारी उस दोषकी निवृत्तिके उद्देश्यसे ब्रह्महत्याके लिये बताये हुए व्रतका आचरण करे तथा छः महीनों-तक गोचर्म ओढ़कर रहे; ऐसा करनेपर वह पापसे मुक्त हो सकता है ।। २४ ।।
परदारापहारी तु परस्यापहरन् वसु ।
संवत्सरं व्रती भूत्वा तथा मुच्येत किल्बिषात् ।। २५ ।।
परायी स्त्री तथा पराये धनका अपहरण करनेवाला पुरुष एक वर्षतक कठोर व्रतका पालन करनेपर उस पापसे मुक्त होता है ।। २५ ।।
धनं तु यस्यापहरेत् तस्मै दद्यात् समं वसु ।
विविधेनाभ्युपायेन तदा मुच्येत किल्बिषात् ।। २६ ।।
जिसके धनका अपहरण करे, उसे अनेक उपाय करके उतना ही धन लौटा दे तो उस पापसे छुटकारा मिल सकता है ।। २६ ।।
कृच्छ्राद् द्वादशरात्रेण संयतात्मा व्रते स्थितः ।
परिवेत्ता भवेत् पूतः परिवित्तिस्तथैव च ।। २७ ।।
बड़े भाईके अविवाहित रहते हुए विवाह करनेवाला छोटा भाई और उसका वह बड़ा भाई—ये दोनों मनको संयममें रखते हुए बारह राततक कृच्छ्रव्रतका अनुष्ठान करनेसे शुद्ध हो जाते हैं ।। २७ ।।
निवेश्यं तु पुनस्तेन सदा तारयता पितॄन् ।
न तु स्त्रिया भवेद् दोषो न तु सा तेन लिप्यते ।। २८ ।।
इसके सिवा, बड़े भाईका विवाह होनेके बाद पहलेका ब्याहा हुआ छोटा भाई पितरोंके उद्धारके निमित्त पुनः विवाह-संस्कार करे; ऐसा करनेसे उस स्त्रीके कारण उसे दोष नहीं प्राप्त होता और न वह स्त्री ही उसके दोषसे लिप्त होती है ।। २८ ।।
भोजनं ह्यन्तराशुद्धं चातुर्मास्ये विधीयते ।
स्त्रियस्तेन प्रशुध्यन्ति इति धर्मविदो विदुः ।। २९ ।।
चौमासेमें एक दिनका अन्तर देकर भोजन करनेका विधान है। उसके पालनसे स्त्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं, ऐसा धर्मज्ञ पुरुषोंका कथन है ।। २९ ।।

स्त्रियस्त्वाशङ्किताः पापा नोपगम्या विजानता ।
रजसा ता विशुध्यन्ते भस्मना भाजनं यथा ॥ ३० ॥
यदि अपनी स्त्रीके विषयमें पापाचारकी आशङ्का हो तो विज्ञपुरुषको रजस्वला होनेतक उनके साथ समागम नहीं करना चाहिये। रजस्वला होनेपर वे उसी प्रकार शुद्ध हो जाती हैं, जैसे राखसे माँजा हुआ बर्तन ॥
पादजोच्छिष्टकांस्यं यद् गवा घ्रातमथापि वा ।
गण्डूषोच्छिष्टमपि वा विशुध्येद् दशभिस्तु तत् ॥ ३१ ॥
यदि काँसेका बर्तन शूद्रके द्वारा जूठा कर दिया जाय अथवा उसे गाय सूँघ ले अथवा किसीके भी कुल्ला करनेसे वह जूठा हो जाय तो वह दस वस्तुओंसे शोधन करनेपर शुद्ध होता है* ॥ ३१ ॥
चतुष्पात् सकलो धर्मो ब्राह्मणस्य विधीयते ।
पादावकृष्टो राजन्ये तथा धर्मो विधीयते ॥ ३२ ॥
तथा वैश्ये च शूद्रे च पादः पादो विधीयते ।
ब्राह्मणके लिये चारों पादोंसे युक्त सम्पूर्ण धर्मके पालनका विधान है। तात्पर्य यह कि वह शौचाचार या आत्मशुद्धिके लिये किये जानेवाले प्रायश्चित्तका पूरा-पूरा पालन करे। क्षत्रियके लिये एक पाद कमका विधान है। इसी तरह वैश्यके लिये उसके दो पाद और शूद्रके लिये एक पादके पालनकी विधि है। (उदाहरणके तौरपर जहाँ ब्राह्मणके लिये चार दिन उपवासका विधान हो, वहाँ क्षत्रियके लिये तीन दिन, वैश्यके लिये दो दिन और शूद्रके लिये एक दिनके उपवासका विधान समझना चाहिये) ॥ ३२ १/२ ॥
विद्यादेवंविधेनैषां गुरुलाघवनिश्चयम् ॥ ३३ ॥
तिर्यग्योनिबधं कृत्वा द्रुमांश्छित्त्वेतरान् बहून् ।
त्रिरात्रं वायुभक्षः स्यात् कर्म च प्रथयन्नरः ॥ ३४ ॥
इसी प्रकार इन पापोंके गौरव और लाघवका निश्चय करना चाहिये। पशु-पक्षियोंका वध और दूसरे-दूसरे बहुत-से वृक्षोंका उच्छेद करके पापयुक्त हुआ पुरुष अपनी शुद्धिके लिये तीन दिन, तीन रात केवल हवा पीकर रहे और अपना पापकर्म लोगोंपर प्रकट करता रहे ॥ ३३-३४ ॥
अगम्यागमने राजन् प्रायश्चित्तं विधीयते ।
आर्द्रवस्त्रेण षण्मासान् विहार्यं भस्मशायिना ॥ ३५ ॥
राजन्! जो स्त्री समागम करनेके योग्य नहीं है, उसके साथ समागम कर लेनेपर प्रायश्चित्तका विधान है। उसे छः महीनेतक गीला वस्त्र पहनकर घूमना और राखके ढेरपर सोना चाहिये ॥ ३५ ॥
एष एव तु सर्वेषामकार्याणां विधिर्भवेत् ।

ब्राह्मणोक्तेन विधिना दृष्टान्तागमहेतुभिः ॥ ३६ ॥
जितने न करनेयोग्य पापकर्म हैं, उन सबके लिये यही विधि है। ब्राह्मणग्रन्थोंमें बतायी हुई विधिसे दृष्टान्त बतानेवाले शास्त्रोंकी युक्तियोंसे इसी तरह पापशुद्धिके लिये प्रायश्चित्त करना चाहिये ॥ ३६ ॥

सावित्रीमप्यधीयीत शुचौ देशे मिताशनः ।
अहिंसो मन्दकोऽजल्पो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥ ३७ ॥
जो पवित्र स्थानमें मिताहारी हो हिंसाका सर्वथा त्याग करके राग-द्वेष, मान-अपमान आदिसे शून्य हो मौनभावसे गायत्रीमन्त्रका जप करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३७ ॥

अहःसु सततं तिष्ठेदभ्याकाशं निशां स्वपन् ।
त्रिरह्नि त्रिनिशायां च सवासा जलमाविशेत् ॥ ३८ ॥
स्त्रीशूद्रं पतितं चापि नाभिभाषेद् व्रतान्वितः ।
पापान्यज्ञानतः कृत्वा मुच्येदेवंव्रतो द्विजः ॥ ३९ ॥
मनुष्यको चाहिये कि वह दिनमें खड़ा रहे, रातमें खुले मैदानमें सोये, तीन बार दिनमें और तीन बार रातमें वस्त्रों सहित जलमें घुसकर स्नान करे और इस व्रतका पालन करते समय स्त्री-शूद्र और पतितसे बातचीत न करे, ऐसा नियम लेनेवाला द्विज अज्ञानवश किये हुए सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३८-३९ ॥

शुभाशुभफलं प्रेत्य लभते भूतसाक्षिकम् ।
अतिरिच्येत यो यत्र तत्कर्ता लभते फलम् ॥ ४० ॥
मनुष्य शुभ और अशुभ जो कर्म करता है, उसके पाँच महाभूत साक्षी होते हैं। उन शुभ और अशुभ कर्मोंका फल मृत्युके पश्चात् उसे प्राप्त होता है। उन दोनों प्रकारके कर्मोंमें जो अधिक होता है, उसीका फल कर्ताको प्राप्त होता है ॥ ४० ॥

तस्माद् दानेन तपसा कर्मणा च फलं शुभम् ।
वर्धयेदशुभं कृत्वा यथा स्यादतिरेकवान् ॥ ४१ ॥
इसलिये यदि मनुष्यसे अशुभ कर्म बन जाय तो वह दान, तपस्या और सत्कर्मके द्वारा शुभ फलकी वृद्धि करे, जिससे उसके पास अशुभको दबाकर शुभका ही संग्रह अधिक हो जाय ॥ ४१ ॥

कुर्याच्छुभानि कर्माणि निवर्तेत् पापकर्मणः ।
दद्यान्नित्यं च वित्तानि तथा मुच्येत किल्बिषात् ॥ ४२ ॥
मनुष्यको चाहिये कि वह शुभ कर्मोंका ही अनुष्ठान करे, पापकर्मसे सर्वथा दूर रहे तथा प्रतिदिन (निष्कामभावसे) धनका दान करे; ऐसा करनेसे वह पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ४२ ॥

अनुरूपं हि पापस्य प्रायश्चित्तमुदाहृतम् ।

महापातकवर्जं तु प्रायश्चित्तं विधीयते ॥ ४३ ॥ मैंने तुम्हारे सामने पापके अनुरूप प्रायश्चित्त बतलाया है, परंतु महापातकोंसे भिन्न पापोंके लिये ही ऐसा प्रायश्चित्त किया जाता है ॥ ४३ ॥

भक्ष्याभक्ष्येषु चान्येषु वाच्यावाच्ये तथैव च । अज्ञानज्ञानयो राजन् विहितान्यनुजानतः ॥ ४४ ॥ राजन्! भक्ष्य, अभक्ष्य, वाच्य और अवाच्य तथा जान-बूझकर और बिना जाने किये हुए पापोंके लिये ये प्रायश्चित्त कहे गये हैं। विज्ञ पुरुषको समझकर इनका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ४४ ॥

जानता तु कृतं पापं गुरु सर्वं भवत्युत । अज्ञानात् स्वल्पको दोषः प्रायश्चित्तं विधीयते ॥ ४५ ॥ जान-बूझकर किया हुआ सारा पाप भारी होता है और अनजानमें वैसा पाप बन जानेपर कम दोष लगता है। इस प्रकार भारी और हलके पापके अनुसार ही उसके प्रायश्चित्तका विधान है ॥ ४५ ॥

शक्यते विधिना पापं यथोक्तेन व्यपोहितुम् । आस्तिके श्रद्दधाने च विधिरेष विधीयते ॥ ४६ ॥ शास्त्रोक्त विधिसे प्रायश्चित्त करके सारा पाप दूर किया जा सकता है। परंतु यह विधि आस्तिक और श्रद्धालु पुरुषके लिये ही कही गयी है ॥ ४६ ॥

नास्तिकाश्रद्दधानेषु पुरुषेषु कदाचन । दम्भद्वेषप्रधानेषु विधिरेष न दृश्यते ॥ ४७ ॥ जिनमें दम्भ और द्वेषकी प्रधानता है, उन नास्तिक और श्रद्धाहीन पुरुषोंके लिये कभी ऐसे प्रायश्चित्तका विधान नहीं देखा जाता है ॥ ४७ ॥

शिष्टाचारश्च शिष्टश्च धर्मो धर्मभृतां वर । सेवितव्यो नरव्याघ्र प्रेत्येह च सुखेप्सुना ॥ ४८ ॥ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पुरुषसिंह! जो इहलोक और परलोकमें सुख चाहता हो उसे श्रेष्ठ पुरुषोंके आचार तथा उनके उपदेश किये हुए धर्मका सदा ही सेवन करना चाहिये ॥ ४८ ॥

स राजन् मोक्ष्यसे पापात् तेन पूर्णेन हेतुना । प्राणार्थं वा धनेनैषामथवा नृपकर्मणा ॥ ४९ ॥ नरेश्वर! तुमने तो अपने प्राणोंकी रक्षा, धनकी प्राप्ति अथवा राजोचित कर्तव्यका पालन करनेके लिये ही शत्रुओंका वध किया है; अतः इतना ही पर्याप्त कारण है, जिससे तुम पापमुक्त हो जाओगे ॥ ४९ ॥

अथवा ते घृणा काचित् प्रायश्चित्तं चरिष्यसि । मा त्वेवानार्यजुष्टेन मन्युना निधनं गमः ॥ ५० ॥

अथवा यदि तुम्हारे मनमें उन अतीत घटनाओंके कारण कोई घृणा या ग्लानि हो तो उनके लिये प्रायश्चित्त कर लेना। परंतु इस प्रकार अनार्य पुरुषोंद्वारा सेवित खेद या रोषके वशीभूत होकर आत्महत्या न करो ॥ ५० ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तो भगवता धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
चिन्तयित्वा मुहूर्तेन प्रत्युवाच तपोधनम् ॥ ५१ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भगवान् व्यासके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने दो घड़ीतक कुछ सोच-विचार करके तपोधन व्यासजीसे इस प्रकार कहा ॥ ५१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि प्रायश्चित्तीये पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें प्रायश्चित्तवर्णनके प्रसङ्गमें पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥


१. तीन दिन प्रातःकाल, तीन दिन सायंकाल और तीन दिन बिना माँगे जो मिल जाय वह खा लेना तथा तीन दिन उपवास करना—इस प्रकार बारह दिनका कृच्छ्रव्रत होता है। इसी क्रमसे छः वर्षतक रहनेसे ब्रह्महत्या छूट सकती है। यही क्रम यदि तीन-तीन दिनमें परिवर्तित न होकर सम मासोंमें एक-एक सप्ताहमें और विषम मासोंमें आठ-आठ दिनोंमें बदलते हुए एक-एक मासके कृच्छ्रव्रतके अनुसार चले तो तीन वर्षोंमें शुद्धि हो जायगी और यदि एक मास प्रातःकाल, एक मास सायंकाल और एक मास अयाचित भोजन तथा एक मास उपवास—इस प्रकार चार-चार मासके कृच्छ्रव्रतके अनुसार चले तो एक ही वर्षमें ब्रह्महत्याका पाप छूट सकता है।
२. श्रुति इस प्रकार है—‘सर्वं पाप्मानं तरति तरति ब्रह्महत्यां योऽश्वमेधेन यजते’।
* गायके दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर—इन पाँच गव्य-पदार्थोंसे तथा मिट्टी, जल, राख, खटाई और आग—इन पाँच वस्तुओंसे पात्रको शुद्ध किया जाता है—यही उसका दस वस्तुओंसे शोधन है।