महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयदि व्यभिचारिणी स्त्रीका तिरस्कार किया जाय तो वह दोषकी बात नहीं है। उस तिरस्कारसे स्त्रीकी तो शुद्धि होती है और पति भी दोषका भागी नहीं होता ॥ ३० ॥
तत्त्वं ज्ञात्वा तु सोमस्य विक्रयः स्याददोषवान् ।
असमर्थस्य भृत्यस्य विसर्गः स्याददोषवान् ।
वनदाहो गवामर्थे क्रियमाणो न दूषकः ॥ ३१ ॥
सोमरसके तत्त्वको जानकर यदि उसका विक्रय किया जाय तो बेचनेवाला दोषका भागी नहीं होता। जो सेवक काम करनेमें असमर्थ हो जाय, उसे छोड़ देनेसे भी दोष नहीं लगता। गौओंकी सुविधाके लिये यदि जंगलमें आग लगायी जाय तो उससे पाप नहीं होता है ॥
उक्तान्येतानि कर्माणि यानि कुर्वन्न दुष्यति ।
प्रायश्चित्तानि वक्ष्यामि विस्तरेणैव भारत ॥ ३२ ॥
भरतनन्दन! ये सब तो मैंने वे कर्म बताये हैं, जिन्हें करनेवाला दोषका भागी नहीं होता है। अब मैं विस्तारपूर्वक प्रायश्चित्तोंका वर्णन करूँगा ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि प्रायश्चित्तीये
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें प्रायश्चित्तके प्रकरणमें चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥
* क्योंकि ‘स्वर्णहारी तु कुनखी सुरापः श्यामदन्तकः’ (कर्म-विपाक) इस स्मृतिके अनुसार वे पूर्व जन्ममें क्रमशः सुवर्णकी चोरी करनेवाले और शराबी होते हैं।