भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 238

स्तेयं कुर्वंश्च गुर्वर्थमापत्सु न निषिध्यते । बहुशः कामकारेण न चेद् यः सम्प्रवर्तते ॥ २३ ॥ अन्यत्र ब्राह्मणस्वेभ्य आददानो न दुष्यति । स्वयमप्राशिता यश्च न स पापेन लिप्यते ॥ २४ ॥ (चोरी सर्वथा निषिद्ध है) किंतु आपत्तिकालमें कभी गुरुके लिये चोरी करनेवाला पुरुष दोषका भागी नहीं होता है। यदि मनमें कामना रखकर बारंबार उस चौर्य-कर्ममें वह प्रवृत्त न होता हो तो आपत्तिके समय ब्राह्मणके सिवा किसी दूसरेका धन लेनेवाला मनुष्य पापका भागी नहीं होता है। जो स्वयं उस चोरीका अन्न नहीं खाता, वह भी चौर्यदोषसे लिप्त नहीं होता है ॥

प्राणत्राणेऽनृतं वाच्यमात्मनो वा परस्य च । गुर्वर्थे स्त्रीषु चैव स्याद् विवाहकरणेषु च ॥ २५ ॥ अपने या दूसरेके प्राण बचानेके लिये, गुरुके लिये, एकान्तमें अपनी स्त्रीके पास विनोद करते समय अथवा विवाहके प्रसङ्गमें झूठ बोल दिया जाय तो पाप नहीं लगता है ॥ २५ ॥

नावर्तते व्रतं स्वप्ने शुक्रमोक्षे कथंचन । आज्यहोमः समिद्धेऽग्नौ प्रायश्चित्तं विधीयते ॥ २६ ॥ यदि किसी कारणसे स्वप्नमें वीर्य स्खलित हो जाय तो इससे ब्रह्मचारीके लिये दुबारा व्रत लेने—उपनयन-संस्कार करानेकी आवश्यकता नहीं है। इसके लिये प्रज्वलित अग्निमें घीका हवन करना प्रायश्चित्त बताया गया है ॥ २६ ॥

परिवित्त्यं तु पतिते नास्ति प्रव्रजिते तथा । भिक्षिते पारदार्यं च तद् धर्मस्य न दूषकम् ॥ २७ ॥ यदि बड़ा भाई पतित हो जाय या संन्यास ले ले तो उसके अविवाहित रहते हुए भी छोटे भाईका विवाह कर लेना दोषकी बात नहीं है। संतान-प्राप्तिके लिये स्त्रीद्वारा प्रार्थना करनेपर यदि कभी परस्त्रीसंगम किया जाय तो वह धर्मका लोप करनेवाला नहीं होता है ॥

वृथा पशुसमालम्भं नैव कुर्यान्न कारयेत् । अनुग्रहः पशूनां हि संस्कारो विधिनोदितः ॥ २८ ॥ मनुष्यको चाहिये कि वह व्यर्थ ही पशुओंका वध न तो करे और न करावे। विधिपूर्वक किया हुआ पशुओंका संस्कार उनपर अनुग्रह है ॥ २८ ॥

अनर्हे ब्राह्मणे दत्तमज्ञानात् तन्न दूषकम् । सत्काराणां तथा तीर्थे नित्यं वाप्रतिपादनम् ॥ २९ ॥ यदि अनजानमें किसी अयोग्य ब्राह्मणको दान दे दिया जाय अथवा योग्य ब्राह्मणको सत्कारपूर्वक दान न दिया जा सके तो वह दोषकारक नहीं होता ॥ २९ ॥

स्त्रियास्तथापचारिण्या निष्कृतिः स्याददूषिका । अपि सा पूयते तेन न तु भर्ता प्रदुष्यति ॥ ३० ॥