भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 2182, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2182

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तविंशत्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः

शुकदेवजीका पिताके पास लौट आना तथा व्यासजीका अपने शिष्योंको स्वाध्यायकी विधि बताना

भीष्म उवाच

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं कृतात्मा कृतनिश्चयः ।
आत्मनाऽऽत्मानमास्थाय दृष्ट् चात्मानमात्मना ॥ १ ॥
कृतकार्यः सुखी शान्तस्तूष्णीं प्रायादुदङ्मुखः ।
शैशिरं गिरिमुद्दिश्य सधर्मा मातरिश्वनः ॥ २ ॥

भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! राजा जनककी यह बात सुनकर विशुद्ध अन्तःकरणवाले शुकदेवजी एक दृढ़ निश्चयपर पहुँच गये और बुद्धिके द्वारा आत्मामें स्थित होकर स्वयं अपने आत्मस्वरूपका साक्षात्कार करके कृतार्थ हो गये। एवं आनन्दमग्न हो, बड़ी शान्तिका अनुभव करते हुए हिमालयपर्वतको लक्ष्य करके वायुके समान वेगसे चुपचाप उत्तर दिशाकी ओर चल दिये ॥ १-२ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु देवर्षिर्नारदस्तथा ।
हिमवन्तमियाद् द्रष्टुं सिद्धचारणसेवितम् ॥ ३ ॥

इसी समय देवर्षि नारद सिद्धों और चारणोंसे सेवित हिमालय पर्वतपर उसका दर्शन करनेके लिये आये ॥ ३ ॥

तमप्सरोगणाकीर्णं शान्तस्वननिनादितम् ।
किन्नराणां सहस्रैश्च भृङ्गजैस्तथैव च ॥ ४ ॥
मद्गुभिः खञ्जरीटैश्च विचित्रैर्जीवजीवकैः ॥ ५ ॥
चित्रवर्णैर्मयूरैश्च केकाशतविराजितैः ।
राजहंससमूहैश्च कृष्णैः परभृतैस्तथा ॥ ६ ॥

उस पर्वतपर सब ओर अप्सराएँ विचर रही थीं। चारों ओर विविध प्राणियोंकी शान्तिमयी ध्वनिसे वहाँका सारा प्रान्त व्याप्त हो रहा था। सहस्रों किन्नर, भ्रमर, मद्गु, विचित्र खंजरीट, चकोर, सैकड़ों मधुर वाणीसे सुशोभित विचित्र वर्णवाले मयूर, राजहंसोंके समुदाय तथा काले कोकिल वहाँ अपनी शान्त मधुर ध्वनि फैला रहे थे ॥ ४-६ ॥

पक्षिराजो गरुत्मांश्च यं नित्यमधितिष्ठति ।
चत्वारो लोकपालाश्च देवाः सर्षिगणास्तथा ॥ ७ ॥
तत्र नित्यं समायान्ति लोकस्य हितकाम्यया ।