भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2183

पक्षिराज गरुड उस पर्वतपर नित्य विराजमान होते हैं। चारों लोकपाल, देवता तथा ऋषिगण सम्पूर्ण जगत्‌के हितकी कामनासे वहाँ सदा आते रहते हैं।। ७ १/२ ।।
विष्णुना यत्र पुत्रार्थे तपस्तप्तं महात्मना ।। ८ ।।
तत्रैव च कुमारेण बाल्ये क्षिप्ता दिवौकसः ।
शक्तिर्न्यस्ता क्षितितले त्रैलोक्यमवमन्य वै ।। ९ ।।
वहीं महात्मा श्रीविष्णु (श्रीकृष्ण) ने पुत्रके लिये तप किया था। वहीं कुमार कार्तिकेयने बाल्यावस्थामें देवताओंपर आक्षेप किया था और त्रिलोकीका अपमान करके पृथ्वीमें अपनी शक्ति गाड़ दी थी ।। ८-९ ।।
तत्रोवाच जगत् स्कन्दः क्षिपन् वाक्यमिदं तदा ।
योऽन्योऽस्ति मत्तोऽभ्यधिको विप्रा यस्याधिकं प्रियाः ।। १० ।।
यो ब्रह्मण्यो द्वितीयोऽस्ति त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् ।
सोऽभ्युद्धरत् त्विमां शक्तिमथवा कम्पयत्विति ।। ११ ।।
उस समय वहाँ स्कन्दने सम्पूर्ण जगत्‌पर आक्षेप करते हुए यह बात कही थी-‘जो कोई भी दूसरा पुरुष मुझसे अधिक बलवान् हो, जिसे ब्राह्मण अधिक प्रिय हों, जो दूसरा व्यक्ति मुझसे भी अधिक ब्राह्मणभक्त तथा तीनों लोकोंमें पराक्रमशाली हो, वह इस शक्तिको उखाड़ दे अथवा हिला दे’ ।। १०-११ ।।
तच्छ्रुत्वा व्यथिता लोकाः क इमामुद्धरेदिति ।
अथ देवगणं सर्वं सम्भ्रान्तेन्द्रियमानसम् ।। १२ ।।
अपश्यद् भगवान् विष्णुः क्षिप्तं सासुरराक्षसम् ।
किं त्वत्र सुकृतं कार्यं भवेदिति विचिन्तयन् ।। १३ ।।
उनकी यह तिरस्कारपूर्ण घोषणा सुनकर सब लोग व्यथित हो उठे और मन-ही-मन सोचने लगे, ‘भला, कौन वीर इस शक्तिको उखाड़ सकता है?’ उस समय भगवान् विष्णुने देखा कि सम्पूर्ण देवताओंकी इन्द्रियाँ और चित्त भयसे व्याकुल हैं तथा असुर और राक्षसों-सहित सम्पूर्ण जगत्‌पर स्कन्दद्वारा आक्षेप किया गया है। यह देखकर वे सोचने लगे कि यहाँ क्या करना अच्छा होगा? ।। १२-१३ ।।
अनामृष्य ततः क्षेपमवैक्षत च पावकिम् ।
सम्प्रगृह्य विशुद्धात्मा शक्तिं प्रज्वलितां तदा ।। १४ ।।
कम्पयामास सव्येन पाणिना पुरुषोत्तमः ।
तब उस आक्षेपको सहन न करके विशुद्धात्मा भगवान् विष्णुने अग्निकुमार स्कन्दकी ओर देखा। फिर उन पुरुषोत्तमने उस समय उस प्रज्वलित शक्तिको बायें हाथसे पकड़कर हिला दिया ।। १४ १/२ ।।
शक्त्यां तु कम्प्यमानायां विष्णुना बलिना तदा ।। १५ ।।
मेदिनी कम्पिता सर्वा सशैलवनकानना ।