महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबलवान् भगवान् विष्णुके द्वारा उस शक्तिके कम्पित किये जानेपर पर्वत, वन और काननोंसहित सारी पृथ्वी काँप उठी ।। १५ १/२ ।। शक्तेनापि समुद्धर्तुं कम्पिता साभवत् तदा ।। १६ ।। रक्षिता स्कन्दराजस्य धर्षणा प्रभविष्णुना । यद्यपि प्रभावशाली भगवान् विष्णु उसे उखाड़ फेंकनेमें समर्थ थे तो भी उन्होंने कुमार स्कन्दका तिरस्कार नहीं होने दिया। उन्हें अपमानसे बचा लिया ।। १६ १/२ ।। तां कम्पयित्वा भगवान् प्रह्लादमिदमब्रवीत् ।। १७ ।। पश्य वीर्यं कुमारस्य नैतदन्यः करिष्यति । उस शक्तिको हिलाकर भगवान्ने प्रह्लादसे कहा—'देखो, कुमारमें कितना बल है? यह कार्य दूसरा कोई नहीं कर सकेगा' ।। १७ १/२ ।। सोऽमृष्यमाणस्तद्वाक्यं समुद्धरणनिश्चितः ।। १८ ।। जग्राह तां तदा शक्तिं न चैनां स व्यकम्पयत् । भगवान्के इस कथनको सहन न कर सकनेके कारण प्रह्लादने स्वयं ही उस शक्तिको उखाड़ फेंकनेका दृढ़ निश्चय कर लिया और उस शक्तिको पकड़कर खींचा; परंतु वे उसे हिला भी न सके ।। १८ १/२ ।। नादं महान्तं मुक्त्वा स मूर्च्छितो गिरिमूर्धनि ।। १९ ।। विह्वलः प्रापतद् भूमौ हिरण्यकशिपोः सुतः । हिरण्यकशिपुकुमार प्रह्लाद बड़े जोरसे चिग्घाड़कर मूर्च्छित एवं व्याकुल हो उस पर्वतशिखरकी भूमिपर गिर पड़े ।। १९ १/२ ।। तत्रोत्तरां दिशं गत्वा शैलराजस्य पार्श्वतः ।। २० ।। तपोऽतप्यत दुर्धर्षं तात नित्यं वृषध्वजः । तात! उसी गिरिराज हिमालयके पार्श्वभागमें उत्तर दिशाकी ओर जाकर भगवान् वृषध्वज शिवने नित्य-निरन्तर दुर्धर्ष तपस्या की है ।। २० १/२ ।। पावकेन परिक्षिप्तं दीप्यता यस्य चाश्रमम् ।। २१ ।। आदित्यपर्वतं नाम दुर्धर्षमकृतात्मभिः । न तत्र शक्यते गन्तुं यक्षराक्षसदानवैः ।। २२ ।। भगवान् शंकरके उस आश्रमको प्रज्वलित अग्निने चारों ओरसे घेर रक्खा है। उस पर्वतशिखरका नाम आदित्यगिरि है, जिसपर अजितात्मा पुरुष नहीं चढ़ सकते। यक्ष, राक्षस और दानवोंके लिये वहाँ पहुँचना सर्वथा असम्भव है ।। २१-२२ ।। दशयोजनविस्तारमग्निज्वालासमावृतम् । भगवान् पावकस्तत्र स्वयं तिष्ठति वीर्यवान् ।। २३ ।।