महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2185, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह दस योजन विस्तृत शिखर आगकी लपटोंसे घिरा हुआ है। शक्तिशाली भगवान् अग्निदेव वहाँ स्वयं विराजमान हैं ॥ २३ ॥ सर्वान् विघ्नान् प्रशमयन् महादेवस्य धीमतः । दिव्यं वर्षसहस्रं हि पादेनैकेन तिष्ठतः ॥ २४ ॥ देवान् संतापयँस्तत्र महादेवो महाव्रतः । परम बुद्धिमान् महादेवजी सहस्र दिव्य वर्षोंतक वहाँ एक पैरसे खड़े रहे और उनकी तपस्याके सम्पूर्ण विघ्नोंका निवारण करते हुए अग्निदेव वहीं विराजमान थे। महान् व्रतधारी महादेवजी वहाँ देवताओंको संतप्त करते हुए महान् तपमें प्रवृत्त थे ॥ २४ १/२ ॥ ऐन्द्रीं तु दिशमास्थाय शैलराजस्य धीमतः ॥ २५ ॥ विविक्ते पर्वततटे पाराशर्यो महातपाः । वेदानध्यापयामास व्यासः शिष्यान् महामतिः ॥ २६ ॥ सुमन्तुं च महाभागं वैशम्पायनमेव च । जैमिनिं च महाप्राज्ञं पैलं चापि तपस्विनम् ॥ २७ ॥ उसी बुद्धिमान् गिरिराज हिमवान्की पूर्व दिशाका आश्रय लेकर पर्वतके एकान्त तटप्रान्तमें महातपस्वी महाबुद्धिमान् पराशरनन्दन व्यास अपने शिष्य महाभाग सुमन्तु, महाबुद्धिमान् जैमिनि, तपस्वी पैल तथा वैशम्पायन-इन चार शिष्योंको वेद पढ़ा रहे थे ॥ २५-२७ ॥ यत्र शिष्यैः परिवृतो व्यास आस्ते महातपाः । तत्राश्रमपदं रम्यं ददर्श पितुरुत्तमम् ॥ २८ ॥ जहाँ महातपस्वी व्यास अपने शिष्योंसे घिरे हुए बैठे थे, वहाँ शुकदेवजीने अपने पिताके उस रमणीय एवं उत्तम आश्रमको देखा ॥ २८ ॥ आरणेयो विशुद्धात्मा नभसीव दिवाकरः । अथ व्यासः परिक्षिप्तं ज्वलन्तमिव पावकम् ॥ २९ ॥ ददृशे सुतमायान्तं दिवाकरसमप्रभम् । उस समय विशुद्ध अन्तःकरणवाले अरणीनन्दन शुकदेव आकाशमें स्थित सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे, इतनेहीमें व्यासजीने भी प्रज्वलित अग्नि तथा सूर्यके समान तेजस्वी पुत्रको सब ओर अपनी प्रभा बिखेरते हुए आते देखा ॥ २९ १/२ ॥ असज्जमानं वृक्षेषु शैलेषु विषयेषु च । योगयुक्तं महात्मानं यथा बाणं गुणच्युतम् ॥ ३० ॥ योगयुक्त महात्मा शुकदेव धनुषकी डोरीसे छूटे हुए बाणके समान तीव्र गतिसे आ रहे थे। वे वृक्षों और पर्वतोंमें कहीं भी अटक नहीं पाते थे ॥ ३० ॥ सोऽभिगम्य पितुः पादावगृह्णादरणीसुतः । यथोपजोषं तैश्चापि समागच्छन्महामुनिः ॥ ३१ ॥