भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2186

निकट आकर अरणीपुत्र महामुनि शुकदेवने पिताके दोनों पैर पकड़ लिये और शान्तभावसे उनके अन्य सब शिष्योंके साथ भी मिले ।। ३१ ।। ततो निवेदयामास पित्रे सर्वमशेषतः । शुको जनकराजेन संवादं प्रीतमानसः ॥ ३२ ॥ तदनन्तर प्रसन्नचित्त हुए शुकने राजा जनकके साथ जो वार्तालाप हुआ था, वह सारा-का-सारा वृत्तान्त अपने पितासे कह सुनाया ।। ३२ ।। एवमध्यापयन् शिष्यान् व्यासः पुत्रं च वीर्यवान् । उवास हिमवत्पृष्ठे पाराशर्यो महामुनिः ॥ ३३ ॥ इस प्रकार शक्तिशाली महामुनि पराशरनन्दन व्यास अपने शिष्यों और पुत्रको पढ़ाते हुए हिमालयके शिखरपर ही रहने लगे ।। ३३ ।। ततः कदाचिच्छिष्यास्तं परिवार्यावतस्थिरे । वेदाध्ययनसम्पन्नाः शान्तात्मानो जितेन्द्रियाः ॥ ३४ ॥ वेदेषु निष्ठां सम्प्राप्य साङ्गेष्वपि तपस्विनः । अथोचुस्ते तदा व्यासं शिष्याः प्राञ्जलयो गुरुम् ॥ ३५ ॥ तदनन्तर किसी समय वेदाध्ययनसे सम्पन्न, शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, सांगवेदमें पारंगत और तपस्वी शिष्यगण गुरुवर व्यासजीको चारों ओरसे घेरकर बैठ गये और उनसे हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले ।। ३४-३५ ।।

शिष्या ऊचुः महता तेजसा युक्ता यशसा चापि वर्धिताः । एकं त्विदानीमिच्छामो गुरुणाग्रहं कृतम् ॥ ३६ ॥ शिष्योंने कहा— गुरुदेव! हम आपकी कृपासे महान् तेजस्वी हो गये हैं। हमारा यश भी चारों ओर बढ़ गया है। अब इस समय हम यह चाहते हैं कि आप एक बार और हमलोगोंपर अनुग्रह करें ।। ३६ ।। इति तेषां वचः श्रुत्वा ब्रह्मर्षिस्तानुवाच ह । उच्यतामिति तद् वत्सा यद् वः कार्यं प्रियं मया ॥ ३७ ॥ शिष्योंकी यह बात सुनकर ब्रह्मर्षि व्यासने उनसे कहा—'बच्चो! कहो, क्या चाहते हो? मुझे तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करना है?' ।। ३७ ।। एतद् वाक्यं गुरोः श्रुत्वा शिष्यास्ते हृष्टमानसाः । पुनः प्राञ्जलयो भूत्वा प्रणम्य शिरसा गुरुम् ॥ ३८ ॥ ऊचुस्ते सहिता राजन्निदं वचनमुत्तमम् । यदि प्रीत उपाध्यायो धन्याः स्मो मुनिसत्तम ॥ ३९ ॥