महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2241, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मा, रुद्र, मनु, दक्ष, भृगु, धर्म, तप, यम, मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, परमेष्ठी, सूर्य, चन्द्रमा, कर्दम, क्रोध, और विक्रीत—ये इक्कीस प्रजापति उसी परमात्मासे उत्पन्न बताये गये हैं तथा उसी परमात्माकी सनातन धर्म-मर्यादाका पालन एवं पूजन करते हैं ।। ३५-३७ ।।
दैवं पित्र्यं च सततं तस्य विज्ञाय तत्त्वतः । आत्मप्राप्तानि च ततः प्राप्नुवन्ति द्विजोत्तमाः ॥ ३८ ॥ श्रेष्ठ द्विज उसीके उद्देश्यसे किये जानेवाले देवता तथा पितृ-सम्बन्धी कार्योंको ठीक-ठीक जानकर अपनी अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेते हैं ।। ३८ ।।
स्वर्गस्था अपि ये केचित् तान् नमस्यन्ति देहिनः । ते तत्प्रसादाद् गच्छन्ति तेनादिष्ट फलां गतिम् ॥ ३९ ॥ स्वर्गमें रहनेवाले प्राणियोंमेंसे भी जो कोई उस परमात्माको प्रणाम करते हैं, वे उसके कृपा-प्रसादसे उसीकी आज्ञाके अनुसार फल देनेवाली उत्तम गतिको प्राप्त करते हैं ।। ३९ ।।
ये हीनाः सप्तदशभिर्गुणैः कर्मभिरेव च । कलाः पञ्चदश त्यक्ता ते मुक्ता इति निश्चयः ॥ ४० ॥ जो पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण तथा मन और बुद्धिरूप सत्रह गुणोंसे, सब कर्मोंसे रहित हो पंद्रह कलाओंको त्याग करके स्थित हैं, वे ही मुक्त हैं, यह शास्त्रका सिद्धान्त है ।। ४० ।।
मुक्तानां तु गतिर्ब्रह्मन् क्षेत्रज्ञ इति कल्पिता । स हि सर्वगुणैश्चैव निर्गुणश्चैव कथ्यते ॥ ४१ ॥ ब्रह्मन्! मुक्त पुरुषोंकी गति क्षेत्रज्ञ परमात्मा निश्चित किया गया है। वही सर्वसद्गुणसम्पन्न तथा निर्गुण भी कहलाता है ।। ४१ ।।
दृश्यते ज्ञानयोगेन आवां च प्रसूतौ ततः । एवं ज्ञात्वा तमात्मानं पूजयावः सनातनम् ॥ ४२ ॥ ज्ञानयोगके द्वारा उसका साक्षात्कार होता है। हम दोनोंका आविर्भाव उसीसे हुआ है—ऐसा जानकर हम दोनों उस सनातन परमात्माकी पूजा करते हैं ।। ४२ ।।
तं वेदाश्चाश्रमाश्चैव नानामतसमाश्रिताः । भक्त्या सम्पूजयन्त्याशु गतिं चैषां ददाति सः ॥ ४३ ॥ चारों वेद, चारों आश्रम तथा नाना प्रकारके मतोंका आश्रय लेनेवाले लोग भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करते हैं और वह इन सबको शीघ्र ही उत्तम गति प्रदान करता है ।। ४३ ।।
ये तु तद्भाविता लोके ह्येकान्तित्वं समास्थिताः । एतदभ्यधिकं तेषां यत् ते तं प्रविशन्त्युत ॥ ४४ ॥