महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘मुनियो! वे श्वेतद्वीपके निवासी मेरे एकान्त भक्त हैं, तुम वहीं जाओ। वहाँ मेरे स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन होता है’ ॥ ३० ॥ अथ श्रुत्वा वयं सर्वे वाचं तामशरीरिणीम् । यथाख्यातेन मार्गेण तं देशं प्रतिपेदिरे ॥ ३१ ॥ ‘इस आकाशवाणीको सुनकर हमलोग उसके बताये हुए मार्गसे उस स्थानको गये ॥ ३१ ॥ प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं तच्चित्तास्तद्दिदृक्षवः । ततोऽस्मद्दृष्टिविषयस्तदा प्रतिहतोऽभवत् ॥ ३२ ॥ ‘श्वेत नामक महाद्वीपमें पहुँचकर हमारा चित्त भगवान्में ही लगा रहा। हम उनके दर्शनकी इच्छासे उत्कण्ठित हो रहे थे। वहाँ जाते ही हमारी दृष्टिशक्ति प्रतिहत हो गयी ॥ ३२ ॥ न च पश्याम पुरुषं तत्तेजोहृतदर्शनाः । ततो नः प्रादुरभवद् विज्ञानं दैवयोगजम् ॥ ३३ ॥ न किलातप्ततपसा शक्यते द्रष्टुमञ्जसा । ‘वहाँके निवासियोंके तेजसे आँखें चौंधिया जानेके कारण हम वहाँ किसी पुरुषको देख नहीं पाते थे। तदनन्तर दैवयोगसे हमारे हृदयमें यह ज्ञान प्रकट हुआ कि तपस्या किये बिना हमलोग भगवान्को सुगमतापूर्वक नहीं देख सकते ॥ ३३ १/२ ॥ ततः पुनर्वर्षशतं तप्त्वा तात्कालिकं महत् ॥ ३४ ॥ व्रतावसाने च शुभान् नरान् ददृशिरे वयम् । श्वेतांश्चन्द्रप्रतीकाशान् सर्वलक्षणलक्षितान् ॥ ३५ ॥ ‘तदनन्तर हमने तत्काल पुनः सौ वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। उस तपोमय व्रतके पूर्ण होनेपर हमलोगोंको वहाँके शुभलक्षण पुरुषोंका दर्शन हुआ, जो चन्द्रमाके समान गौरवर्ण और सब प्रकारके उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थे ॥ ३४-३५ ॥ नित्याञ्जलिकृतान् ब्रह्म जपतः प्रागुदङ्मुखान् । मानसो नाम स जपो जप्यते तैर्महात्मभिः ॥ ३६ ॥ ‘वे प्रतिदिन ईशानकोणकी ओर मुँह करके हाथ जोड़े हुए ब्रह्मका मानसजप करते थे ॥ ३६ ॥ तेनैकाग्रमनस्त्वेन प्रीतो भवति वै हरिः । याऽभवन्मुनिशार्दूल भाः सूर्यस्य युगक्षये ॥ ३७ ॥ एकैकस्य प्रभा तादृक् साभवन्मानवस्य ह । ‘उनके मनकी इस एकाग्रतासे भगवान् श्रीहरि प्रसन्न होते थे। मुनिश्रेष्ठ! प्रलयकालमें सूर्यकी जैसी प्रभा होती है, वैसी ही उस द्वीपमें रहनेवाले प्रत्येक पुरुषकी थी ॥ तेजोनिवासः स द्वीप इति वै मेनिरे वयम् ॥ ३८ ॥