महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन तत्राभ्यधिकः कश्चित् सर्वे ते समतेजसः । ‘हमलोगोंने तो यही समझा कि यह द्वीप तेजका ही निवासस्थान है। वहाँ कोई किसीसे बढ़कर नहीं था। सबका तेज समान था ।। ३८ १/२ ।।
अथ सूर्यसहस्रस्य प्रभां युगपदुत्थिताम् ।। ३९ ।। सहसा दृष्टवन्तः स्म पुनरेव बृहस्पते । ‘बृहस्पते! थोड़ी ही देरमें हमारे सामने एक ही साथ हजारों सूर्योंके समान प्रभा प्रकट हुई। हमारी दृष्टि सहसा उस ओर खिंच गयी ।। ३९ १/२ ।।
सहिताश्चाभ्यधावन्त ततस्ते मानवा द्रुतम् ।। ४० ।। कृताञ्जलिपुटा हृष्टा नम इत्येव वादिनः । ‘तदनन्तर वहाँके निवासी पुरुष बड़ी प्रसन्नताके साथ दोनों हाथ जोड़े ‘नमो नमः’ कहते हुए एक ही साथ तीव्र गतिसे उस तेजकी ओर दौड़े ।। ४० १/२ ।।
ततो हि वदतां तेषामश्रौष्म विपुलं ध्वनिम् ।। ४१ ।। बलिः किलोपह्रियते तस्य देवस्य तैनरैः । ‘इसके बाद जब वे स्तुति करने लगे, तब उनकी तुमुल ध्वनि हमारे कानोंमें पड़ी। वे सब लोग उन तेजोमय भगवान्को पूजाकी सामग्री अर्पण कर रहे थे ।।
वयं तु तेजसा तस्य सहसा हृतचेतसः ।। ४२ ।। न किंचिदपि पश्यामो हतचक्षुर्बलेन्द्रियाः । ‘भगवान्के उस अनिर्वचनीय तेजने हमारे चित्तको सहसा खींच लिया था; परंतु हमारे नेत्र, बल और इन्द्रियाँ प्रतिहत हो गयी थीं, इसलिये हम स्पष्ट रूपसे कुछ देख नहीं पाते थे ।। ४२ १/२ ।।
एकस्तु शब्दो विततः श्रुतोऽस्माभिरुदीरितः ।। ४३ ।। जितं ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुषपूर्वज ।। ४४ ।। ‘परंतु एक शब्द जो उच्चस्वरसे उच्चारित होकर दूरतक फैल रहा था, हमने भी सुना। सब लोग कह रहे थे—‘पुण्डरीकाक्ष! आपकी जय हो। विश्वभावन! आपको प्रणाम है। महापुरुषोंके भी पूर्वज हृषीकेश! आपको नमस्कार है’ ।। ४३-४४ ।।
इति शब्दः श्रुतोऽस्माभिः शिक्षाक्षरसमन्वितः । एतस्मिन्नन्तरे वायुः सर्वगन्धवहः शुचिः ।। ४५ ।। दिव्यान्युवाह पुष्पाणि कर्मण्यांश्चौषधीस्तथा । तैरिष्टः पञ्चकालज्ञैर्हरिरेकान्तिभिर्नरैः ।। ४६ ।। भक्त्या परमया युक्तैर्मनोवाक्कर्मभिस्तदा ।