भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2258

'शिक्षा और अक्षरसे युक्त यह वाक्य हमलोगोंको श्रवणगोचर हुआ। इतनेहीमें पवित्र और सुगन्धित वायु बहुत-से दिव्य पुष्प और कार्योपयोगी ओषधियाँ ले आयी, जिनसे वहाँके पंचकालवेत्ता अनन्य भक्तों ने बड़ी भक्तिके साथ मन, वाणी और क्रियाद्वारा उन श्रीहरिका पूजन किया ।। ४५-४६ १/२ ।।
नूनं तत्रागतो देवो यथा तैर्वागुदीरिता ।। ४७ ।।
वयं त्वेनं न पश्यामो मोहितास्तस्य मायया ।
'जैसी बातचीत उन्होंने की थी, उससे हमें विश्वास हो गया था कि निश्चय ही यहाँ भगवान् पधारे हुए हैं, परंतु उन्हींकी मायासे मोहित होनेके कारण हम उन्हें देख नहीं पाते थे ।। ४७ १/२ ।।
मारुते संनिवृत्ते च बलौ च प्रतिपादिते ।। ४८ ।।
चिन्ताव्याकुलितात्मानो जाताः स्मोऽङ्गिरसां वर ।
'बृहस्पते! जब उस सुगन्धित वायुका चलना बंद हो गया और भगवान्‌को बलिसमर्पणका कार्य पूर्ण हो गया तब हमलोग मन-ही-मन चिन्तासे व्याकुल हो उठे ।।
मानवानां सहस्रेषु तेषु वै शुद्धयोनिषु ।। ४९ ।।
अस्मान् कश्चिन्मनसा चक्षुषा वाप्यपूजयत् ।
'वहाँ शुद्ध कुलवाले सहस्रों पुरुष थे; परंतु उनमेंसे किसीने मनसे अथवा दृष्टिपातद्वारा भी हमलोगोंका सत्कार नहीं किया ।। ४९ १/२ ।।
तेऽपि स्वस्था मुनिगणा एकभावमनुव्रताः ।। ५० ।।
नास्मासु दधिरे भावं ब्रह्मभावमनुष्ठिताः ।
वहाँ जो स्वस्थ मुनिगण थे, वे भी अनन्य भावसे भगवान्‌के भजनमें ही मन लगाये रहते थे। उन ब्रह्मभावमें स्थित मुनियोंने हमलोगोंकी ओर ध्यान नहीं दिया ।। ५० १/२ ।।
ततोऽस्मान् सुपरिश्रान्तांस्तपसा चातिकर्शितान् ।। ५१ ।।
उवाच स्वस्थं किमपि भूतं तत्राशरीरकम् ।
'हमलोग तपस्यासे थककर अत्यन्त दुर्बल हो गये थे। उस समय हमलोगोंसे किसी शरीररहित स्वस्थ प्राणी (देवता) ने कहा ।। ५१ १/२ ।।

देव उवाच

दृष्टा वः पुरुषाः श्वेताः सर्वेन्द्रियविवर्जिताः ।। ५२ ।।
दृष्टो भवति देवेश एभिर्दृष्टैर्द्विजोत्तमैः ।
देवता बोले— मुनिवरो! तुमलोगोंने श्वेतद्वीपनिवासी श्वेतकाय इन्द्रियरहित पुरुषोंका दर्शन किया। इन श्रेष्ठ द्विजोंके दर्शन होनेसे साक्षात् देवेश्वर भगवान्‌का ही दर्शन हो जाता है ।। ५२ १/२ ।।
गच्छध्वं मुनयः सर्वे यथागतमितोऽचिरात् ।। ५३ ।।