महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन स शक्यस्त्वभक्तेन द्रष्टुं देवः कथंचन ।
मुनियो! तुम सब लोग जैसे आये हो, वैसे ही शीघ्र लौट जाओ। भगवान्में अनन्य भक्ति हुए बिना किसीको किसी तरह भी उनका साक्षात् दर्शन नहीं हो सकता ।।
कामं कालेन महता एकान्तित्वमुपागतैः ।। ५४ ।।
शक्यो द्रष्टुं स भगवान् प्रभामण्डलदुर्द्दशः ।
हाँ, बहुत समयतक उनकी भक्ति करते-करते जब पूरी अनन्यता आ जायगी, तब ज्योतिःपुंजके कारण कठिनाईसे देखे जानेवाले भगवान्का दर्शन सम्भव हो सकता है ।। ५४ १/२ ।।
महत् कार्यं च कर्तव्यं युष्माभिर्द्विजसत्तमाः ।। ५५ ।।
इतः कृतयुगेऽतीते विपर्यासं गतेऽपि च ।
वैवस्वतेऽन्तरे विप्राः प्राप्ते त्रेतायुगे पुनः ।। ५६ ।।
सुराणां कार्यसिद्धयर्थं सहाया वै भविष्यथ ।
विप्रवरो! इस समय तुम्हें अभी बहुत बड़ा काम करना है। इस सत्ययुगके बीतनेपर जब धर्ममें किंचित् व्यतिक्रम आ जायगा और वैवस्वत मन्वन्तरके त्रेतायुगका आरम्भ होगा, उस समय देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये तुमलोग ही सहायक होगे ।। ५५-५६ १/२ ।।
ततस्तदद्भुतं वाक्यं निशम्यैवामृतोपमम् ।। ५७ ।।
तस्य प्रसादात् प्राप्ताः स्मो देशमीप्सितमञ्जसा ।
‘यह अमृतके समान मधुर एवं अद्भुत वचन सुनकर हमलोग भगवान्की कृपासे अनायास ही अपने अभीष्ट स्थानपर आ पहुँचे ।। ५७ १/२ ।।
एवं सुतपसा चैव हव्यकव्यैस्तथैव च ।। ५८ ।।
देवोऽस्माभिर्न दृष्टः स कथं त्वं द्रष्टुमर्हसि ।
‘बृहस्पते! इस प्रकार हमने बड़ी भारी तपस्या की, हव्य-कव्योंके द्वारा भगवान्का पूजन भी किया, तो भी हमें उनका दर्शन न हो सका। फिर तुम कैसे अनायास ही उनका दर्शन पा लोगे? ।। ५८ १/२ ।।
नारायणो महद्भूतं विश्वसृग्हव्यकव्यभुक् ।। ५९ ।।
अनादिनिधनोऽव्यक्तो देवदानवपूजितः ।
‘भगवान् नारायण सबसे महान् देवता हैं। वे ही संसारके स्रष्टा और हव्य-कव्यके भोक्ता हैं। उनका आदि और अन्त नहीं है। उन अव्यक्त परमेश्वरकी देवता और दानव भी पूजा करते हैं’ ।। ५९ १/२ ।।
एवमेकतवाक्येन द्वितत्रितमतेन च ।। ६० ।।
अनुनीतः सदस्यैश्च बृहस्पतिरुदारधीः ।
समापयत् ततो यज्ञं दैवतं समपूजयत् ।। ६१ ।।