महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2366, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
हयग्रीव-अवतारकी कथा, वेदोंका उद्धार, मधुकैटभका वध तथा नारायणकी महिमाका वर्णन
शौनक उवाच
श्रुतं भगवतस्तस्य माहात्म्यं परमात्मनः ।
जन्म धर्मगृहे चैव नरनारायणात्मकम् ॥ १ ॥
शौनकने कहा— सूतनन्दन! हमलोगोंने षड्विधि ऐश्वर्यसे सम्पन्न उन परमात्मा श्रीहरिका माहात्म्य सुना और धर्मके घरमें उन्होंने ही नर-नारायणरूपसे जन्म ग्रहण किया था, इस बातको भी जान लिया ॥ १ ॥
महावराहसृष्टा च पिण्डोत्पत्तिः पुरातनी ।
प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च यो यथा परिकल्पितः ॥ २ ॥
तथा च नः श्रुतो ब्रह्मन् कथ्यमानस्त्वयानघ ।
निष्पाप सूतपुत्र! भगवान् महावराहने जो प्राचीन कालमें पिण्डोंकी उत्पत्ति करके पिण्डदानकी मर्यादा चलायी तथा प्रवृत्ति और निवृत्तिके विषयमें जिस विधिकी जैसी कल्पना की, वह सब आपके मुखसे हमलोगोंने सुना ॥ २ ½ ॥
हव्यकव्यभुजो विष्णुरुदक्पूर्वे महोदधौ ॥ ३ ॥
यच्च तत् कथितं पूर्वं त्वया हयशिरो महत् ।
तच्च दृष्टं भगवता ब्रह्मणा परमेष्ठिना ॥ ४ ॥
समुद्रके उत्तर-पूर्वभागमें हव्य और कव्यका भोग ग्रहण करनेवाले भगवान् विष्णुने महान् हयग्रीवावतार धारण किया था, यह बात आपने पहले मुझसे कही थी। साथ ही यह भी बतायी थी कि भगवान् परमेष्ठी ब्रह्माने उस रूपका प्रत्यक्ष दर्शन किया था ॥ ३-४ ॥
किं तदुत्पादितं पूर्वं हरिणा लोकधारिणा ।
रूपं प्रभावं महतामपूर्व धीमतां वर ॥ ५ ॥
महान् बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ सूतपुत्र! सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाले श्रीहरिने पूर्वकालमें वह अद्भुत प्रभावशाली रूप क्यों प्रकट किया? उनका वैसा रूप तो पहले कभी देखनेमें नहीं आया था ॥ ५ ॥
दृष्ट्वा हि विबुधश्रेष्ठमपूर्वममितौजसम् ।
तदश्वशिरसं पुण्यं ब्रह्मा किमकरोन्मुने ॥ ६ ॥
मुने! अमित बलशाली एवं अपूर्वरूपधारी उन पुण्यात्मा सुरश्रेष्ठ हयग्रीवका दर्शन करके ब्रह्माजीने क्या किया? ॥ ६ ॥