भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 2367

एतन्नः संशयं ब्रह्मन् पुराणं ज्ञानसम्भवम् । कथयस्वोत्तममते महापुरुषनिर्मितम् ॥ ७ ॥ पाविताः स्म त्वया ब्रह्मन् पुण्यां कथयता कथाम् । सूतनन्दन! आपकी बुद्धि बड़ी उत्तम है। महापुरुष भगवान्‌के अवतारसम्बन्धी इस पुरातन ज्ञानके विषयमें हमलोगोंको संशय हो रहा है। आप इसका समाधान कीजिये। आपने यह पुण्यमयी कथा कहकर हमलोगोंको पवित्र कर दिया है ॥ ७ १/२ ॥

सौतिरुवाच

कथयिष्यामि ते सर्वं पुराणं वेदसम्मितम् ॥ ८ ॥ जगौ यद् भगवान् व्यासो राज्ञः पारिक्षितस्य वै । सूतपुत्रने कहा—शौनकजी! मैं तुमसे वेदतुल्य प्रमाणभूत सारा पुरातन वृत्तान्त कहूँगा, जिसे भगवान् व्यासने* राजा जनमेजयको सुनाया था ॥ ८ १/२ ॥ श्रुत्वाश्वशिरसो मूर्तिं देवस्य हरिमेधसः ॥ ९ ॥ उत्पन्नसंशयो राजा एतदेवमचोदयत् । भगवान् विष्णुके हयग्रीवावतारकी चर्चा सुनकर तुम्हारी ही तरह राजा जनमेजयको भी संदेह हो गया था। तब उन्होंने इस प्रकार प्रश्न किया— ॥ ९ १/२ ॥

जनमेजय उवाच

यत्तद् दर्शितवान् ब्रह्मा देवं हयशिरोधरम् ॥ १० ॥ किमर्थं तत् सम्भवत् तन्ममाचक्ष्व सत्तम । जनमेजय बोले—सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ मुने! ब्रह्माजीने भगवान्‌के जिस हयग्रीवावतारका दर्शन किया था, उसका प्रादुर्भाव किसलिये हुआ था? यह मुझे बताइये ॥

वैशम्पायन उवाच

यत् किंचिदिह लोके वै देहसत्त्वं विशाम्पते ॥ ११ ॥ सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिभिः । वैशम्पायनजीने कहा—प्रजानाथ! इस जगत्‌में जितने प्राणी हैं, वे सब ईश्वरके संकल्पसे उत्पन्न हुए पाँच महाभूतोंसे युक्त हैं ॥ ११ १/२ ॥ ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा प्रभुर्नारायणो विराट् ॥ १२ ॥ भूतान्तरात्मा वरदः सगुणो निर्गुणोऽपि च । विराट्स्वरूप भगवान् नारायण इस जगत्‌के ईश्वर और स्रष्टा हैं, वे ही सब जीवोंके अन्तरात्मा, वरदाता, सगुण और निर्गुणरूप हैं ॥ १२ १/२ ॥ भूतप्रलयमत्यन्तं शृणुष्व नृपसत्तम ॥ १३ ॥ धरण्यामथ लीनायामप्सु चैकार्णवे पुरा ।