भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2368

ज्योतिर्भूते जले चापि लीने ज्योतिषि चानिले ।। १४ ।।

वायौ चाकाशसंलीने आकाशे च मनोऽनुगे ।

व्यक्ते मनसि संलीने व्यक्ते चाव्यक्ततां गते ।। १५ ।।

अव्यक्ते पुरुषं याते पुंसि सर्वगतेऽपि च ।

तम एवाभवत् सर्वं न प्राज्ञायत किंचन ।। १६ ।।

नृपश्रेष्ठ! अब तुम पञ्चभूतोंके आत्यन्तिक प्रलयकी बात सुनो। पूर्वकालमें जब इस

पृथ्वीका एकार्णवके जलमें लय हो गया। जलका तेजमें, तेजका वायुमें, वायुका आकाशमें,

आकाशका मनमें, मनका व्यक्त (महत्तत्त्व) में, व्यक्तका अव्यक्त प्रकृतिमें, अव्यक्तका

पुरुषमें अर्थात् मायाविशिष्ट ईश्वरमें और पुरुषका सर्वव्यापी परमात्मामें लय हो गया, उस

समय सब ओर केवल अन्धकार-ही-अन्धकार छा गया। उसके सिवा और कुछ भी जान

नहीं पड़ता था ।। १३-१६ ।।

तमसो ब्रह्म सम्भूतं तमोमूलामृतात्मकम् ।

तद्विश्वभावसंज्ञान्तं पौरुषीं तनुमाश्रितम् ।। १७ ।।

तमसे जगत्का कारणभूत ब्रह्म (परम व्योम) प्रकट हुआ है। तमका मूल है

अधिष्ठानभूत अमृततत्त्व। वह मूलभूत अमृत ही तमसे युक्त हो सभी नाम-रूपमें प्रपञ्चको

प्रकट करता है और विराट् शरीरका आश्रय लेकर रहता है ।। १७ ।।

सोऽनिरुद्ध इति प्रोक्तस्तत् प्रधानं प्रचक्षते ।

तदव्यक्तमिति ज्ञेयं त्रिगुणं नृपसत्तम ।। १८ ।।

नृपश्रेष्ठ! उसीको अनिरुद्ध कहा गया है। उसीको प्रधान भी कहते हैं तथा उसीको

त्रिगुणमय अव्यक्त जानना चाहिये ।। १८ ।।

विद्यासहायवान् देवो विष्वक्सेनो हरिःप्रभुः ।

अप्स्वेव शयनं चक्रे निद्रायोगमुपागतः ।। १९ ।।

उस अवस्थामें विद्याशक्तिसे सम्पन्न सर्वव्यापी भगवान् श्रीहरिने योगनिद्राका आश्रय

लेकर जलमें शयन किया ।। १९ ।।

जगतश्चिन्तयन् सृष्टिं चित्रां बहुगुणोद्भवाम् ।

तस्य चिन्तयतः सृष्टिं महानात्मगुणः स्मृतः ।। २० ।।

अहंकारस्ततो जातो ब्रह्मा स तु चतुर्मुखः ।

हिरण्यगर्भो भगवान् सर्वलोकपितामहः ।। २१ ।।

उस समय वे नाना गुणोंसे उत्पन्न होनेवाली जगत्की अद्भुत सृष्टिके विषयमें विचार

करने लगे। सृष्टिके विषयमें विचार करते हुए उन्हें अपने गुण महान् (महत्तत्त्व) का स्मरण

हो आया। उससे अहंकार प्रकट हुआ। वह अहंकार ही चार मुखोंवाले ब्रह्माजी हैं, जो

सम्पूर्ण लोकोंके पितामह और भगवान् हिरण्यगर्भके नामसे प्रसिद्ध हैं ।। २०-२१ ।।

पद्मोऽनिरुद्धात् सम्भूतस्तदा पद्मनिभेक्षणः ।