महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2369, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसहस्रपत्रे द्युतिमानुपविष्टः सनातनः ॥ २२ ॥ ददृशेऽद्भुतसंकाशो लोकानापोमयान् प्रभुः । सत्त्वस्थः परमेष्ठी स ततो भूतगणान् सृजन् ॥ २३ ॥ ब्रह्माण्डमें कमलमें अनिरुद्ध (अहंकार) से कमलनयन ब्रह्माका उस समय प्रादुर्भाव हुआ था। वे अद्भुत रूपधारी एवं तेजस्वी सनातन भगवान् ब्रह्मा सहस्रदल कमलपर विराजमान हो जब इधर-उधर दृष्टि डालने लगे, तब उन्हें समस्त जगत् जलमय दिखायी दिया। तब ब्रह्माजी सत्त्वगुणमें स्थित होकर प्राणियोंकी सृष्टिमें प्रवृत्त हुए ॥ २२-२३ ॥
पूर्वमेव च पद्मस्य पत्रे सूर्यांशुसप्रभे । नारायणकृतौ बिन्दू अपामास्तां गुणोत्तरौ ॥ २४ ॥ वे जिस कमलपर बैठे थे, उसका पत्ता सूर्यके समान देदीप्यमान होता था। उसपर पहलेसे ही भगवान् नारायणकी प्रेरणासे जलकी बूँदें पड़ी थीं, जो रजोगुण और तमोगुणकी प्रतीक थीं ॥ २४ ॥
तावपश्यत् स भगवानादिनिधनोऽच्युतः । एकस्तत्राभवद् बिन्दुर्मध्वाभो रुचिरप्रभः ॥ २५ ॥ स तामसो मधुर्जातस्तदा नारायणाज्ञया । कठिनस्त्वपरो बिन्दुः कैटभो राजसस्तु सः ॥ २६ ॥ आदि-अन्तसे रहित भगवान् अच्युतने उन दोनों बूँदोंकी ओर देखा। उनमेंसे एक बूँद भगवान्की दृष्टि पड़ते ही उनकी प्रेरणासे तमोमय मधुनामक दैत्यके आकारमें परिणत हो गयी। उस दैत्यका रंग मधुके समान था और उसकी कान्ति बड़ी सुन्दर थी। जलकी दूसरी बूँद, जो कुछ कड़ी थी, नारायणकी आज्ञासे रजोगुणसे उत्पन्न कैटभ नामक दैत्यके रूपमें प्रकट हुई ॥
तावभ्यधावतां श्रेष्ठौ तमसा रजसान्वितौ । बलवन्तौ गदाहस्तौ पद्मनालानुसारिणौ ॥ २७ ॥ तमोगुण और रजोगुणसे युक्त वे दोनों श्रेष्ठ दैत्य मधु और कैटभ बड़े बलवान् थे। वे अपने हाथोंमें गदा लिये कमलनालका अनुसरण करते हुए आगे बढ़ने लगे ॥ २७ ॥
ददृशातेऽरविन्दस्थं ब्रह्माणममितप्रभम् । सृजन्तं प्रथमं वेदांश्चतुरश्चारुविग्रहान् ॥ २८ ॥ ऊपर जाकर उन्होंने कमल-पुष्पके आसनपर बैठकर सृष्टि-रचनामें प्रवृत्त हुए अमित तेजस्वी ब्रह्माजीको देखा एवं उनके पास ही मनोहर रूप धारण किये हुए चारों वेदोंको देखा ॥ २८ ॥
ततो विग्रहवन्तौ तौ वेदान् दृष्ट्वासुरोत्तमौ । सहसा जगृहतुर्वेदान् ब्रह्मणः पश्यतस्तदा ॥ २९ ॥