महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टपञ्चाशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः
नागराजके दर्शनके लिये ब्राह्मणकी तपस्या तथा नागराजके परिवारवालोंका भोजनके लिये ब्राह्मणसे आग्रह करना
भीष्म उवाच
अथ तेन नरश्रेष्ठ ब्राह्मणेन तपस्विना ।
निराहारेण वसता दुःखितास्ते भुजङ्गमाः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—नरश्रेष्ठ! तदनन्तर गोमतीके तटपर रहता हुआ वह ब्राह्मण निराहार रहकर तपस्या करने लगा। उसके भोजन न करनेसे वहाँ रहनेवाले नागोंको बड़ा दुःख हुआ ॥ १ ॥
सर्वे सम्भूय सहिता ह्यस्य नागस्य बान्धवाः ।
भ्रातरस्तनया भार्या ययुस्तं ब्राह्मणं प्रति ॥ २ ॥
तब नागराजके भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र सब मिलकर उस ब्राह्मणके पास गये ॥ २ ॥
तेऽपश्यन् पुलिने तं वै विविक्ते नियतव्रतम् ।
समासीनं निराहारं द्विजं जप्यपरायणम् ॥ ३ ॥
उन्होंने देखा, ब्राह्मण गोमतीके तटपर एकान्त प्रदेशमें व्रत और नियमके पालनमें तत्पर हो निराहार बैठा हुआ है और मन्त्रका जप कर रहा है ॥ ३ ॥
ते सर्वे समतिक्रम्य विप्रमभ्यर्च्य चासकृत् ।
ऊचुर्वाक्यमसंदिग्धमातिथेयस्य बान्धवाः ॥ ४ ॥
अतिथि-सत्कारके लिये प्रसिद्ध हुए नागराजके सब भाई-बन्धु ब्राह्मणके पास जा उसकी बारंबार पूजा करके संदेहरहित वाणीमें बोले— ॥ ४ ॥
षष्ठो हि दिवसस्तेऽद्य प्राप्तस्येह तपोधन ।
न चाभिभाषसे किंचिदाहारं धर्मवत्सल ॥ ५ ॥
‘धर्मवत्सल तपोधन! आपको यहाँ आये आज छः दिन हो गये; किंतु अभीतक आप कुछ भोजन लानेके लिये हमें आज्ञा नहीं दे रहे हैं ॥ ५ ॥
अस्मानभिगतश्चासि वयं च त्वामुपस्थिताः ।
कार्यं चातिथ्यमस्माभिर्वयं सर्वे कुटुम्बिनः ॥ ६ ॥
‘आप हमारे घर अतिथिके रूपमें आये हैं और हम आपकी सेवामें उपस्थित हुए हैं। आपका आतिथ्य करना हमारा कर्तव्य है; क्योंकि हम सब लोग गृहस्थ हैं ॥
मूलं फलं वा पर्णं वा पयो वा द्विजसत्तम ।