भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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एकषष्ट्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः

नागराज और ब्राह्मणका परस्पर मिलन तथा बातचीत

भीष्म उवाच

स पन्नगपतिस्तत्र प्रययौ ब्राह्मणं प्रति ।
तमेव मनसा ध्यायन् कार्यवत्तां विचारयन् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! यह कहकर नागराज मन-ही-मन उस ब्राह्मणके कार्यका विचार करते हुए उसके पास गये ॥ १ ॥
तमतिक्रम्य नागेन्द्रो मतिमान् स नरेश्वर ।
प्रोवाच मधुरं वाक्यं प्रकृत्या धर्मवत्सलः ॥ २ ॥
नरेश्वर! उसके निकट पहुँचकर बुद्धिमान् नागेन्द्र, जो स्वभावसे ही धर्मानुरागी थे, मधुर वाणीमें बोले— ॥