भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

चार्वाकको प्राप्त हुए वर आदिका श्रीकृष्णद्वारा वर्णन

वैशम्पायन उवाच

ततस्तत्र तु राजानं तिष्ठन्तं भ्रातृभिः सह ।
उवाच देवकीपुत्रः सर्वदर्शी जनार्दनः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर सर्वदर्शी देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ भाइयोंसहित खड़े हुए राजा युधिष्ठिरसे कहा ॥ १ ॥

वासुदेव उवाच

ब्राह्मणास्तात लोकेऽस्मिन्नर्चनीयाः सदा मम ।
एते भूमिचरा देवा वाग्विषाः सुप्रसादकाः ॥ २ ॥
**श्रीकृष्ण बोले—**तात! इस संसारमें ब्राह्मण मेरे लिये सदा ही पूजनीय हैं। ये पृथ्वीपर विचरनेवाले देवता हैं। कुपित होने पर इनकी वाणीमें विषका-सा प्रभाव होता है। ये सहज ही प्रसन्न होते और दूसरोंको भी प्रसन्न करते हैं ॥ २ ॥

पुरा कृतयुगे राजंश्चार्वाको नाम राक्षसः ।
तपस्तेपे महाबाहो बदर्यां बहुवार्षिकम् ॥ ३ ॥
राजन्! महाबाहो! पहले सत्ययुग की बात है, चार्वाक राक्षसने बहुत वर्षोंतक बद्रिकाश्रममें तपस्या की ॥ ३ ॥

वरेण च्छन्द्यमानश्च ब्रह्मणा च पुनः पुनः ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो वरयामास भारत ॥ ४ ॥
भरतनन्दन! जब ब्रह्माजीने उससे बारंबार वर माँगनेका अनुरोध किया, तब उसने यही वर माँगा कि मुझे किसी भी प्राणीसे भय न हो ॥ ४ ॥

द्विजावमानादन्यत्र प्रादाद् वरमनुत्तमम् ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददौ तस्मै जगत्पतिः ॥ ५ ॥
जगदीश्वर ब्रह्माजीने उसे यह परम उत्तम वर देते हुए कहा कि 'तुम्हें ब्राह्मणका अपमान करनेके सिवा और कहीं किसीसे भय नहीं है' इस तरह उन्होंने उसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी ओरसे अभयदान दे दिया ॥ ५ ॥

स तु लब्धवरः पापो देवानमितविक्रमः ।
राक्षसस्तापयामास तीव्रकर्मा महाबलः ॥ ६ ॥
वर पाकर वह अमित पराक्रमी महाबली और दुःसह कर्म करनेवाला पापात्मा राक्षस देवताओंको संताप देने लगा ॥ ६ ॥