महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
भीष्मके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा श्रीकृष्णका भीष्मकी प्रशंसा करते हुए उन्हें युधिष्ठिरके लिये धर्मोपदेश करनेका आदेश
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा तु वचनं भीष्मो वासुदेवस्य धीमतः ।
किंचिदुन्नाम्य वदनं प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! परम बुद्धिमान् वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णका वचन सुनकर भीष्मजीने अपना मुँह कुछ ऊपर उठाया और हाथ जोड़कर कहा— ।। १ ।।
भीष्म उवाच
नमस्ते भगवन् कृष्ण लोकानां प्रभवाप्यय ।
त्वं हि कर्ता हृषीकेश संहर्ता चापराजितः ।। २ ।।
भीष्मजी बोले— सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्ति और प्रलयके अधिष्ठान भगवान् श्रीकृष्ण! आपको नमस्कार है। हृषीकेश! आप ही इस जगत्की सृष्टि और संहार करनेवाले हैं। आपकी कभी पराजय नहीं होती ।। २ ।।
विश्वकर्मन् नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन् विश्वसम्भव ।
अपवर्गोऽसि भूतानां पञ्चानां परतः स्थितः ।। ३ ।।
इस विश्वकी रचना करनेवाले परमेश्वर! आपको नमस्कार है। विश्वके आत्मा और विश्वकी उत्पत्तिके स्थान-भूत जगदीश्वर! आपको नमस्कार है। आप पाँचों भूतोंसे परे और सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये मोक्षस्वरूप हैं ।। ३ ।।
नमस्ते त्रिषु लोकेषु नमस्ते परतस्त्रिषु ।
योगेश्वर नमस्तेऽस्तु त्वं हि सर्वपरायणः ।। ४ ।।
तीनों लोकोंमें व्याप्त हुए आपको नमस्कार है। तीनों गुणोंसे अतीत आपको प्रणाम है। योगेश्वर! आपको नमस्कार है। आप ही सबके परम आधार हैं ।। ४ ।।
मत्संश्रितं यदाऽऽत्थ त्वं वचः पुरुषसत्तम ।
तेन पश्यामि ते दिव्यान् भावान् हि त्रिषु वर्त्मसु ।। ५ ।।
पुरुषप्रवर! आपने मेरे सम्बन्धमें जो बात कही है, उससे मैं तीनों लोकोंमें व्याप्त हुए आपके दिव्य भावोंका साक्षात्कार कर रहा हूँ ।। ५ ।।