भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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द्विसप्ततितमोऽध्यायः

राजाके लिये सदाचारी विद्वान् पुरोहितकी आवश्यकता तथा प्रजापालनका महत्त्व

भीष्म उवाच

य एव तु सतो रक्षेदसतःश्च निवर्तयेत् ।
स एव राज्ञः कर्तव्यो राजन् राजपुरोहितः ॥ १ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! राजाको चाहिये कि वह एक ऐसे विद्वान् ब्राह्मणको अपना पुरोहित बनाये, जो उसके सत्कर्मोंकी रक्षा करे और उसे असत् कर्मसे दूर रखे (तथा जो उसके शुभकी रक्षा और अशुभका निवारण करे) ॥ १ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
पुरूरवस ऐलस्य संवादं मातरिश्वनः ॥ २ ॥
इस विषयमें विद्वान् लोग इला कुमार पुरूरवा तथा वायुके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥

पुरूरवा उवाच

कुतःस्विद् ब्राह्मणो जातो वर्णाश्चापि कुतस्त्रयः ।
कस्माच्च भवति श्रेष्ठस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३ ॥
**पुरूरवाने पूछा—**वायुदेव! ब्राह्मणकी उत्पत्ति किससे हुई है? अन्य तीनों वर्ण भी किससे उत्पन्न हुए हैं तथा ब्राह्मण उन सबसे श्रेष्ठ क्यों है? यह मुझे स्पष्टरूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ ३ ॥

मातरिश्वोवाच

ब्राह्मणो मुखतः सृष्टो ब्रह्मणो राजसत्तम ।
बाहुभ्यां क्षत्रियः सृष्ट ऊरुभ्यां वैश्य एव च ॥ ४ ॥
**वायुने कहा—**नृपश्रेष्ठ! ब्रह्माजीके मुखसे ब्राह्मणकी, दोनों भुजाओंसे क्षत्रियकी तथा दोनों ऊरुओंसे वैश्यकी सृष्टि हुई है ॥ ४ ॥

वर्णानां परिचर्यार्थं त्रयाणां भरतर्षभ ।
वर्णश्चतुर्थः पश्चात् तु पद्भ्यां शूद्रो विनिर्मितः ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! इसके बाद इन तीनों वर्णोंकी सेवाके लिये ब्रह्माजीके दोनों पैरोंसे चौथे वर्ण शूद्रकी रचना हुई ॥ ५ ॥

ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यामनुजायते ।
ईश्वरः सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये ॥ ६ ॥