महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 498, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण जन्मकालसे ही भूतलपर धर्मकोशकी रक्षाके लिये अन्य सब वर्णोंका नियन्ता होता है ।। ६ ।। अतः पृथिव्या यन्तारं क्षत्रियं दण्डधारिणम् । द्वितीयं वर्णमकरोत् प्रजानामनुगुप्तये ।। ७ ।। तदनन्तर ब्रह्माजीने पृथ्वीपर शासन करनेवाले और दण्डधारणमें समर्थ दूसरे वर्ण क्षत्रियको प्रजाजनोंकी रक्षाके लिये नियुक्त किया ।। ७ ।। वैश्यस्तु धनधान्येन त्रीन् वर्णान् विध्यादिमान् । शूद्रो ह्येतान् परिचरेदिति ब्रह्मानुशासनम् ।। ८ ।। वैश्य धन-धान्यके द्वारा इन तीनों वर्णोंका पोषण करे और शूद्र शेष तीनों वर्णोंकी सेवामें संलग्न रहे, यह ब्रह्माजीका आदेश है ।। ८ ।।
ऐल उवाच
द्विजस्य क्षत्रबन्धोर्वा कस्येयं पृथिवी भवेत् । धर्मतः सह वित्तेन सम्यग् वायो प्रचक्ष्व मे ।। ९ ।। पुरूरवाने पूछा—वायुदेव! धन-धान्यसहित यह पृथ्वी धर्मतः किसकी है? ब्राह्मणकी या क्षत्रियकी? यह मुझे ठीक-ठीक बताइये ।। ९ ।।
वायुरुवाच
विप्रस्य सर्वमेवैतद् यत्र किञ्चिज्जगतीगतम् । ज्येष्ठेनाभिजनेनेह तद्धर्मकुशला विदुः ।। १० ।। वायुदेवने कहा—राजन्! धर्मनिपुण विद्वान् ऐसा मानते हैं कि उत्तम स्थानसे उत्पन्न और ज्येष्ठ होनेके कारण इस पृथ्वीपर जो कुछ है, वह सब ब्राह्मणका ही है ।। १० ।। स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति च । गुरुर्हि सर्ववर्णानां ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च वै द्विजः ।। ११ ।। ब्राह्मण अपना ही खाता, अपना ही पहनता और अपना ही देता है। निश्चय ही ब्राह्मण सब वर्णोंका गुरु, ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है ।। ११ ।। पत्यभावे यथैव स्त्री देवरं कुरुते पतिम् । आनन्तर्यात् तथा क्षत्रं पृथिवी कुरुते पतिम् । एष ते प्रथमः कल्प आपद्यन्यो भवेत् ततः ।। १२ ।। जैसे वाग्दानके अनन्तर पतिके मर जानेपर स्त्री देवरको पति बनाती है*, उसी प्रकार पृथ्वी ब्राह्मणके बाद ही क्षत्रियका पतिरूपमें वरण करती है, यह तुम्हें मैंने अनादि कालसे प्रचलित प्रथम श्रेणीका नियम बताया है। आपत्तिकालमें इसमें फेर-फार भी हो सकता है ।। १२ ।। यदि स्वर्गं परं स्थानं स्वधर्मं परिमार्गसि ।