महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 511, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठजीने घोर तपस्या करके उन राक्षसोंका विनाश कर डाला और राजाके लिये विजय पानेका मार्ग प्राप्त कर लिया ॥ ७ ॥ ततो वैश्रवणो राजा मुचुकुन्दमदर्शयत् । वध्यमानेषु सैन्येषु वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ८ ॥ इसके बाद राजा कुबेरने, अपनी सेनाको मरते देखकर राजा मुचुकुन्दको दर्शन दिया और इस प्रकार कहा ॥ ८ ॥
धनद उवाच
बलवन्तस्त्वया पूर्वे राजानः सपुरोहिताः । न चैवं समवर्तन्त यथा त्वमिह वर्तसे ॥ ९ ॥ **कुबेर बोले—**राजन्! पहले भी तुम्हारे समान बलवान् राजा हो चुके हैं और उन्हें भी पुरोहितोंकी सहायता प्राप्त थी, परंतु मेरे साथ यहाँ तुम जैसा बर्ताव कर रहे हो, वैसा किसीने नहीं किया था ॥ ९ ॥ ते खल्वपि कृतास्त्राश्च बलवन्तश्च भूमियाः । आगम्य पर्युपासन्ते मामीशं सुखदुःखयोः ॥ १० ॥ वे भूपाल भी अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा बलवान् थे और मुझे सुख एवं दुःख देनेमें समर्थ ईश्वर मानकर मेरे पास आते और मेरी उपासना करते थे ॥ १० ॥ यद्यस्ति बाहुवीर्यं ते तद् दर्शयितुमर्हसि । किं ब्राह्मणबलेन त्वमतिमात्रं प्रवर्त्तसे ॥ ११ ॥ महाराज! यदि तुम्हारी भुजाओंमें कुछ बल है तो उसे दिखाओ। ब्राह्मणके बलपर इतना घमण्ड क्यों कर रहे हो? ॥ ११ ॥ मुचुकुन्दस्ततः क्रुद्धः प्रत्युवाच धनेश्वरम् । न्यायपूर्वमसंरब्धमसम्भ्रान्तमिदं वचः ॥ १२ ॥ यह सुनकर मुचुकुन्द कुपित हो उठे और धनाध्यक्ष कुबेरसे यह न्याययुक्त, रोषरहित तथा सम्भ्रमशून्य वचन बोले— ॥ १२ ॥ ब्रह्मक्षत्रमिदं सृष्टमेकयोनि स्वयम्भुवा । पृथग्बलविधानं तन्न लोकं परिपालयेत् ॥ १३ ॥ 'राजराज! ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनोंकी उत्पत्तिका स्थान एक ही है। दोनोंको स्वयम्भू ब्रह्माजीने ही पैदा किया है। यदि उनका बल और प्रयत्न अलग-अलग हो जाय तो वे संसारकी रक्षा नहीं कर सकते ॥ १३ ॥ तपो मन्त्रबलं नित्यं ब्राह्मणेषु प्रतिष्ठितम् । अस्त्रबाहुबलं नित्यं क्षत्रियेषु प्रतिष्ठितम् ॥ १४ ॥