महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 523, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तसप्ततितमोऽध्यायः
केकयराज तथा राक्षसका उपाख्यान और केकयराज्यकी श्रेष्ठताका विस्तृत वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
केषां प्रभवते राजा वित्तस्य भरतर्षभ ।
कया च वृत्त्या वर्तेत तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतकुलभूषण पितामह! किन-किन मनुष्योंके धनपर राजाका अधिकार होता है? तथा राजाको कैसा बर्ताव करना चाहिये? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अब्राह्मणानां वित्तस्य स्वामी राजेति वैदिकम् ।
ब्राह्मणानां च ये केचिद् विकर्मस्था भवन्त्युत ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! ब्राह्मणके सिवा अन्य सभी वर्णोंके धनका स्वामी राजा होता है, यह वैदिक मत है। ब्राह्मणोंमें भी जो कोई अपने वर्णके विपरीत कर्म करते हों, उनके धनपर भी राजाका ही अधिकार है ॥ २ ॥
विकर्मस्थाश्च नोपेक्ष्या विप्रा राज्ञा कथञ्चन ।
इति राज्ञां पुरावृत्तमभिजल्पन्ति साधवः ॥ ३ ॥
अपने वर्णके विपरीत कर्मोंमें लगे हुए ब्राह्मणोंकी राजाको किसी प्रकार उपेक्षा नहीं करनी चाहिये (क्योंकि उन्हें दण्ड देकर भी राहपर लाना राजाका कर्तव्य है)। साधुपुरुष इसीको राजाओंका प्राचीनकालसे चला आता हुआ बर्ताव या धर्म कहते हैं ॥ ३ ॥
यस्य स्म विषये राज्ञः स्तेनो भवति वै द्विजः ।
राज्ञ एवापराधं तं मन्यन्ते किल्बिषं नृप ॥ ४ ॥
नरेश्वर! जिस राजाके राज्यमें कोई ब्राह्मण चोरी करने लग जाता है, वह राजा अपराधी माना जाता है। विचारवान् पुरुष इसे राजाका ही अपराध और पाप समझते हैं ॥ ४ ॥
अभिशस्तमिवात्मानं मन्यन्ते येन कर्मणा ।
तस्माद् राजर्षयः सर्वे ब्राह्मणानन्वपालयन् ॥ ५ ॥
ब्राह्मणमें उक्त दोष आ जाय तो उससे राजा अपने आपको कलङ्कित मानते हैं; इसीलिये सभी राजर्षियोंने ब्राह्मणोंकी सदा ही रक्षा की है ॥ ५ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गीतं कैकेयराजेन ह्रियमाणेण रक्षसा ॥ ६ ॥