महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 527, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्येनार्थं ब्राह्मणानां च गुप्त्या । शुश्रूषया चापि गुरूमुपैमि न मे भयं विद्यते राक्षसेभ्यः ॥ २५ ॥ मैं धन देकर विद्या पानेकी इच्छा रखता हूँ। सत्यके पालन तथा ब्राह्मणोंके संरक्षणद्वारा अभीष्ट अर्थ (पुण्यलोकोंपर अधिकार) पाना चाहता हूँ तथा सेवा-शुश्रूषाद्वारा गुरुजनोंको संतुष्ट करनेके लिये उनके पास जाता हूँ; अतः मुझे राक्षसोंसे कभी भय नहीं है ॥ २५ ॥
न मे राष्ट्रे विधवा ब्रह्मबन्धु- र्न ब्राह्मणः कितवो नोत चोरः । अयाज्ययाजी न च पापकर्मा न मे भयं विद्यते राक्षसेभ्यः ॥ २६ ॥ मेरे राज्यमें कोई स्त्री विधवा नहीं है तथा कोई भी ब्राह्मण अधम, धूर्त, चोर, अनधिकारियोंका यज्ञ करानेवाला और पापाचारी नहीं है; इसलिये मुझे राक्षसोंसे तनिक भी भय नहीं है ॥ २६ ॥
न मे शस्त्रैर्निर्भिन्नं गात्रे द्वयङ्गुलमन्तरम् । धर्मार्थं युध्यमानस्य मामकान्तरमाविशः ॥ २७ ॥ मेरे शरीरमें दो अंगुल भी ऐसा स्थान नहीं है, जो धर्मके लिये युद्ध करते समय अस्त्र-शस्त्रोंसे घायल न हुआ हो, तथापि तुम मेरे भीतर कैसे घुस आये? ॥ २७ ॥
गोब्राह्मणेभ्यो यज्ञेभ्यो नित्यं स्वस्त्ययनं मम । आशासते जना राष्ट्रे मामकान्तरमाविशः ॥ २८ ॥ मेरे राज्यमें रहनेवाले लोग गौओं, ब्राह्मणों तथा यज्ञोंके लिये सदा मङ्गल-कामना करते रहते हैं, तो भी तुम मेरे शरीरके भीतर कैसे घुस आये? ॥ २८ ॥
राक्षस उवाच
(नारीणां व्यभिचाराच्च अन्यायाच्च महीक्षिताम् । विप्राणां कर्मदोषाच्च प्रजानां जायते भयम् ॥ राक्षसने कहा—स्त्रियोंके व्यभिचारसे, राजाओंके अन्यायसे तथा ब्राह्मणोंके कर्मदोषसे प्रजाको भय प्राप्त होता है ॥
अवृष्टिर्मारको रोगः सततं क्षुद्भयानि च । विग्रहश्च सदा तस्मिन् देशे भवति दारुणः ॥ जिस देशमें उक्त दोष होते हैं, वहाँ वर्षा नहीं होती। महामारी फैल जाती है, सदा भूखका भय बना रहता है और बड़ा भयानक संग्राम छिड़ जाता है ॥
यक्षरक्षःपिशाचेभ्यो नासुरेभ्यः कथञ्चन । भयमुत्पद्यते तत्र यत्र विप्राः सुसंयताः ॥)