भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 531

**भीष्मजीने कहा—**तात युधिष्ठिर! ब्राह्मणको मांस, मदिरा, शहद, नमक, तिल, बनायी हुई रसोई, घोड़ा तथा बैल, गाय, बकरा, भेड़ और भैंस आदि पशु—इन वस्तुओंका विक्रय तो सभी अवस्थाओंमें त्याग देना चाहिये; क्योंकि इनको बेचनेसे ब्राह्मण नरकमें पड़ता है॥ ४-५॥
अजोऽग्निर्वरुणो मेषः सूर्योऽश्वः पृथिवी विराट् ।
धेनुर्यज्ञश्च सोमश्च न विक्रेयाः कथंचन ॥ ६ ॥
पक्वेनामस्य निमयं न प्रशंसन्ति साधवः ।
निमयेत् पक्वमामेन भोजनार्थाय भारत ॥ ७ ॥
बकरा अग्निस্বরূপ, भेड़ वरुणस्वरूप, घोड़ा सूर्यस्वरूप, पृथिवी विराट्स्वरूप तथा गौ यज्ञ और सोमका स्वरूप हैं; अतः इनका विक्रय कभी किसी तरह नहीं करना चाहिये। भरतनन्दन! ब्राह्मणके लिये बनी-बनायी रसोई देकर बदलेमें कच्चा अन्न लेनेकी साधुपुरुष प्रशंसा नहीं करते हैं; किंतु केवल भोजनके लिये कच्चा अन्न देकर उसके बदले पका-पकाया अन्न ले सकते हैं॥
वयं सिद्धमशिष्यामो भवान् साधयतामिदम् ।
एवं संवीक्ष्य निमयेन्नाधर्मोऽस्ति कथंचन ॥ ८ ॥
‘हम लोग बनी-बनायी रसोई पाकर भोजन कर लेंगे। आप यह कच्चा अन्न लेकर इसे पकाइये’ इस भावसे अच्छी तरह विचार करके यदि कच्चे अन्नसे पके-पकाये अन्नको बदल लिया जाय तो इसमें किसी प्रकार भी अधर्म नहीं होता॥ ८॥
अत्र ते वर्तयिष्यामि यथा धर्मः सनातनः ।
व्यवहारप्रवृत्तानां तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ९ ॥
युधिष्ठिर! इस विषयमें व्यवहारपरायण मनुष्योंके लिये सनातन कालसे चला आता हुआ धर्म जैसा है, वैसा मैं तुम्हें बतला रहा हूँ सुनो॥ ९॥
भवतेऽहं ददानीदं भवानेतत् प्रयच्छतु ।
रुचितो वर्तते धर्मो न बलात् सम्प्रवर्तते ॥ १० ॥
मैं आपको यह वस्तु देता हूँ, इसके बदलेमें आप मुझे वह वस्तु दे दीजिये, ऐसा कहकर दोनोंकी रुचिसे जो वस्तुओंकी अदला-बदली की जाती है, उसे धर्म माना जाता है। यदि बलात्कारपूर्वक अदला-बदली की जाय तो वह धर्म नहीं है॥ १०॥
इत्येवं सम्प्रवर्तन्ते व्यवहाराः पुरातनाः ।
ऋषीणामितरेषां च साधु चैतदसंशयम् ॥ ११ ॥
प्राचीन कालसे ऋषियों तथा अन्य सत्पुरुषोंके सारे व्यवहार ऐसे ही चले आ रहे हैं। यह सब ठीक है, इसमें संशय नहीं है॥ ११॥
युधिष्ठिर उवाच