भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 532

अथ तात यदा सर्वाः शस्त्रमाददते प्रजाः ।
व्युत्क्रामन्ति स्वधर्मेभ्यः क्षत्रस्य क्षीयते बलम् ॥ १२ ॥
राजा त्राता तु लोकस्य कथं च स्यात् परायणम् ।
एतन्मे संशयं ब्रूहि विस्तरेण नराधिप ॥ १३ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**तात! नरेश्वर! यदि सारी प्रजा शस्त्र धारण कर ले और अपने धर्मसे गिर जाय, उस समय क्षत्रियकी शक्ति तो क्षीण हो जायगी। फिर राजा राष्ट्रकी रक्षा कैसे कर सकता है और वह सब लोगोंको किस तरह शरण दे सकता है। मेरे इस संदेहका आप विस्तारपूर्वक समाधान करें ॥ १२-१३ ॥

भीष्म उवाच

दानेन तपसा यज्ञैरद्रोहेण दमेन च ।
ब्राह्मणप्रमुखा वर्णाः क्षेममिच्छेयुरात्मनः ॥ १४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! ब्राह्मण आदि सभी वर्णोंको दान, तप, यज्ञ, प्राणियोंके प्रति द्रोहका अभाव तथा इन्द्रिय-संयमके द्वारा अपने कल्याणकी इच्छा रखनी चाहिये ॥
तेषां ये वेदबलिनस्तेऽभ्युत्थाय समन्ततः ।
राज्ञो बलं वर्धयेयुर्महेन्द्रस्येव देवताः ॥ १५ ॥
उनमेंसे जिन ब्राह्मणोंमें वेद-शास्त्रोंका बल हो, वे सब ओरसे उठकर राजाका उसी प्रकार बल बढ़ावें, जैसे देवता इन्द्रका बल बढ़ाते हैं ॥ १५ ॥
राज्ञोऽपि क्षीयमाणस्य ब्रह्मैवाहुः परायणम् ।
तस्माद् ब्रह्मबलेनैव समुत्थेयं विजानता ॥ १६ ॥
जिसकी शक्ति क्षीण हो रही हो, उस राजाके लिये ब्राह्मणको ही सबसे बड़ा सहायक बताया गया है; अतः बुद्धिमान् नरेशको ब्राह्मणके बलका आश्रय लेकर ही अपनी उन्नति करनी चाहिये ॥ १६ ॥
यदा भुवि जयी राजा क्षेमं राष्ट्रेऽभिसंदधेत् ।
तदा वर्णा यथाधर्मं निविशेयुः कथंचन ॥ १७ ॥
जब भूतलपर विजयी राजा अपने राष्ट्रमें कल्याणमय शासन स्थापित करना चाहता हो, तब उसे चाहिये कि जिस किसी प्रकारसे सभी वर्णके लोगोंको अपने-अपने धर्मका पालन करनेमें लगाये रखे ॥ १७ ॥
उन्मर्यादे प्रवृत्ते तु दस्युभिः संकरे कृते ।
सर्वे वर्णा न दुष्येयुः शस्त्रवन्तो युधिष्ठिर ॥ १८ ॥
युधिष्ठिर! जब डाकू और लुटेरे धर्ममर्यादाका उल्लङ्घन करके स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त हुए हों और प्रजामें वर्णसंकरता फैला रहे हों, उस समय इस अत्याचारको रोकनेके लिये यदि सभी वर्णोंके लोग हथियार उठा लें तो उन्हें कोई दोष नहीं लगता ॥ १८ ॥