भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 533

युधिष्ठिर उवाच अथ चेत् सर्वतः क्षत्रं प्रदुष्येद् ब्राह्मणं प्रति । कस्तस्य ब्राह्मणस्त्राता को धर्मः किं परायणम् ॥ १९ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! यदि क्षत्रिय जाति ही सब ओरसे ब्राह्मणोंके साथ दुर्व्यवहार करने लगे, उस समय उस ब्राह्मणकुलकी रक्षा कौन ब्राह्मण कर सकता है? उनके लिये कौन-सा धर्म (कर्तव्य) है तथा कौन-सा महान् आश्रय? ॥ १९ ॥

भीष्म उवाच तपसा ब्रह्मचर्येण शस्त्रेण च बलेन च । अमायया मायया च नियन्तव्यं तदा भवेत् ॥ २० ॥ भीष्मजीने कहा—राजन्! उस समय ब्राह्मण अपने तपसे, ब्रह्मचर्यसे, शस्त्रसे, बलसे, निष्कपट व्यवहारसे अथवा भेदनीतिसे—जैसे भी सम्भव हो, उसी तरह क्षत्रिय जातिको दबानेका प्रयत्न करे ॥ २० ॥

क्षत्रियस्यातिवृत्तस्य ब्राह्मणेषु विशेषतः । ब्रह्मैव संनियन्तृ स्यात् क्षत्रं हि ब्रह्मसम्भवम् ॥ २१ ॥ जब क्षत्रिय ही प्रजाके ऊपर, उसमें भी विशेषतः ब्राह्मणोंपर अत्याचार करने लगे तो उस समय उसे ब्राह्मण ही दबा सकता है; क्योंकि क्षत्रियकी उत्पत्ति ब्राह्मणसे ही हुई है ॥ २१ ॥

अद्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् । तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति ॥ २२ ॥ अग्नि जलसे, क्षत्रिय ब्राह्मणसे और लोहा पत्थरसे पैदा हुआ है। इनका तेज या प्रभाव सर्वत्र काम करता है; परंतु अपनी उत्पत्तिके मूल कारणोंसे मुकाबला पड़नेपर शान्त हो जाता है ॥ २२ ॥

यदा छिनत्त्ययोऽश्मानमग्निश्चापोऽभिगच्छति । क्षत्रं च ब्राह्मणं द्वेष्टि तदा नश्यन्ति ते त्रयः ॥ २३ ॥ जब लोहा पत्थर काटता है, अग्नि जलके पास जाती है और क्षत्रिय ब्राह्मणसे द्वेष करने लगता है, तब ये तीनों नष्ट हो जाते हैं ॥ २३ ॥

तस्माद् ब्रह्मणि शाम्यन्ति क्षत्रियाणां युधिष्ठिर । समुदीर्णान्यजेयानि तेजांसि च बलानि च ॥ २४ ॥ युधिष्ठिर! यद्यपि क्षत्रियोंके तेज और बल प्रचण्ड और अजेय होते हैं, तथापि ब्राह्मणसे टक्कर लेनेपर शान्त हो जाते हैं ॥ २४ ॥

ब्रह्मवीर्ये मृदूभूते क्षत्रवीर्ये च दुर्बले । दुष्टेषु सर्ववर्णेषु ब्राह्मणान् प्रति सर्वशः ॥ २५ ॥