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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

युधिष्ठिर उवाच अथ चेत् सर्वतः क्षत्रं प्रदुष्येद् ब्राह्मणं प्रति । कस्तस्य ब्राह्मणस्त्राता को धर्मः किं परायणम् ॥ १९ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! यदि क्षत्रिय जाति ही सब ओरसे ब्राह्मणोंके साथ दुर्व्यवहार करने लगे, उस समय उस ब्राह्मणकुलकी रक्षा कौन ब्राह्मण कर सकता है? उनके लिये कौन-सा धर्म (कर्तव्य) है तथा कौन-सा महान् आश्रय? ॥ १९ ॥

भीष्म उवाच तपसा ब्रह्मचर्येण शस्त्रेण च बलेन च । अमायया मायया च नियन्तव्यं तदा भवेत् ॥ २० ॥ भीष्मजीने कहा—राजन्! उस समय ब्राह्मण अपने तपसे, ब्रह्मचर्यसे, शस्त्रसे, बलसे, निष्कपट व्यवहारसे अथवा भेदनीतिसे—जैसे भी सम्भव हो, उसी तरह क्षत्रिय जातिको दबानेका प्रयत्न करे ॥ २० ॥

क्षत्रियस्यातिवृत्तस्य ब्राह्मणेषु विशेषतः । ब्रह्मैव संनियन्तृ स्यात् क्षत्रं हि ब्रह्मसम्भवम् ॥ २१ ॥ जब क्षत्रिय ही प्रजाके ऊपर, उसमें भी विशेषतः ब्राह्मणोंपर अत्याचार करने लगे तो उस समय उसे ब्राह्मण ही दबा सकता है; क्योंकि क्षत्रियकी उत्पत्ति ब्राह्मणसे ही हुई है ॥ २१ ॥

अद्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम् । तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति ॥ २२ ॥ अग्नि जलसे, क्षत्रिय ब्राह्मणसे और लोहा पत्थरसे पैदा हुआ है। इनका तेज या प्रभाव सर्वत्र काम करता है; परंतु अपनी उत्पत्तिके मूल कारणोंसे मुकाबला पड़नेपर शान्त हो जाता है ॥ २२ ॥

यदा छिनत्त्ययोऽश्मानमग्निश्चापोऽभिगच्छति । क्षत्रं च ब्राह्मणं द्वेष्टि तदा नश्यन्ति ते त्रयः ॥ २३ ॥ जब लोहा पत्थर काटता है, अग्नि जलके पास जाती है और क्षत्रिय ब्राह्मणसे द्वेष करने लगता है, तब ये तीनों नष्ट हो जाते हैं ॥ २३ ॥

तस्माद् ब्रह्मणि शाम्यन्ति क्षत्रियाणां युधिष्ठिर । समुदीर्णान्यजेयानि तेजांसि च बलानि च ॥ २४ ॥ युधिष्ठिर! यद्यपि क्षत्रियोंके तेज और बल प्रचण्ड और अजेय होते हैं, तथापि ब्राह्मणसे टक्कर लेनेपर शान्त हो जाते हैं ॥ २४ ॥

ब्रह्मवीर्ये मृदूभूते क्षत्रवीर्ये च दुर्बले । दुष्टेषु सर्ववर्णेषु ब्राह्मणान् प्रति सर्वशः ॥ २५ ॥

ये तत्र युद्धं कुर्वन्ति त्यक्त्वा जीवितमात्मनः । ब्राह्मणान् परिरक्षन्तो धर्ममात्मानमेव च ॥ २६ ॥ मनस्विनो मन्युमन्तः पुण्यश्लोका भवन्ति ते । ब्राह्मणार्थं हि सर्वेषां शस्त्रग्रहणमिष्यते ॥ २७ ॥ जब ब्राह्मणकी शक्ति मन्द पड़ जाय, क्षत्रियका पराक्रम भी दुर्बल हो जाय और सभी वर्णोंके लोग सर्वथा ब्राह्मणोंसे दुर्भाव रखने लगें, उस समय जो लोग ब्राह्मणोंकी, धर्मकी तथा अपने आपकी रक्षाके लिये प्राणोंकी परवा न करके दुष्टोंके साथ क्रोधपूर्वक युद्ध करते हैं, उन मनस्वी पुरुषोंका पवित्र यश सब ओर फैल जाता है; क्योंकि ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये सबको शस्त्र ग्रहण करनेका अधिकार है ॥ २६–२७ ॥

अतिस्विष्टमधीतानां लोकानतितपस्विनाम् । अनाशनाग्न्योर्विशतां शूरा यान्ति परां गतिम् ॥ २८ ॥ अतिमात्रामें यज्ञ, वेदाध्ययन, तपस्या और उपवासव्रत करनेवालोंको तथा आत्मशुद्धिके लिये अग्निप्रवेश करनेवाले लोगोंको जिन लोकोंकी प्राप्ति होती है, उनसे भी उत्तम लोक ब्राह्मणके लिये प्राण देनेवाले शूरवीरोंको प्राप्त होते हैं ॥ २८ ॥

ब्राह्मणस्त्रिषु वर्णेषु शस्त्रं गृह्णन्न दुष्यति । एवमेवात्मनस्त्यागान्नान्यं धर्मं विदुर्जनाः ॥ २९ ॥ ब्राह्मण भी यदि तीनों वर्णोंकी रक्षाके लिये शस्त्र ग्रहण करे तो उसे दोष नहीं लगता। विद्वान् पुरुष इस प्रकार युद्धमें अपने शरीरके त्यागसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं मानते हैं ॥ २९ ॥

तेभ्यो नमश्च भद्रं च ये शरीराणि जुह्वते । ब्रह्मद्विषो नियच्छन्तस्तेषां नोऽस्तु सलोकता । ब्रह्मलोकजितः स्वर्ग्यान् वीरांस्तान् मनुरब्रवीत् ॥ ३० ॥ जो लोग ब्राह्मणोंसे द्वेष करनेवाले दुराचारियोंको दबानेके लिये युद्धकी ज्वालामें अपने शरीरकी आहुति दे डालते हैं, उन वीरोंको नमस्कार है, उनका कल्याण हो। हम लोगोंको उन्हींके समान लोक प्राप्त हो। मनुजीने कहा है कि 'वे स्वर्गीय शूरवीर ब्रह्मलोकपर विजय पा जाते हैं' ॥

यथाश्वमेधावभृथे स्नाताः पूता भवन्त्युत । दुष्कृतस्य प्रणाशेन ततः शस्त्रहता रणे ॥ ३१ ॥ जैसे अश्वमेध यज्ञके अन्तमें अवभृथस्नान करनेवाले मनुष्य पापरहित एवं पवित्र हो जाते हैं, उसी प्रकार युद्धमें शस्त्रोंद्वारा मारे गये वीर अपने पाप नष्ट हो जानेके कारण पवित्र हो जाते हैं ॥ ३१ ॥

भवत्यधर्मो धर्मो हि धर्माधर्मावुभावपि । कारणाद् देशकालस्य देशकालः स तादृशः ॥ ३२ ॥

देश-कालकी परिस्थितिके कारण कभी अधर्म तो धर्म हो जाता है और धर्म

अधर्मरूपमें परिणत हो जाता है; क्योंकि वह वैसा ही देश काल है ॥ ३२ ॥

मैत्राः क्रूराणि कुर्वन्तो जयन्ति स्वर्गमुत्तमम् ।

धर्म्याः पापानि कुर्वाणा गच्छन्ति परमां गतिम् ॥ ३३ ॥

सबके प्रति मैत्रीका भाव रखनेवाले मनुष्य भी (दूसरोंकी रक्षाके लिये किसी दुष्टके

प्रति) क्रूरतापूर्ण बर्ताव करके उत्तम स्वर्गलोकपर अधिकार प्राप्त कर लेते हैं तथा धर्मात्मा

पुरुष किसीकी रक्षाके लिये पाप (हिंसा आदि) करते हुए भी परम गतिको प्राप्त हो जाते

हैं ॥ ३३ ॥

ब्राह्मणस्त्रिषु कालेषु शस्त्रं गृह्णन्न दुष्यति ।

आत्मत्राणे वर्णदोषे दुर्दम्यनियमेषु च ॥ ३४ ॥

अपनी रक्षाके लिये, अन्य वर्णोंमें यदि कोई बुराई आ रही हो तो उसे रोकनेके लिये

तथा दुर्दान्त दुष्टोंका दमन करनेके लिये—इन तीन अवसरोंपर ब्राह्मण भी शस्त्र ग्रहण करे

तो उसे दोष नहीं लगता ॥ ३४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अभ्युत्थिते दस्युबले क्षत्रार्थे वर्णसंकरे ।

सम्प्रमूढेषु वर्णेषु यद्यन्योऽभिभवेद् बली ॥ ३५ ॥

ब्राह्मणो यदि वा वैश्यः शूद्रो वा राजसत्तम ।

दस्युभ्योऽथ प्रजा रक्षेद् दण्डं धर्मेण धारयन् ॥ ३६ ॥

कार्यं कुर्यान्न वा कुर्यात् संवार्यो वा भवेन्न वा ।

तस्माच्छस्त्रं ग्रहीतव्यमन्यत्र क्षत्रबन्धुतः ॥ ३७ ॥

युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! नृपश्रेष्ठ! यदि डाकुओंका दल उत्तरोत्तर बढ़ रहा हो,

समाजमें वर्णसंकरता फैल रही हो और क्षत्रियके प्रजापालनरूपी कार्यके लिये समस्त

वर्णोंके लोग कोई उपाय न ढूँढ़ पाते हों, उस अवस्थामें यदि कोई बलवान् ब्राह्मण, वैश्य

अथवा शूद्र धर्मकी रक्षाके निमित्त दण्ड धारण करके लुटेरोंके हाथसे प्रजाको बचा ले तो

वह राजशासनका कार्य कर सकता है या नहीं। अथवा उसे इस कार्यसे रोकना चाहिये या

नहीं? मेरा तो मत है कि क्षत्रियसे भिन्न वर्णके लोगोंको भी ऐसे अवसरोंपर अवश्य शस्त्र

उठाना चाहिये ॥ ३५—३७ ॥

भीष्म उवाच

अपारे यो भवेत् पारमप्लवे यः प्लवो भवेत् ।

शूद्रो वा यदि वाप्यन्यः सर्वथा मानमर्हति ॥ ३८ ॥

भीष्मजीने कहा—बेटा! जो अपार संकटसे पार लगा दे, नौकाके अभावमें डूबते

हुएको जो नाव बनकर सहारा दे, वह शूद्र हो या कोई अन्य, सर्वथा सम्मानके योग्य

है॥ ३८ ॥ यमाश्रित्य नरा राजन् वर्तेयुर्यथासुखम्। अनाथास्तप्यमानाश्च दस्युभिः परिपीडिताः॥ ३९ ॥ तमेव पूजयेयुस्ते प्रीत्या स्वमिव बान्धवम्। अभीरभीक्ष्णं कौरव्य कर्ता सन्मानमर्हति॥ ४० ॥

डाकुओंसे पीड़ित होकर कष्ट पाते हुए अनाथ मनुष्यगण जिसकी शरणमें जाकर सुखपूर्वक रह सकें, उसीको अपने बन्धु-बान्धवके समान मानकर बड़ी प्रसन्नताके साथ उसका आदर-सत्कार करना उनके लिये उचित है; क्योंकि कुरुनन्दन! जो निर्भय होकर बारंबार दूसरोंका संकट निवारण कर सके, वही राजोचित सम्मान पानेके योग्य है॥ ३९-४० ॥

किं तैर्येऽनडुहो नोह्याः किं धेन्वा वाप्यदुग्धया। वन्ध्यया भार्यया कोऽर्थः कोऽर्थो राज्ञाप्यरक्षता॥ ४१ ॥

जो बोझ न ढो सकें, ऐसे बैलोंसे क्या लाभ? जो दूध न दे, ऐसी गाय किस कामकी? जो बाँझ हो, ऐसी स्त्रीसे क्या प्रयोजन है? और जो रक्षा न कर सके, ऐसे राजासे क्या लाभ है?॥ ४१ ॥

यथा दारुमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः। यथा ह्यनर्थः षण्ढो वा पार्थ क्षेत्रं यथोषरम्॥ ४२ ॥ एवं विप्रोऽनधीयानो राजा यश्च न रक्षिता। मेघो न वर्षते यश्च सर्वथा ते निरर्थकाः॥ ४३ ॥

कुन्तीनन्दन! जैसे काठका हाथी, चमड़ेका हिरन, हिजड़ा मनुष्य, ऊसर खेत तथा वर्षा न करनेवाला बादल—ये सब के सब व्यर्थ हैं, उसी प्रकार अपढ़ ब्राह्मण तथा रक्षा न करनेवाला राजा भी सर्वथा निरर्थक हैं॥

नित्यं यस्तु सतो रक्षेदसतःश्च निवर्तयेत्। स एव राजा कर्तव्यस्तेन सर्वमिदं धृतम्॥ ४४ ॥

जो सदा सत्पुरुषोंकी रक्षा करे तथा दुष्टोंको दण्ड देकर दुष्कर्म करनेसे रोके, उसे ही राजा बनाना चाहिये; क्योंकि उसीके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् सुरक्षित होता है॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अष्टसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७८ ॥

अध्याय (पृष्ठ 537)

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एकोनाशीतितमोऽध्यायः

ऋत्विजोंके लक्षण, यज्ञ और दक्षिणाका महत्त्व तथा तपकी श्रेष्ठता

युधिष्ठिर उवाच

क्वसमुत्थाः कथंशीला ऋत्विजः स्युः पितामह ।
कथंविधाश्च राजेन्द्र तद् ब्रूहि वदतां वर ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— राजेन्द्र! वक्ताओंमें श्रेष्ठ पितामह! ऋत्विजोंकी उत्पत्ति किस निमित्तसे हुई है? उनके स्वभाव कैसे होने चाहिये? तथा वे किस-किस प्रकारके होते हैं? मुझे ये सब बातें बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

प्रतिकर्म पराचार ऋत्विजां स्म विधीयते ।
छन्दः सामादि विज्ञाय द्विजानां श्रुतमेव च ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! जो ब्राह्मण छन्दःशास्त्र, ‘ऋक्’, ‘साम’ और ‘यजुः’ नामक तीनों वेद तथा ऋषियोंके रचे हुए स्मृति और दर्शनशास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त कर चुके हैं, वे ही ‘ऋत्विज्’ होने योग्य हैं, उन ऋत्विजोंका मुख्य आचार है—राजाके लिये ‘शान्ति’ ‘पौष्टिक’ आदि कर्मोंका अनुष्ठान ॥ २ ॥

ये त्वेकरतयो नित्यं धीराश्च प्रियवादिनः ।
परस्परस्य सुहृदः समन्तात् समदर्शिनः ॥ ३ ॥
जो सदा एकमात्र यजमानके ही हित-साधनमें तत्पर रहनेवाले, धीर, प्रियवादी, एक-दूसरेके सुहृद् तथा सब ओर समान दृष्टि रखनेवाले हैं, वे ही ऋत्विज् होनेके योग्य हैं ॥ ३ ॥

अनृशंसाः सत्यवाक्या अकुसीदा अथार्जवः ।
अद्रोहोऽनभिमानश्च ह्रीस्तितिक्षा दमः शमः ॥ ४ ॥
यस्मिन्नेतानि दृश्यन्ते स पुरोहित उच्यते ।
जिनमें क्रूरताका सर्वथा अभाव है, जो सत्यभाषण करनेवाले और सरल हैं, जो व्याज नहीं लेते तथा जिनमें द्रोह और अभिमानका अभाव है, जिनमें लज्जा, सहनशीलता, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह आदि गुण देखे जाते हैं, वे ही पुरोहित कहलाते हैं ॥ ४ १/२ ॥

धीमान् सत्यधृतिर्दान्तो भूतानामविहिंसकः ।
अकामद्वेषसंयुक्तस्त्रिभिः शुक्लैः समन्वितः ॥ ५ ॥
अहिंसको ज्ञानतृप्तः स ब्रह्मासनमर्हति ।

एते महर्त्विजस्तात सर्वे मान्या यथार्हतः ॥ ६ ॥ इसी तरह जो बुद्धिमान्, सत्यको धारण करने-वाला, इन्द्रिय संयमी, किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनेवाला तथा राग-द्वेष आदि दोषोंसे दूर रहनेवाला है, जिसके शास्त्रज्ञान, सदाचार और कुल—ये तीनों अत्यन्त शुद्ध एवं निर्दोष हैं; जो अहिंसक और ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त है, वही ब्रह्माके आसनपर बैठनेका अधिकारी है। तात! ये सभी महान् ऋत्विज् यथायोग्य सम्मानके पात्र हैं ॥ ५-६ ॥

युधिष्ठिर उवाच

यदिदं वेदवचनं दक्षिणासु विधीयते ।
इदं देयमिदं देयं न क्वचिद् व्यवतिष्ठते ॥ ७ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**भारत! यह जो यज्ञसम्बन्धी दक्षिणाके विषयमें वेदवाक्य उपलब्ध होता है कि 'यह भी देना चाहिये, यह भी देना चाहिये' यह वाक्य किसी सीमित वस्तुपर अवलम्बित नहीं है ॥ ७ ॥

नेदं प्रतिधनं शास्त्रमापद्धर्मानुशास्त्रतः ।
आज्ञा शास्त्रस्य घोरेयं न शक्तिं समवेक्षते ॥ ८ ॥
अतः दक्षिणामें दिये जानेवाले धनके विषयमें जो यह शास्त्र-वचन है, यह आपत्कालिक धर्मशास्त्रके अनुसार नहीं है। मेरी समझमें तो यह शास्त्रकी आज्ञा भयंकर है; क्योंकि यह इस बातकी ओर नहीं देखती कि दातामें कितने दानकी शक्ति है ॥ ८ ॥

श्रद्धावता च यष्टव्यमित्येषा वैदिकी श्रुतिः ।
मिथ्योपेतस्य यज्ञस्य किमु श्रद्धा करिष्यति ॥ ९ ॥
दूसरी ओर वेदकी यह आज्ञा भी सुनी जाती है कि प्रत्येक श्रद्धालु पुरुषको यज्ञ करना चाहिये। यदि दरिद्र श्रद्धाके बलपर यज्ञमें प्रवृत्त हो और उचित दक्षिणा न दे सके तो वह यज्ञ मिथ्या भावसे युक्त होगा; उस दशामें उसकी न्यूनताकी पूर्ति श्रद्धा कैसे कर सकेगी? ॥ ९ ॥

भीष्म उवाच

न वेदानां परिभवान्न शाठ्येन न मायया ।
कश्चिन्महदवाप्नोति मा तेऽभूद् बुद्धिरीदृशी ॥ १० ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! वेदोंकी निन्दा करनेसे, शठतापूर्ण बर्तावसे तथा छल-कपटसे कोई भी महान् पद नहीं पाता है; अतः तुम्हारी बुद्धि ऐसी न हो ॥ १० ॥

यज्ञाङ्गं दक्षिणा तात वेदानां परिबृंहणम् ।
न यज्ञा दक्षिणाहीनास्तारयन्ति कथंचन ॥ ११ ॥
तात! दक्षिणा यज्ञोंका अङ्ग है। वही वेदोक्त यज्ञोंका विस्तार एवं उनमें न्यूनताकी पूर्ति करनेवाली है। दक्षिणाहीन यज्ञ किसी प्रकार भी यजमानका उद्धार नहीं कर

सकते ॥ ११ ॥ शक्तिस्तु पूर्णपात्रेण सम्मिता न समाभवत् । अवश्यं तात यष्टव्यं त्रिभिर्वर्णैर्यथाविधि ॥ १२ ॥ जहाँ धनी और दरिद्रकी शक्तिका प्रश्न है, उधर भी शास्त्रकी दृष्टि है ही। दोनोंके लिये समान दक्षिणा नहीं रखी गयी है। (दरिद्रकी) शक्तिको पूर्णपात्रसे मापा गया है। अर्थात् जहाँ धनीके लिये बहुत धन देनेका विधान है, वहाँ दरिद्रके लिये एक पूर्णपात्र ही दक्षिणामें देनेका विधान कर दिया है; अतः तात! ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंके लोगोंको अवश्य ही विधिपूर्वक यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ १२ ॥ सोमो राजा ब्राह्मणानामित्येषा वैदिकी स्थितिः । तं च विक्रेतुमिच्छन्ति न वृथा वृत्तिरिष्यते ॥ १३ ॥ वेदोंका यह सिद्धान्त है कि सोम ब्राह्मणोंका राजा है; परंतु यज्ञके लिये ब्राह्मणलोग उसे भी बेच देनेकी इच्छा रखते हैं। जहाँ यज्ञ आदि कोई अनिवार्य कारण उपस्थित न हो वहाँ व्यर्थ ही उदरपूर्तिके लिये सोमरसका विक्रय अभीष्ट नहीं है ॥ १३ ॥ तेन क्रीतेन यज्ञेन ततो यज्ञः प्रतायते । इत्येवं धर्मतो ध्यातमृषिभिर्धर्मचारिभिः ॥ १४ ॥ दक्षिणाद्वारा उस सोमरसके साथ खरीद किये हुए यज्ञ-साधनोंसे यजमानके यज्ञका विस्तार होता है। धर्मका आचरण करनेवाले ऋषियोंने इस विषयमें धर्मके अनुसार ऐसा ही विचार व्यक्त किया है ॥ १४ ॥ पुमान् यज्ञश्च सोमश्च न्यायवृत्तो यदा भवेत् । अन्यायवृत्तः पुरुषो न परस्य न चात्मनः ॥ १५ ॥ यज्ञकर्ता पुरुष, यज्ञ और सोमरस—ये तीनों जब न्याय-सम्पन्न होते हैं तब यज्ञका यथार्थरूपसे सम्पादन होता है। अन्यायपरायण पुरुष न दूसरेका भला कर सकता है, न अपना ही ॥ १५ ॥ शरीरवृत्तमास्थाय इत्येषा श्रूयते श्रुतिः । नातिसम्यक् प्रणीतानि ब्राह्मणानां महात्मनाम् ॥ १६ ॥ शरीर-निर्वाहमात्रके लिये धन प्राप्त करके यज्ञमें प्रवृत्त हुए महामनस्वी ब्राह्मणोंद्वारा जो यज्ञ सम्पादित होते हैं, वे भी हिंसा आदि दोषोंसे युक्त होनेपर उत्तम फल नहीं देते हैं, ऐसा श्रुतिका सिद्धान्त सुननेमें आता है ॥ तपो यज्ञादपि श्रेष्ठमित्येषा परमा श्रुतिः । तत् ते तपः प्रवक्ष्यामि विद्वंस्तदपि मे शृणु ॥ १७ ॥ अतः यज्ञकी अपेक्षा भी तप श्रेष्ठ है, यह वेदका परम उत्तम वचन है। विद्वान् युधिष्ठिर! मैं तुम्हें तपका स्वरूप बताता हूँ, तुम मुझसे उसके विषयमें सुनो ॥ १७ ॥ अहिंसा सत्यवचनमानृशंस्यं दमो घृणा ।

एतत् तपो विदुर्धीरा न शरीरस्य शोषणम् ॥ १८ ॥
किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, सत्य बोलना, क्रूरताको त्याग देना, मन और इन्द्रियोंको संयममें रखना तथा सबके प्रति दयाभाव बनाये रखना—इन्हींको धीर पुरुषोंने तप माना है। केवल शरीरको सुखाना ही तप नहीं है ॥ १८ ॥

अप्रामाण्यं च वेदानां शास्त्राणां चाभिलङ्घनम् ।
अव्यवस्था च सर्वत्र तद् वै नाशनमात्मनः ॥ १९ ॥
वेदको अप्रामाणिक बताना, शास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन करना तथा सर्वत्र अव्यवस्था पैदा करना—ये सब दुर्गुण अपना ही नाश करनेवाले हैं ॥ १९ ॥

निबोध देवहोतॄणां विधानं पार्थ यादृशम् ।
चित्तिः स्रुक् चित्तमाज्यं च पवित्रं ज्ञानमुत्तमम् ॥ २० ॥
कुन्तीनन्दन! दैवी सम्पदायुक्त होताओंके यज्ञ-सम्बन्धी उपकरण जिस प्रकारके होते हैं, उन्हें सुनो। उनके सहायक चित्ति ही स्रुक् है, चित्त ही आज्य (घी) है और उत्तम ज्ञान ही पवित्री है ॥ २० ॥

सर्वं जिह्मं मृत्युपदमार्जवं ब्रह्मणः पदम् ।
एतावान् ज्ञानविषयः किं प्रलापः करिष्यति ॥ २१ ॥
सारी कुटिलता मृत्युका स्थान है और सरलता परब्रह्मकी प्राप्तिका स्थान है। इतना ही ज्ञानका विषय है और सब प्रलापमात्र है, वह किस काम आयेगा? ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥

राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन

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अशीतितमोऽध्यायः

राजाके लिये मित्र और अमित्रकी पहचान तथा उन सबके साथ नीतिपूर्ण बर्तावका और मन्त्रीके लक्षणोंका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

यदप्यल्पतरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम् ।
पुरुषेणासहायेन किमु राज्ञा पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जो छोटे-से-छोटा काम है, उसे भी बिना किसीकी सहायताके अकेले मनुष्यके द्वारा किया जाना कठिन हो जाता है। फिर राजा दूसरेकी सहायताके बिना महान् राज्यका संचालन कैसे कर सकता है? ॥ १ ॥

किंशीलः किंसमाचारो राज्ञोऽथ सचिवो भवेत् ।
कीदृशे विश्वसेद् राजा कीदृशे न च विश्वसेत् ॥ २ ॥
अतः राजाकी सहायताके लिये जो सचिव (मन्त्री) हो, उसका स्वभाव और आचरण कैसा होना चाहिये? राजा कैसे मन्त्रीपर विश्वास करे और कैसे पर न करे? ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

चतुर्विधानि मित्राणि राज्ञां राजन् भवन्त्युत ।
सहार्थो भजमानश्च सहजः कृत्रिमस्तथा ॥ ३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! राजाके सहायक या मित्र चार प्रकारके होते हैं—१-सहार्थ २-भजमान ३-सहज और ४-कृत्रिम* ॥ ३ ॥

धर्मात्मा पञ्चमश्चापि मित्रं नैकस्य न द्वयोः ।
यतो धर्मस्ततो वा स्याद् धर्मस्थो वा ततो भवेत् ॥ ४ ॥
यस्तस्यार्थो न रोचेत न तं तस्य प्रकाशयेत् ।
धर्माधर्मेण राजानश्चरन्ति विजिगीषवः ॥ ५ ॥
इनके सिवा, राजाका एक पाँचवाँ मित्र धर्मात्मा पुरुष होता है, वह किसी एकका पक्षपाती नहीं होता और न दोनों पक्षोंसे वेतन लेकर कपटपूर्वक दोनोंका ही मित्र बना रहता है। जिस पक्षमें धर्म होता है, उसी ओर वह भी हो जाता है अथवा जो धर्मपरायण राजा है, वही उसका आश्रय ग्रहण कर लेता है। ऐसे धर्मात्मा पुरुषको जो कार्य न रुचे, वह उसके सामने नहीं प्रकाशित करना चाहिये; क्योंकि विजयकी इच्छा रखनेवाले राजा कभी धर्ममार्गसे चलते हैं और कभी अधर्ममार्गसे ॥ ४-५ ॥

चतुर्णां मध्यमौ श्रेष्ठौ नित्यं शङ्क्यौ तथापरौ ।
सर्वे नित्यं शङ्कितव्याः प्रत्यक्षं कार्यमात्मनः ॥ ६ ॥

उपर्युक्त चार प्रकारके मित्रोंमेंसे भजमान और सहज—ये बीचवाले दो मित्र श्रेष्ठ समझे जाते हैं, किंतु शेष दो की ओरसे सदा सशङ्क रहना चाहिये। वास्तवमें तो अपने कार्यको ही दृष्टिमें रखकर सभी प्रकारके मित्रोंसे सदा सतर्क रहना चाहिये ॥ ६ ॥ न हि राज्ञा प्रमादो वै कर्तव्यो मित्ररक्षणे । प्रमादिनं हि राजानं लोकाः परिभवन्त्युत ॥ ७ ॥ राजाको अपने मित्रोंकी रक्षामें कभी असावधानी नहीं करनी चाहिये; क्योंकि असावधान राजाका सभी लोग तिरस्कार करते हैं ॥ ७ ॥ असाधुः साधुतामेति साधुर्भवति दारुणः । अरिश्च मित्रं भवति मित्रं चापि प्रदुष्यति ॥ ८ ॥ अनित्यचित्तः पुरुषस्तस्मिन् को जातु विश्वसेत् । तस्मात्प्रधानं यत् कार्यं प्रत्यक्षं तत् समाचरेत् ॥ ९ ॥ बुरा मनुष्य भला और भला मनुष्य बुरा हो जाया करता है। शत्रु भी मित्र बन जाता है और मित्र भी बिगड़ जाता है; क्योंकि मनुष्यका चित्त सदैव एक-सा नहीं रहता। अतः उसपर किसी भी समय कोई कैसे विश्वास करेगा? इसलिये जो प्रधान कार्य हो, उसे अपनी आँखोंके सामने पूरा कर देना चाहिये ॥ ८-९ ॥ एकान्तेन हि विश्वासः कृत्स्नो धर्मार्थनाशकः । अविश्वासश्च सर्वत्र मृत्युना च विशिष्यते ॥ १० ॥ किसीपर भी किया हुआ अत्यन्त विश्वास धर्म और अर्थ दोनोंका नाश करनेवाला होता है और सर्वत्र अविश्वास करना भी मृत्युसे बढ़कर है ॥ १० ॥ अकालमृत्युर्विश्वासो विश्वसन् हि विपद्यते । यस्मिन् करोति विश्वासमिच्छतस्तस्य जीवति ॥ ११ ॥ दूसरोंपर किया हुआ पूरा-पूरा विश्वास अकालमृत्युके समान है; क्योंकि अधिक विश्वास करनेवाला मनुष्य भारी विपत्तिमें पड़ जाता है। वह जिसपर विश्वास करता है, उसीकी इच्छापर उसका जीवन निर्भर होता है ॥ तस्माद् विश्वसितव्यं च शङ्कितव्यं च केषुचित् । एषा नीतिगतिस्तात लक्ष्या चैव सनातनी ॥ १२ ॥ इसलिये राजाको कुछ चुने हुए लोगोंपर विश्वास तो करना चाहिये, पर उनकी ओरसे सशङ्क भी रहना चाहिये। तात! यही सनातन नीतिकी गति है। इसे सदा दृष्टिमें रखना चाहिये ॥ १२ ॥ यं मन्येत ममाभावादिममर्थागमं स्पृशेत् । नित्यं तस्माच्छङ्कितव्यममित्रं तद् विदुर्बुधाः ॥ १३ ॥ ‘अमुक व्यक्ति मेरे मरनेके बाद राजा हो सकता है और धनकी यह सारी आय अपने हाथमें ले सकता है’ ऐसी मान्यता जिसके विषयमें हो (वह भाई, पड़ोसी या पुत्र ही क्यों न

हो) उससे सदा सतर्क ही रहना चाहिये; क्योंकि विद्वान् पुरुष उसे शत्रु ही समझते हैं ॥ १३ ॥ यस्य क्षेत्रादप्युदकं क्षेत्रमन्यस्य गच्छति । न तत्रानिच्छतस्तस्य भिद्येरन् सर्वसेतवः ॥ १४ ॥ वर्षा आदिका जल जिसके खेतसे होकर दूसरेके खेतमें जाता है, उसकी इच्छाके बिना उसके खेतकी आड़ या मेड़को नहीं तोड़ना चाहिये ॥ १४ ॥ तथैवात्युदकाद् भीतस्तस्य भेदनमिच्छति । यमेवंलक्षणं विद्यात् तममित्रं विनिर्दिशेत् ॥ १५ ॥ इसी प्रकार आड़ न टूटनेसे जिसके खेतमें अधिक जल भर जाता है, वह भयभीत हो उस जलको निकालनेके लिये खेतकी आड़को तोड़ डालना चाहता है। जिसमें ऐसे लक्षण जान पड़ें, उसीको शत्रु समझो, अर्थात् जो अपने राज्यकी सीमाका रक्षक है, वह यदि सीमा तोड़ दे तो अपने राज्यपर भय आ सकता है; अतः उसे भी शत्रु ही समझना चाहिये ॥ १५ ॥ यस्तु वृद्ध्या न तृप्येत क्षये दीनतरो भवेत् । एतदुत्तममित्रस्य निमित्तमिति चक्षते ॥ १६ ॥ जो राजाकी उन्नतिसे कभी तृप्त न हो, उत्तरोत्तर उसकी अधिक उन्नति ही चाहता रहे और अवनति होनेपर बहुत दुखी हो जाय, यही उत्तम मित्रकी पहचान बतायी गयी है ॥ १६ ॥ यन्मन्येत ममाभावादस्याभावो भवेदिति । तस्मिन् कुर्वीत विश्वासं यथा पितरि वै तथा ॥ १७ ॥ जिसके विषयमें ऐसी मान्यता हो कि मेरे न रहनेपर यह भी नहीं रहेगा, उसपर पिताके समान विश्वास करना चाहिये ॥ १७ ॥ तं शक्त्या वर्धमानश्च सर्वतः परिबृंहयेत् । नित्यं क्षताद् वारयति यो धर्मेष्वपि कर्मसु ॥ १८ ॥ क्षताद् भीतं विजानीयादुत्तमं मित्रलक्षणम् । ये तस्य क्षतमिच्छन्ति ते तस्य रिपवः स्मृताः ॥ १९ ॥ और जब अपनी वृद्धि हो तो यथाशक्ति उसे भी सब ओरसे समृद्धिशाली बनावे। जो धर्मके कार्योंमें भी राजाको सदा हानिसे बचानेका प्रयत्न करता है तथा उसकी हानिसे भयभीत हो उठता है, उसके इस स्वभावको ही उत्तम मित्रका लक्षण समझना चाहिये। जो राजाकी हानि और विनाशकी इच्छा रखते हैं, वे उसके शत्रु माने गये हैं ॥ १८-१९ ॥ व्यसनान्नित्यभीतो यः समृद्ध्या यो न दुष्यति । यत् स्यादेवंविधं मित्रं तदात्मसममुच्यते ॥ २० ॥

जो मित्रपर विपत्ति आनेकी सम्भावनासे सदा डरता रहता है और उसकी उन्नति देखकर मन-ही-मन ईर्ष्या नहीं करता है, ऐसे मित्रको अपने आत्माके समान बताया गया है॥ २०॥

रूपवर्णस्वरोपेतस्तितिक्षुरनसूयकः । कुलीनः शीलसम्पन्नः स ते स्यात् प्रत्यनन्तरः ॥ २१ ॥

जिसका रूप-रंग सुन्दर और स्वर मीठा हो, जो क्षमाशील हो, निन्दक न हो तथा कुलीन और शीलवान् हो, वह तुम्हारा प्रधान सचिव होना चाहिये ॥ २१ ॥

मेधावी स्मृतिमान् दक्षः प्रकृत्या चानृशंस्यवान् । यो मानितोऽमानितो वा न च दुष्येत् कदाचन ॥ २२ ॥ ऋत्विग्वा यदि वाऽऽचार्यः सखा वात्यन्तसंस्तुतः । गृहे वसेदमात्यस्ते स स्यात् परमपूजितः ॥ २३ ॥

जिसकी बुद्धि अच्छी और स्मरणशक्ति तीव्र हो, जो कार्यसाधनमें कुशल और स्वभावतः दयालु हो तथा कभी मान या अपमान हो जानेपर जिसके हृदयमें द्वेष या दुर्भाव नहीं पैदा होता हो, ऐसा मनुष्य यदि ऋत्विज्, आचार्य अथवा अत्यन्त प्रशंसित मित्र हो तो वह मन्त्री बनकर तुम्हारे घरमें रहे तथा तुम्हें उसका विशेष आदर सम्मान करना चाहिये ॥ २२-२३ ॥

स ते विद्यात् परं मन्त्रं प्रकृतिं चार्थधर्मयोः । विश्वासस्ते भवेत् तत्र यथा पितरि वै तथा ॥ २४ ॥

वह तुम्हारे उत्तम-से-उत्तम गोपनीय मन्त्र तथा धर्म और अर्थकी प्रकृति* को भी जाननेका अधिकारी है। उसपर तुम्हारा वैसा ही विश्वास होना चाहिये, जैसा कि एक पुत्रका पितापर होता है ॥ २४ ॥

नैव द्वौ न त्रयः कार्या न मृष्येरन् परस्परम् । एकार्थे ह्येव भूतानां भेदो भवति सर्वदा ॥ २५ ॥

एक कामपर एक ही व्यक्तिको नियुक्त करना चाहिये, दो या तीनको नहीं; क्योंकि वे आपसमें एक-दूसरेको सहन नहीं कर पाते; एक कार्यपर नियुक्त हुए अनेक व्यक्तियोंमें प्रायः सदा मतभेद हो ही जाता है ॥

कीर्तिप्रधानो यस्तु स्याद् यश्च स्यात् समये स्थितः । समर्थान् यश्च न द्वेष्टि नानर्थान् कुरुते च यः ॥ २६ ॥ यो न कामाद् भयाल्लोभात् क्रोधाद् वा धर्ममुत्सृजेत् । दक्षः पर्याप्तवचनः स ते स्यात् प्रत्यनन्तरः ॥ २७ ॥

जो कीर्तिको प्रधानता देता है और मर्यादाके भीतर स्थित रहता है, जो सामर्थ्यशाली पुरुषोंसे द्वेष और अनर्थ नहीं करता है, जो कामनासे, भयसे, लोभसे अथवा क्रोधसे भी

धर्मका त्याग नहीं करता, जिसमें कार्यकुशलता तथा आवश्यकताके अनुरूप बातचीत करनेकी पूरी योग्यता हो, वही पुरुष तुम्हारा प्रधानमन्त्री होना चाहिये ॥ २६-२७ ॥
कुलीनः शीलसम्पन्नस्तितिक्षुरविकत्थनः ।
शूरश्चार्यश्च विद्वांश्च प्रतिपत्तिविशारदः ॥ २८ ॥
एते ह्यमात्याः कर्तव्याः सर्वकर्मस्ववस्थिताः ।
पूजिताः संविभक्ताश्च सुसहायाः स्वनुष्ठिताः ॥ २९ ॥
जो कुलीन, शीलसम्पन्न, सहनशील, झूठी आत्मप्रशंसा न करनेवाले, शूरवीर, श्रेष्ठ, विद्वान् तथा कर्तव्य-अकर्तव्यको समझनेमें कुशल हों, उन्हें तुम्हें मन्त्रिपदपर प्रतिष्ठित करना चाहिये। वे तुम्हारे सभी कार्योंमें नियुक्त होनेयोग्य हैं। उन्हें तुम सत्कारपूर्वक सुख और सुविधाकी वस्तुएँ देना। इस प्रकार आदरपूर्वक अपनाये जानेपर वे तुम्हारे अच्छे सहायक सिद्ध होंगे ॥ २८-२९ ॥
कृत्स्नमेते विनिक्षिप्ताः प्रतिरूपेषु कर्मसु ।
युक्ता महत्सु कार्येषु श्रेयांस्युत्थापयन्त्युत ॥ ३० ॥
इन्हें इनकी योग्यताके अनुरूप कर्मोंमें पूरा अधिकार देकर लगा दिया जाय तो ये बड़े-बड़े कार्योंके साधनमें तत्पर हो राजाके लिये कल्याणकी वृद्धि कर सकते हैं ॥
एते कर्माणि कुर्वन्ति स्पर्धमाना मिथः सदा ।
अनुतिष्ठन्ति चैवार्थमाचक्षाणाः परस्परम् ॥ ३१ ॥
क्योंकि ये सदा परस्पर होड़ लगाकर कार्य करते हैं और एक-दूसरेसे सलाह लेकर अर्थकी सिद्धिके विषयमें विचार करते रहते हैं ॥ ३१ ॥
ज्ञातिभ्यश्चैव बुद्धयेथा मृत्योरिव भयं सदा ।
उपराजेव राजर्धिं ज्ञातिर्न सहते सदा ॥ ३२ ॥
युधिष्ठिर! तुम अपने कुटुम्बीजनोंसे सदा उसी प्रकार भय मानना, जैसे लोग मृत्युसे डरते रहते हैं। जिस प्रकार पड़ोसी राजा अपने पासके राजाकी उन्नति देख नहीं सकता, उसी प्रकार एक कुटुम्बी दूसरे कुटुम्बीका अभ्युदय कभी नहीं सह सकता ॥ ३२ ॥
ऋजोर्मृदोर्वदान्यस्य ह्रीमतः सत्यवादिनः ।
नान्यो ज्ञातेर्महाबाहो विनाशमभिनन्दति ॥ ३३ ॥
महाबाहो! जो सरल, कोमल स्वभाववाला, उदार, लज्जाशील और सत्यवादी है; ऐसे राजाके विनाशका समर्थन कुटुम्बीके सिवा दूसरा नहीं कर सकता ॥ ३३ ॥
अज्ञातिनोऽपि न सुखा नावज्ञेयास्ततः परम् ।
अज्ञातिमन्तं पुरुषं परे चाभिभवन्त्युत ॥ ३४ ॥
जिसके कुटुम्बी या सगे-सम्बन्धी नहीं हैं, वह भी सुखी नहीं होता; इसलिये कुटुम्बीजनोंकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये। भाई-बन्धु या कुटुम्बीजनोंसे रहित पुरुषको दूसरे लोग दबाते रहते हैं ॥ ३४ ॥

निकृतस्य नरैरन्यैर्ज्ञातिरेव परायणम् ।
नान्यैर्निकारं सहते ज्ञातिर्ज्ञातेः कथञ्चन ॥ ३५ ॥
दूसरोंके दबानेपर उस मनुष्यको उसके सगे भाई-बन्धु ही सहारा देते हैं। दूसरे लोग किसी सजातीय बन्धुका अपमान करें तो जाति-भाई उसको किसी तरह सहन नहीं कर सकते हैं ॥ ३५ ॥

आत्मानमेव जानाति निकृतं बान्धवैरपि ।
तेषु सन्ति गुणाश्चैव नैर्गुण्यं चैव लक्ष्यते ॥ ३६ ॥
यदि सगे-सम्बन्धी भी किसी पुरुषका अपमान करें तो उसकी जातिके लोग उसे अपना ही अपमान समझते हैं। इस प्रकार कुटुम्बीजनोंमें गुण भी हैं और अवगुण भी दिखायी देते हैं ॥ ३६ ॥

नाज्ञातिरनुगृह्णाति न चाज्ञातिर्नमस्यति ।
उभयं ज्ञातिवर्गेषु दृश्यते साध्वसाधु च ॥ ३७ ॥
दूसरी जातिका मनुष्य न अनुग्रह करता है, न नमस्कार। इस प्रकार जाति-भाइयोंमें भलाई और बुराई दोनों देखनेमें आती हैं ॥ ३७ ॥

सम्मानयेत् पूजयेच्च वाचा नित्यं च कर्मणा ।
कुर्याच्च प्रियमेतेभ्यो नाप्रियं किञ्चिदाचरेत् ॥ ३८ ॥
राजाका कर्तव्य है कि वह सदा अपने जातीय बन्धुओंका वाणी और क्रियाद्वारा आदर-सत्कार करे। वह प्रतिदिन उनका प्रिय ही करता रहे। कभी कोई अप्रिय कार्य न करे ॥ ३८ ॥

विश्वस्तवदविश्वस्तस्तेषु वर्तेत सर्वदा ।
न हि दोषो गुणो वेति निरूप्यस्तेषु दृश्यते ॥ ३९ ॥
उनपर विश्वास तो न करे; परंतु विश्वास करनेवालेकी ही भाँति सदा उनके साथ बर्ताव करे। उनमें दोष है या गुण इसका निर्णय करनेकी आवश्यकता नहीं दिखायी देती है ॥ ३९ ॥

अस्यैवं वर्तमानस्य पुरुषस्याप्रमादिनः ।
अमित्राः संप्रसीदन्ति तथा मित्रीभवन्त्यपि ॥ ४० ॥
जो पुरुष सदा सावधान रहकर ऐसा बर्ताव करता है, उसके शत्रु भी प्रसन्न हो जाते हैं और उसके साथ मित्रताका बर्ताव करने लगते हैं ॥ ४० ॥

य एवं वर्तते नित्यं ज्ञातिसम्बन्धिमण्डले ।
मित्रेष्वमित्रे मध्यस्थे चिरं यशसि तिष्ठति ॥ ४१ ॥
जो कुटुम्बी, सगे-सम्बन्धी, मित्र, शत्रु तथा मध्यस्थ व्यक्तियोंकी मण्डलीमें सदा इसी नीतिसे व्यवहार करता है, वह चिरकालतक यशस्वी बना रहता है ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८० ॥


* सहार्थ मित्र उनको कहते हैं, जो किसी शर्तपर एक-दूसरेकी सहायताके लिये मित्रता करते हैं। ‘अमुक शत्रुपर हम दोनों मिलकर चढ़ाई करें, विजय होनेपर दोनों उसके राज्यको आधा-आधा बाँट लेंगे’—इत्यादि शर्तें सहार्थ मित्रोंमें होती हैं। जिनके साथ परम्परागत वंशसम्बन्धसे मित्रता हो, वे ‘भजमान’ कहलाते हैं। जन्मसे ही साथ रहनेसे अथवा घनिष्ठ सम्बन्ध होनेके कारण जिनमें परस्पर स्वाभाविक मैत्री हो जाती है वे ‘सहज’ मित्र कहे गये हैं; और धन आदि देकर अपनाये हुए लोग ‘कृत्रिम’ मित्र कहलाते हैं।

* प्रकृतियाँ तीन प्रकारकी बतायी गयी हैं—अर्थप्रकृति, धर्मप्रकृति तथा अर्थ-धर्मप्रकृति। इनमें अर्थ-प्रकृतिके अन्तर्गत आठ वस्तुएँ हैं—खेती, वाणिज्य, दुर्ग, सेतु (पुल), जंगलमें हाथी बाँधनेके स्थान, सोने-चाँदी आदि धातुओंकी खान, कर-ग्रहण और सूने स्थानोंको बसाना। इनके अतिरिक्त जो दुर्गाध्यक्ष, बलाध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, सेनापति, पुरोहित, वैद्य और ज्यौतिषी—ये सात प्रकृतियाँ हैं, इनमेंसे ‘धर्माध्यक्ष’ तो धर्मप्रकृति हैं और शेष छः ‘अर्थ-धर्मप्रकृति’ के अन्तर्गत हैं।

कुटुम्बीजनोंमें दलबंदी होनेपर उस कुलके प्रधान पुरुषको क्या करना चाहिये? इसके विषयमें श्रीकृष्ण और नारदजीका संवाद

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एकाशीतितमोऽध्यायः

कुटुम्बीजनोंमें दलबंदी होनेपर उस कुलके प्रधान पुरुषको क्या करना चाहिये? इसके विषयमें श्रीकृष्ण और नारदजीका संवाद

युधिष्ठिर उवाच

एवमग्राह्यके तस्मिन् ज्ञातिसम्बन्धिमण्डले ।
मित्रेष्वमित्रेष्वपि च कथं भावो विभाव्यते ॥ १ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! यदि सजातीय बन्धुओं और सगे-सम्बन्धियोंके समुदायको पारस्परिक स्पर्धाके कारण वशमें करना असम्भव हो जाय, कुटुम्बीजनोंमें ही यदि दो दल हों तो एकका आदर करनेसे दूसरा दल रुष्ट हो ही जाता है। ऐसी परिस्थितिके कारण यदि मित्र भी शत्रु बन जायँ, तब उन सबके चित्तको किस प्रकार वशमें किया जा सकता है? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
संवादं वासुदेवस्य सुरर्षेर्नारदस्य च ॥ २ ॥

**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इस विषयमें मनीषी पुरुष देवर्षि नारद और भगवान् श्रीकृष्णके भूतपूर्व संवादरूप इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥

वासुदेव उवाच

नासुहृत् परमं मन्त्रं नारदार्हति वेदितुम् ।
अपण्डितो वापि सुहृत् पण्डितो वाप्यनात्मवान् ॥ ३ ॥

**एक समय भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**देवर्षे! जो व्यक्ति सुहृद् न हो, जो सुहृद् तो हो किंतु पण्डित न हो तथा जो सुहृद् और पण्डित तो हो किंतु अपने मनको वशमें न कर सका हो—ये तीनों ही परम गोपनीय मन्त्रणाको सुनने या जाननेके अधिकारी नहीं हैं ॥

स ते सौहृदमास्थाय किञ्चिद् वक्ष्यामि नारद ।
कृत्स्नं बुद्धिबलं प्रेक्ष्य सम्पृच्छेस्त्रिदिवंगम ॥ ४ ॥

स्वर्गमें विचरनेवाले नारदजी! मैं आपके सौहार्दपर भरोसा रखकर आपसे कुछ निवेदन करूँगा। मनुष्य किसी व्यक्तिमें बुद्धि-बलकी पूर्णता देखकर ही उससे कुछ पूछता या जिज्ञासा प्रकट करता है ॥ ४ ॥

दास्यमैश्वर्यवादेन ज्ञातीनां न करोम्यहम् ।

अर्धं भोक्तास्मि भोगानां वाग्दुरुक्तानि च क्षमे ॥ ५ ॥
मैं अपनी प्रभुता प्रकाशित करके जाति-भाइयों, कुटुम्बीजनोंको अपना दास बनाना नहीं चाहता। मुझे जो भोग प्राप्त होते हैं, उनका आधा भाग ही अपने उपभोगमें लाता हूँ, शेष आधा भाग कुटुम्बीजनोंके लिये ही छोड़ देता हूँ। और उनकी कड़वी बातोंको सुनकर भी क्षमा कर देता हूँ ॥ ५ ॥

अरणीमग्निकामो वा मथ्नाति हृदयं मम ।
वाचा दुरुक्तं देवर्षे तन्मे दहति नित्यदा ॥ ६ ॥
देवर्षे! जैसे अग्निको प्रकट करनेकी इच्छावाला पुरुष अरणीकाष्ठका मन्थन करता है, उसी प्रकार इन कुटुम्बीजनोंका कटुवचन मेरे हृदयको सदा मथता और जलाता रहता है ॥ ६ ॥

बलं संकर्षणे नित्यं सौकुमार्यं पुनर्गदे ।
रूपेण मत्तः प्रद्युम्नः सोऽसहायोऽस्मि नारद ॥ ७ ॥
नारदजी! बड़े भाई बलराममें सदा ही असीम बल है; वे उसीमें मस्त रहते हैं। छोटे भाई गदमें अत्यन्त सुकुमारता है (अतः वह परिश्रमसे दूर भागता है); रह गया बेटा प्रद्युम्न, सो वह अपने रूप-सौन्दर्यके अभिमानसे ही मतवाला बना रहता है। इस प्रकार इन सहायकोंके होते हुए भी मैं असहाय हूँ ॥ ७ ॥

अन्ये हि सुमहाभागा बलवन्तो दुरुत्सहाः ।
नित्योत्थानेन सम्पन्ना नारदान्धकवृष्णयः ॥ ८ ॥
नारदजी! अन्धक तथा वृष्णिवंशमें और भी बहुत-से वीर पुरुष हैं, जो महान् सौभाग्यशाली, बलवान् एवं दुःसह पराक्रमी हैं, वे सब-के-सब सदा उद्योगशील बने रहते हैं ॥ ८ ॥

यस्य न स्युर्न वै स स्याद् यस्य स्युः कृत्स्नमेव तत् ।
द्वाभ्यां निवारितो नित्यं वृणोम्येकतरं न च ॥ ९ ॥
ये वीर जिसके पक्षमें न हों, उसका जीवित रहना असम्भव है और जिसके पक्षमें ये चले जायें, वह सारा-का-सारा समुदाय ही विजयी हो जाय। परंतु आहुक और अक्रूरने आपसमें वैमनस्य रखकर मुझे इस तरह अवरुद्ध कर दिया है कि मैं इनमेंसे किसी एकका पक्ष नहीं ले सकता ॥ ९ ॥

स्यातां यस्याहुकाक्रूरौ किं नु दुःखतरं ततः ।
यस्य चापि न तौ स्यातां किं नु दुःखतरं ततः ॥ १० ॥
आपसमें लड़नेवाले आहुक और अक्रूर दोनों ही जिसके स्वजन हों, उसके लिये इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या होगी? और वे दोनों ही जिसके सुहृद् न हों, उसके लिये भी इससे बढ़कर और दुःख क्या हो सकता है? (क्योंकि ऐसे मित्रोंका न रहना भी महान् दुःखदायी होता है) ॥ १० ॥

सोऽहं कितवमातेव द्वयोरपि महामते ।
एकस्य जयमाशंसे द्वितीयस्यापराजयम् ॥ ११ ॥
महामते! जैसे दो जुआरियोंकी एक ही माता एककी जीत चाहती है तो दूसरेकी भी पराजय नहीं चाहती, उसी प्रकार मैं भी इन दोनों सुहृदोंमेंसे एककी विजयकामना करता हूँ तो दूसरेकी भी पराजय नहीं चाहता ॥ ११ ॥
ममैवं क्लिश्यमानस्य नारदोभयतः सदा ।
वक्तुमर्हसि यच्छ्रेयो ज्ञातीनामात्मनस्तथा ॥ १२ ॥
नारदजी! इस प्रकार मैं सदा उभय पक्षका हित चाहनेके कारण दोनों ओरसे कष्ट पाता रहता हूँ। ऐसी दशामें मेरा अपना तथा इन जाति-भाइयोंका भी जिस प्रकार भला हो, वह उपाय आप बतानेकी कृपा करें ॥

नारद उवाच
आपदो द्विविधाः कृष्ण बाह्याश्चाभ्यन्तराश्च ह ।
प्रादुर्भवन्ति वार्ष्णेय स्वकृता यदि वान्यतः ॥ १३ ॥
नारदजीने कहा—वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! आपत्तियाँ दो प्रकारकी होती हैं—एक बाह्य और दूसरी आभ्यन्तर। वे दोनों ही स्वकृत१ और परकृत२-भेदसे दो-दो प्रकारकी होती हैं ॥ १३ ॥
सेयमाभ्यन्तरा तुभ्यमापत् कृच्छ्रा स्वकर्मजा ।
अक्रूरभोजप्रभवा सर्वे ह्येते त्वदन्वयाः ॥ १४ ॥
अक्रूर और आहुकसे उत्पन्न हुई यह कष्टदायिनी आपत्ति जो आपको प्राप्त हुई है, आभ्यन्तर है और अपनी ही करतूतोंसे प्रकट हुई है। ये सभी जिनके नाम आपने गिनाये हैं, आपके ही वंशके हैं ॥ १४ ॥
अर्थहेतोर्हि कामाद् वा वाचा बीभत्सयापि वा ।
आत्मना प्राप्तमैश्वर्यमन्यत्र प्रतिपादितम् ॥ १५ ॥
आपने स्वयं जिस ऐश्वर्यको प्राप्त किया था, उसे किसी प्रयोजनवश या स्वेच्छासे अथवा कटुवचनसे डरकर दूसरेको दे दिया ॥ १५ ॥
कृतमूलमिदानीं तज्ज्ञातिवृन्दं सहायवन् ।
न शक्यं पुनरादातुं वान्तमन्नमिव त्वया ॥ १६ ॥
सहायशाली श्रीकृष्ण! इस समय उग्रसेनको दिया हुआ वह ऐश्वर्य दृढ़मूल हो चुका है। उग्रसेनके साथ जातिके लोग भी सहायक हैं; अतः उगले हुए अन्नकी भाँति आप उस दिये हुए ऐश्वर्यको वापस नहीं ले सकते ॥ १६ ॥
बभूग्रसेनयो राज्यं नाप्तुं शक्यं कथंचन ।
ज्ञातिभेदभयात् कृष्ण त्वया चापि विशेषतः ॥ १७ ॥

श्रीकृष्ण! अक्रूर और उग्रसेनके अधिकारमें गये हुए राज्यको भाई-बन्धुओंमें फूट पड़नेके भयसे अन्यकी तो कौन कहे इतने शक्तिशाली होकर स्वयं भी आप किसी तरह वापस नहीं ले सकते ।। १७ ।। तच्च सिध्येत् प्रयत्नेन कृत्वा कर्म सुदुष्करम् । महाक्षयं व्ययो वा स्याद् विनाशो वा पुनर्भवेत् ।। १८ ।। बड़े प्रयत्नसे अत्यन्त दुष्कर कर्म महान् संहाररूप युद्ध करनेपर राज्यको वापस लेनेका कार्य सिद्ध हो सकता है, परंतु इसमें धनका बहुत व्यय और असंख्य मनुष्योंका पुनः विनाश होगा ।। १८ ।। अनायसेन शस्त्रेण मृदुना हृदयच्छिदा । जिह्वामुद्धर सर्वेषां परिमृज्यानुमृज्य च ।। १९ ।। अतः श्रीकृष्ण! आप एक ऐसे कोमल शस्त्रसे, जो लोहेका बना हुआ न होनेपर भी हृदयको छेद डालनेमें समर्थ है, परिमार्जन³ और अनुमार्जन³ करके उन सबकी जीभ उखाड़ लें—उन्हें मूक बना दें (जिससे फिर कलहका आरम्भ न हो) ।। १९ ।।

वासुदेव उवाच

अनायसं मुने शस्त्रं मृदु विद्यामहं कथम् । येनैषामुद्धरे जिह्वां परिमृज्यानुमृज्य च ।। २० ।। **भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**मुने! बिना लोहेके बने हुए उस कोमल शस्त्रको मैं कैसे जानूँ, जिसके द्वारा परिमार्जन और अनुमार्जन करके इन सबकी जिह्वाको उखाड़ लूँ ।। २० ।।

नारद उवाच

शक्त्यान्नदानं सततं तितिक्षार्जवमार्दवम् । यथार्हप्रतिपूजा च शस्त्रमेतदनायसम् ।। २१ ।। **नारदजीने कहा—**श्रीकृष्ण! अपनी शक्तिके अनुसार सदा अन्नदान करना, सहनशीलता, सरलता, कोमलता तथा यथायोग्य पूजन (आदर-सत्कार) करना—यही बिना लोहेका बना हुआ शस्त्र है ।। २१ ।। ज्ञातीनां वक्तुकामानां कटुकानि लघूनि च । गिरा त्वं हृदयं वाचं शमयस्व मनांसि च ।। २२ ।। जब सजातीय बन्धु आपके प्रति कड़वी तथा ओछी बातें कहना चाहें, उस समय आप मधुर वचन बोलकर उनके हृदय, वाणी तथा मनको शान्त कर दें ।। नामहापुरुषः कश्चिन्नानात्मा नासहायवान् । महतीं धुरमाधत्ते तामुद्यम्योरसा वह ।। २३ ।।

जो महापुरुष नहीं है, जिसने अपने मनको वशमें नहीं किया है तथा जो सहायकोंसे सम्पन्न नहीं है, वह कोई भारी भार नहीं उठा सकता। अतः आप ही इस गुरुतर भारको हृदयसे उठाकर वहन करें।। २३ ।।

सर्व एव गुरुं भारमनड्‌वान् वहते समे । दुर्गे प्रतीतः सुगवो भारं वहति दुर्वहम् ॥ २४ ॥ समतल भूमिपर सभी बैल भारी भार वहन कर लेते हैं; परंतु दुर्गम भूमिपर कठिनाईसे वहन करनेयोग्य गुरुतर भारको अच्छे बैल ही ढोते हैं।। २४ ।।

भेदाद् विनाशः संघानां संघमुख्योऽसि केशव । यथा त्वां प्राप्य नोत्सीदेदयं संघस्तथा कुरु ॥ २५ ॥ केशव! आप इस यादवसंघके मुखिया हैं। यदि इसमें फूट हो गयी तो इस समूचे संघका विनाश हो जायगा; अतः आप ऐसा करें जिससे आपको पाकर इस संघका—इस यादवगणतन्त्र राज्यका मूलोच्छेद न हो जाय ।। २५ ।।

नान्यत्र बुद्धिक्षान्तिभ्यां नान्यत्रेन्द्रियनिग्रहात् । नान्यत्र धनसंत्यागाद् गणः प्राज्ञेऽवतिष्ठते ॥ २६ ॥ बुद्धि, क्षमा और इन्द्रिय-निग्रहके बिना तथा धन वैभवका त्याग किये बिना कोई गण अथवा संघ किसी बुद्धिमान् पुरुषकी आज्ञाके अधीन नहीं रहता है ।।

धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वपक्षोद्भावनं सदा । ज्ञातीनामविनाशः स्याद् यथा कृष्ण तथा कुरु ॥ २७ ॥ श्रीकृष्ण! सदा अपने पक्षकी ऐसी उन्नति होनी चाहिये जो धन, यश तथा आयुकी वृद्धि करनेवाली हो और कुटुम्बीजनोंमेंसे किसीका विनाश न हो। यह सब जैसे भी सम्भव हो, वैसा ही कीजिये ।। २७ ।।

आयत्यां च तदात्वे च न तेऽस्त्यविदितं प्रभो । षाड्गुण्यस्य विधानेन यात्रायानविधौ तथा ॥ २८ ॥ प्रभो! संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय—इन छहों गुणोंके यथासमय प्रयोगसे तथा शत्रुपर चढ़ाई करनेके लिये यात्रा करनेपर वर्तमान या भविष्यमें क्या परिणाम निकलेगा? यह सब आपसे छिपा नहीं है ।। २८ ।।

यादवाः कुकुरा भोजाः सर्वे चान्धकवृष्णयः । त्वय्यासक्ता महाबाहो लोका लोकेश्वराश्च ये ॥ २९ ॥ उपासते हि त्वद्बुद्धिमृषयश्चापि माधव । महाबाहु माधव! कुकुर, भोज, अन्धक और वृष्णिवंशके सभी यादव आपमें प्रेम रखते हैं। दूसरे लोग और लोकेश्वर भी आपमें अनुराग रखते हैं। औरोंकी तो बात ही क्या है? बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी आपकी बुद्धिका आश्रय लेते हैं ।। २९ १/२ ।।

त्वं गुरुः सर्वभूतानां जानीषे त्वं गतागतम् ।