भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 534, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 534

ये तत्र युद्धं कुर्वन्ति त्यक्त्वा जीवितमात्मनः । ब्राह्मणान् परिरक्षन्तो धर्ममात्मानमेव च ॥ २६ ॥ मनस्विनो मन्युमन्तः पुण्यश्लोका भवन्ति ते । ब्राह्मणार्थं हि सर्वेषां शस्त्रग्रहणमिष्यते ॥ २७ ॥ जब ब्राह्मणकी शक्ति मन्द पड़ जाय, क्षत्रियका पराक्रम भी दुर्बल हो जाय और सभी वर्णोंके लोग सर्वथा ब्राह्मणोंसे दुर्भाव रखने लगें, उस समय जो लोग ब्राह्मणोंकी, धर्मकी तथा अपने आपकी रक्षाके लिये प्राणोंकी परवा न करके दुष्टोंके साथ क्रोधपूर्वक युद्ध करते हैं, उन मनस्वी पुरुषोंका पवित्र यश सब ओर फैल जाता है; क्योंकि ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये सबको शस्त्र ग्रहण करनेका अधिकार है ॥ २६–२७ ॥

अतिस्विष्टमधीतानां लोकानतितपस्विनाम् । अनाशनाग्न्योर्विशतां शूरा यान्ति परां गतिम् ॥ २८ ॥ अतिमात्रामें यज्ञ, वेदाध्ययन, तपस्या और उपवासव्रत करनेवालोंको तथा आत्मशुद्धिके लिये अग्निप्रवेश करनेवाले लोगोंको जिन लोकोंकी प्राप्ति होती है, उनसे भी उत्तम लोक ब्राह्मणके लिये प्राण देनेवाले शूरवीरोंको प्राप्त होते हैं ॥ २८ ॥

ब्राह्मणस्त्रिषु वर्णेषु शस्त्रं गृह्णन्न दुष्यति । एवमेवात्मनस्त्यागान्नान्यं धर्मं विदुर्जनाः ॥ २९ ॥ ब्राह्मण भी यदि तीनों वर्णोंकी रक्षाके लिये शस्त्र ग्रहण करे तो उसे दोष नहीं लगता। विद्वान् पुरुष इस प्रकार युद्धमें अपने शरीरके त्यागसे बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं मानते हैं ॥ २९ ॥

तेभ्यो नमश्च भद्रं च ये शरीराणि जुह्वते । ब्रह्मद्विषो नियच्छन्तस्तेषां नोऽस्तु सलोकता । ब्रह्मलोकजितः स्वर्ग्यान् वीरांस्तान् मनुरब्रवीत् ॥ ३० ॥ जो लोग ब्राह्मणोंसे द्वेष करनेवाले दुराचारियोंको दबानेके लिये युद्धकी ज्वालामें अपने शरीरकी आहुति दे डालते हैं, उन वीरोंको नमस्कार है, उनका कल्याण हो। हम लोगोंको उन्हींके समान लोक प्राप्त हो। मनुजीने कहा है कि 'वे स्वर्गीय शूरवीर ब्रह्मलोकपर विजय पा जाते हैं' ॥

यथाश्वमेधावभृथे स्नाताः पूता भवन्त्युत । दुष्कृतस्य प्रणाशेन ततः शस्त्रहता रणे ॥ ३१ ॥ जैसे अश्वमेध यज्ञके अन्तमें अवभृथस्नान करनेवाले मनुष्य पापरहित एवं पवित्र हो जाते हैं, उसी प्रकार युद्धमें शस्त्रोंद्वारा मारे गये वीर अपने पाप नष्ट हो जानेके कारण पवित्र हो जाते हैं ॥ ३१ ॥

भवत्यधर्मो धर्मो हि धर्माधर्मावुभावपि । कारणाद् देशकालस्य देशकालः स तादृशः ॥ ३२ ॥