भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 563, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 563

भूपाल! आप विषैले सर्पोंसे घिरे हुए कुएँके समान हैं, राजन्! आपकी अवस्था उस मीठे जलवाली नदीके समान हो गयी है, जिसके घाटक पहुँचना कठिन है, जिसके दोनों किनारे बहुत ऊँचे हों और वहाँ करीलके झाड़ तथा बेंतकी वल्लरियाँ सब ओर छा रही हों ।। ४७ ½ ।।

श्वगृध्रगोमायुयुतो राजहंससमो ह्यसि ॥ ४८ ॥
यथाऽऽश्रित्य महावृक्षं कक्षः संवर्धते महान् ।
ततस्तं संवृणोत्येव तमतीत्य च वर्धते ॥ ४९ ॥
तेनैवोग्रेन्धनेनैवं दावो दहति दारुणः।
तथोपमा ह्यमात्यास्ते राजंस्तान् परिशोधय ॥ ५० ॥
जैसे कुत्तों, गीधों और गीदड़ोंसे घिरा हुआ राजहंस बैठा हो, उसी तरह दुष्ट कर्मचारियोंसे आप घिरे हुए हैं। जैसे लताओंका विशाल समूह किसी महान् वृक्षका आश्रय लेकर बढ़ता है, फिर धीरे-धीरे उस वृक्षको लपेट लेता है और उसका अतिक्रमण करके उससे भी ऊँचेतक फैल जाता है, फिर वही सूखकर भयानक ईंधन बन जाता है, तब दारुण दावानल उसी ईंधनके सहारे उस विशाल वृक्षको भी जला डालता है, राजन्! आपके मन्त्री भी उन्हीं सूखी लताओंके समान हो गये हैं अर्थात् आपके ही आश्रयसे बढ़कर आपके विनाशका कारण बन रहे हैं। अतः आप उनका शोधन कीजिये ॥ ४८—५० ॥

त्वया चैव कृता राजन् भवता परिपालिताः ।
भवन्तमभिसंधाय जिघांसन्ति भवत्प्रियम् ॥ ५१ ॥
नरेश्वर! आपने ही जिन्हें मन्त्री बनाया और आपने जिनका पालन किया, वे आपसे ही कपटभाव रखकर आपके ही हितका विनाश करना चाहते हैं ।। ५१ ।।

उषितं शङ्कमानेन प्रमादं परिरक्षता ।
अन्तःसर्प इवागारे वीरपत्नया इवालये ॥ ५२ ॥
शीलं जिज्ञासमानेन राजंश्च सहजीविनः ।
मैं राजाके साथ रहनेवाले अधिकारियोंका शील-स्वभाव जानना चाहता था, इसलिये सदा सशङ्क रहकर बड़ी सावधानीके साथ यहाँ रहा हूँ। ठीक उसी तरह, जैसे कोई साँपवाले मकानमें रहता हो अथवा किसी शूरवीरकी पत्नीके घरमें घुस गया हो ।। ५२ ½ ।।

कच्चिज्जितेन्द्रियो राजा कच्चिदस्यान्तरा जिताः ॥ ५३ ॥
कच्चिदेषां प्रियो राजा कच्चिद् राज्ञः प्रिया प्रजाः ।
विजिज्ञासुरिह प्राप्तस्तवाहं राजसत्तम ॥ ५४ ॥
क्या इस देशके राजा जितेन्द्रिय हैं? क्या इनके अंदर रहनेवाले सेवक इनके वशमें हैं? क्या यहाँकी प्रजाओंका राजापर प्रेम है? और राजा भी क्या अपनी प्रजाओंपर प्रेम रखते हैं? नृपश्रेष्ठ! इन्हीं सब बातोंको जाननेकी इच्छासे मैं आपके यहाँ आया था ।। ५३-५४ ।।

तस्य मे रोचते राजन् क्षुधितस्येव भोजनम् ।

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